ठाकुर साहब मुझे इस तरह देख रहे थे, जैसे मेरे भीतर तक झाँककर यह तसल्ली कर लेना चाहते हों कि मैं किसी नुकसान पहुँचाने के इरादे से वापस तो नहीं आया हूँ।
लेकिन मैं अपने चेहरे के भावों को इतना सामान्य कर चुका था कि शायद उन्हें अपनी तसल्ली हो गई थी।
उनके सवाल के जवाब में मैंने कल से ऑफिस की जिम्मेदारी संभालने के लिए हाँ कह दी।
ठाकुर साहब मेरी तरफ एक आखिरी बार देखते हुए कमरे से बाहर निकल गए और अपनी पत्नी को अंदर आने का इशारा कर दिया।
लेकिन वह कुछ देर तक वहीं कमरे में खड़ी मुझे देखती रहीं।
उनकी आँखों में एक अजीब-सी उलझन थी, जैसे वह मुझे पहचानने की कोशिश कर रही हों। उनकी निगाहें बार-बार मेरे चेहरे पर ठहर रही थीं।
मैंने हल्की-सी मुस्कान के साथ कहा,
“अमेरिका में सब ठीक है? आप कब आईं वहाँ से?”
मेरी बात सुनते ही जैसे वह अचानक चौंक गईं।
मेरी आवाज़...
शायद मेरी आवाज़ ने उन्हें चौंकाया था।
वही आवाज़... बिल्कुल मेरे पापा जैसी।
यानी उनकी आँखों के सामने उनके पहले पति की आवाज़ जैसे फिर से जीवित हो उठी हो।
उनके होंठों से अनायास ही एक शब्द निकला—
“तुम...?”
मेरे दिल की धड़कन जैसे एक पल के लिए रुक गई।
मैंने खुद को संभालते हुए कहा,
“मैं ठाकुर साहब का खास कर्मचारी हूँ। वह आपको मेरे बारे में सब बता देंगे।”
यह कहते हुए मेरा दिल भीतर से बुरी तरह भीग चुका था।
मन तो कर रहा था कि दौड़कर माँ से लिपट जाऊँ और चीखकर कह दूँ—
“माँ... मैं तुम्हारा बेटा हूँ... क्षितिज! आपने मुझे पहचाना नहीं?”
लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाया।
मेरे भीतर उमड़ता हुआ तूफ़ान मेरे चेहरे तक नहीं पहुँच सका।
वह आँखों में ढेरों सवाल लिए कुछ पल तक मुझे देखती रहीं। फिर धीमे-धीमे कदम बढ़ाती हुई ठाकुर साहब के पीछे कमरे से बाहर चली गईं।
और मैं वहीं खड़ा उन्हें जाते हुए देखता रहा...
मन में सिर्फ एक सवाल गूँज रहा था—
क्या माँ को मेरी आवाज़ में अपने खोए हुए बेटे की झलक मिल गई थी?
और मैं पास पड़े सोफे पर जैसे खुद को छोड़कर गिर-सा गया।
मेरे भीतर एक ही सवाल बार-बार उठ रहा था—
“माँ... क्या एक बार फिर मैं तुम्हें खो दूँगा?”
यह सोचते ही मेरी आँखों में नमी उतर आई।
क्या मैं अपनी ज़िंदगी में अपनी हर प्यारी हस्ती को खोने के लिए ही पैदा हुआ हूँ?
पहले मेरे पापा...
फिर मेरी माँ...
फिर मेरा पूरा परिवार...
और फिर मीरा।
हाँ... मीरा भी तो मेरी ज़िंदगी का एक बेहद खास हिस्सा थी।
एक ऐसी शख्सियत, जिसे मैं चाहकर भी अपने दिल से कभी अलग नहीं कर पाया था।
मैंने अपनी नम आँखें बंद कर लीं।
नहीं!
अब और नहीं।
अब मैं वक्त और हालात को बदल दूँगा।
जो कुछ मैंने खोया है, मुझे वह सब वापस चाहिए।
मेरी माँ...
मेरा परिवार...
और मेरी मीरा...
इस बार मैं अपनी किस्मत को अपने हाथों से लिखूँगा।
मैंने ज़ोर से अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे बीते हुए हर दर्द को उन पलकों के पीछे कैद कर देना चाहता हूँ।
तभी अचानक मेरे कानों में सविता की आवाज़ पड़ी—
“साहब... खाना लग चुका है। आइए।”
मैंने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
कुछ पल तक सामने शून्य में देखता रहा।
फिर सोफे से उठ खड़ा हुआ।
अब मेरे चेहरे पर उदासी नहीं थी।
मेरी आँखों में एक फैसला था...
जो मेरा था, उसे मैं हर हाल में वापस लेकर रहूँगा।
ठाकुर साहब सोने जा चुके थे और खाना खाने के बाद मैं भी अपने कमरे में वापस आ गया था।
लेकिन मेरी आँखों में नींद नहीं थी।
दिमाग में बस एक ही सवाल घूम रहा था—आखिर मैं करूँगा क्या?
मैं वापस तो आ गया था, लेकिन मेरे पास कोई प्लान नहीं था।
मैं अपनी माँ को कैसे बताऊँगा कि मैं ही उसका बेटा हूँ?
और अगर उसे यह सच पता चल गया तो...
क्या वह खुश होगी?
और फिर यह जानने के बाद क्या वह मेरे साथ वापस चलेगी?
मेरे उस छोटे-से घर में...
उस दुनिया में, जहाँ नानी रहती थीं...
उसी नानी के पास, जिनके भरोसे वह मुझे बचपन में अकेला छोड़कर चली गई थी।
लेकिन आखिर क्यों?
क्यों छोड़कर गई थी वह मुझे?
इन सवालों के जवाब मुझे आज तक नहीं मिले थे।
न जाने ऐसी ही कितनी बातें सोचते-सोचते मेरी आँख लग गई।
जब आँख खुली तो सुबह का उजाला चारों तरफ फैल चुका था।
सविता रोज़ की तरह हाथ में कॉफी लिए ठाकुर साहब के कमरे की तरफ जा रही थी। मैं भी उसके पीछे-पीछे वहीं चला गया।
ठाकुर साहब नाइट सूट में सोफे पर बैठे थे और उनके सामने वाली सीट पर... वह भी बैठी थीं।
टेबल पर कुछ फाइलें खुली पड़ी थीं, जिन्हें ठाकुर साहब ध्यान से देख रहे थे।
मुझे देखते ही उन्होंने एक फाइल उठाई और मेरी तरफ बढ़ाते हुए कहा,
“क्षितिज, ये फाइल संभालो। नया प्रोजेक्ट है और प्रोजेक्ट से जुड़ी सारी जानकारी इसमें है। इसे अच्छी तरह समझना और फिर आगे की कार्रवाई शुरू करना। इस काम के लिए मुझे तुमसे ज्यादा जिम्मेदार कोई और नहीं लगता।”
मैंने उनके हाथ से फाइल ले ली।
“जी ठाकुर साहब, जैसा आप कहें।”
मैं फाइल देखने ही वाला था कि तभी उसकी आवाज़ सुनाई दी।
“क्षितिज... तुम कहाँ के रहने वाले हो?”
अचानक पूछे गए इस सवाल से मैं चौंककर उनकी तरफ देखने लगा।
उनकी आँखों में वही उलझन थी, जो कल रात से मुझे परेशान कर रही थी।
वह सवाल पूछते हुए मुझे बैठने का इशारा कर रही थीं और साथ ही सविता को कॉफी बनाने का संकेत भी कर दिया।
सविता ने मेरे और ठाकुर साहब के सामने कॉफी रख दी।
मैं कुछ पल चुप रहा।
समझ नहीं पा रहा था कि सच बता दूँ...
या फिर एक और झूठ बोल दूँ।
आखिरकार मैंने अपने चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान लाते हुए कहा,
“मैम, मेरे माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। जिसका दुनिया में कोई अपना न हो... वो कहाँ का रहने वाला हो सकता है, मैम?”
मैंने बात को हल्का करने की कोशिश की।
“जहाँ आँख खुलती है, इंसान उसी जगह को अपना शहर और अपनी दुनिया समझ लेता है।”
मेरी बात सुनकर उनके चेहरे पर एक अजीब-सा भाव आया।
उन्होंने धीमे से कहा,
“ओह... बहुत दुख हुआ जानकर।”
कुछ पल वह मुझे देखती रहीं।
फिर जैसे अचानक उन्हें कल रात की कोई बात याद आ गई।
“लेकिन तुम कह रहे थे कि तुम अपनी नानी के पास गए थे...”
वह थोड़ा आगे झुकीं और मेरी आँखों में देखते हुए बोलीं,
“वो कहाँ रहती हैं? कोई तो जगह होगी...”
मेरे चेहरे पर उनकी बात सुनकर एक पल के लिए चिंता उभर आई।
मैं अभी अपनी माँ के सामने ऐसी कोई भी बात नहीं करना चाहता था, जिससे मेरी ज़िंदगी के तार सीधे उनसे जा मिलें।
मैं उन्हें थोड़ा वक्त देना चाहता था...
और खुद भी उन्हें समझना चाहता था।
शायद ठाकुर साहब समझ गए थे कि मैं अपने बारे में ज्यादा कुछ बताने में सहज नहीं हूँ।
उन्होंने हल्की-सी मुस्कान के साथ बात संभालते हुए कहा,
“मोहिनी, क्यों सुबह-सुबह बेचारे के पीछे पड़ गई हो? चलो, तुम्हारी डॉक्टर से अपॉइंटमेंट है। तैयार हो जाओ, चलना है।”
फिर मेरी तरफ देखते हुए बोले,
“और क्षितिज यहीं हमारे साथ है। बाद में जी भरकर कर लेना बातें।”
फिर हँसते हुए बोले,
“क्षितिज, तुम्हारी आंटी अमेरिका में इतने दिनों से रह रही हैं, लेकिन अपने देश में आते ही इन्हें हर कोई अपना-सा लगने लगता है। सबसे, हर किसी के बारे में पूछने लगती हैं। भाई, तुम माइंड मत करना।”
वह हँसने लगे।
मैंने भी चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान ला दी।
लेकिन मेरे भीतर कुछ और ही चल रहा था।
शायद कुछ ऐसा था, जिसे मुझसे छिपाया जा रहा था।
मोहिनी वहाँ से उठीं और सविता के साथ कमरे से बाहर चली गईं।
उनके जाते ही ठाकुर साहब का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
उन्होंने धीमी आवाज़ में कहा,
“क्षितिज... तुम्हारी आंटी की तबीयत ठीक नहीं है। कुछ साल पहले उनका एक्सीडेंट हुआ था। सिर में चोट लगने की वजह से कभी-कभी उनकी याददाश्त कमजोर हो जाती है।”
मैं चुपचाप उनकी तरफ देखता रहा।
वह आगे बोले,
“कभी-कभी तो अमेरिका में अपने बच्चों के साथ रहते हुए उन्हें उन्हीं की याद नहीं रहती। ज्योति और चिराग... मेरे दोनों बच्चे। उन्हीं के बीच रहते हुए कभी-कभी वह उनसे पूछ बैठती हैं—‘तुम दोनों कौन हो?’”
यह सुनकर मैं बुरी तरह चौंक गया।
ठाकुर साहब के लहजे में गहरी उदासी थी।
“ओह... आई एम सो सॉरी।”
मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया।
उन्होंने एक गहरी साँस ली और बोले,
“उसी सिलसिले में डॉक्टर ने मुझे सलाह दी थी कि मैं इन्हें कुछ दिनों के लिए इंडिया ले आऊँ। शायद अपने देश आकर इनकी तबीयत थोड़ी बेहतर हो जाए।”
मैं कुछ पल खामोश रहा।
फिर न जाने क्यों मेरे मुँह से सवाल निकल गया—
“ठाकुर साहब... आप इन्हें इनके मायके क्यों नहीं ले जाते? मेरा मतलब है... उनका अपना भी तो कोई होगा यहाँ। उनके माँ-पिता, भाई-बहन... कोई तो होगा?”
मेरे सवाल के साथ ही ठाकुर साहब जैसे अचानक चौंक गए।
उनके चेहरे का रंग तक बदल गया।
कुछ पल तक वह मेरी तरफ देखते रहे।
फिर बेहद सहज बनने की कोशिश करते हुए बोले,
“नहीं... उसका यहाँ कोई नहीं है।”
वह एक पल के लिए रुके।
“वो अकेली थी। एक पिता थे... शादी के बाद उनकी भी मौत हो गई।”
मैं उनकी तरफ देखता रह गया।
“अच्छा...”
उन्होंने मेरी आँखों में देखना तक जरूरी नहीं समझा।
“मैं मिलता हूँ तुमसे।”
इतना कहकर वह तेजी से उठे और सीधे शावर रूम की तरफ बढ़ गए।
मैं वहीं बैठा उन्हें जाते हुए देखता रहा।
उनका जवाब मेरे दिमाग में हथौड़े की तरह बज रहा था—
‘उसका यहाँ कोई नहीं है... वो अकेली थी...’
आखिर चल क्या रहा था?
ठाकुर साहब इतना बड़ा झूठ क्यों बोल रहे थे?
अगर मेरी माँ का यहाँ कोई नहीं था...
तो फिर मैं कौन था?
और अगर मैं उसका बेटा था...
तो ठाकुर साहब मुझे उसकी जिंदगी से दूर रखने की इतनी कोशिश क्यों कर रहे थे?
मेरे भीतर सवालों का तूफान उठ चुका था।
एक बात अब साफ थी—
इस घर में सिर्फ मैं ही कोई राज़ छिपाकर नहीं बैठा था।
मैंने खुद को किसी तरह संभाला।
टेबल पर पड़ी फाइल उठाई और भारी कदमों से कमरे से बाहर निकल गया।
ऑफिस पहुँचा तो सब कुछ वैसा ही था।
कुछ भी नहीं बदला था।
आखिर एक महीने में बदलता भी क्या?
लेकिन मेरे भीतर बहुत कुछ बदल चुका था।
ठाकुर साहब का जो चेहरा मैंने आज देखा था...
वह चेहरा उस आदमी का था, जिसके बारे में शायद ऑफिस का कोई दूसरा इंसान कुछ नहीं जानता था।
एक कातिल...
एक ऐसा खतरनाक इंसान, जिसके सामने लोग सिर्फ उसकी शराफत और रुतबे को देखते थे।
लेकिन मैंने उसकी आँखों में कुछ और देखा था।
कुछ ऐसा, जिसने मेरे मन में शक की एक गहरी लकीर खींच दी थी।
मैं बेहद बेचैन था।
अपनी माँ की हालत देखकर अंदर से टूट रहा था और खुद को पूरी तरह बेबस महसूस कर रहा था।
आखिर ठाकुर साहब ने उनके साथ ऐसा क्या किया था कि वह इस हालत में पहुँच गई थीं?
क्या उन्होंने जो कुछ मुझे बताया था, वह सच था?
क्या सचमुच मेरी माँ की याददाश्त सिर्फ उस हादसे की वजह से कमजोर हुई थी?
या फिर इसके पीछे कोई ऐसी कहानी थी, जिसे मुझसे छिपाया जा रहा था?
और सबसे बड़ा सवाल...
ठाकुर साहब आखिर क्यों नहीं चाहते थे कि मोहिनी अपनी माँ से मिले?
अगर उसकी माँ सचमुच इस दुनिया में थी...
अगर उसका परिवार यहाँ मौजूद था...
तो फिर उन्हें अपनी ही माँ और अपने परिवार से मिलने से रोकने की क्या वजह थी?
मैं अपनी कुर्सी पर बैठा इन्हीं सवालों में उलझा हुआ था।
फाइल मेरे सामने खुली थी...
लेकिन मेरी आँखें उसके एक भी शब्द पर नहीं थीं।
मेरे दिमाग में सिर्फ एक ही चेहरा था—
माँ का।
और पहली बार मुझे महसूस हुआ कि शायद मैं सिर्फ अपनी माँ को खोजने वापस नहीं आया था...
बल्कि उस सच को खोजने आया था, जिसने हम दोनों की ज़िंदगी बर्बाद कर दी थी।