ध्रुव की तारा
भाग - १८
लेखिका "अनामिका"
अगली सुबह तारा अपनी रूममेट्स के साथ पहली क्लास के लिए निकल रही थी। जैसे ही वे तीनों मुख्य कॉरिडोर में पहुँचीं, सामने से ध्रुव अपने दोस्तों कबीर और रोहन के साथ आता दिखाई दिया।
दोनों की नज़रें मिलते ही चाल थम गई। इससे पहले कि वे कुछ बोलते, ध्रुव के दोस्तों ने कबीर की तरफ इशारा किया। "अरे यार रोहन! मुझे वो लाइब्रेरी में बहुत ज़रूरी काम याद आ गया," कबीर ने आँख मारते हुए कहा।
काव्या और सिमरन ने भी तुरंत मौका ताड़ लिया। "हाँ-हाँ! हमें भी... वो कैंटीन में फॉर्म जमा करने जाना है! तुम दोनों बात करो, नो डिस्टर्बेंस... एंजॉय-एंजॉय!" कहती हुई दोनों तरफ की टोलियाँ दबे पाँव वहाँ से रफूचक्कर हो गईं।
ध्रुव और तारा अकेले रह गए। कुछ पलों की चुप्पी को तोड़ते हुए ध्रुव ने झेंपते हुए कहा, "वो... कबीर और रोहन थोड़े पागल हैं, तू उनकी बातों को दिल पर मत लेना।"
तारा ने अपनी किताबें सीने से लगाईं और अपनी वही शरारती मुस्कान बिखेरते हुए बोली, "वैसे सीनियर, एक बात बताओ! मेरी रूममेट्स तो कह रही थीं कि ध्रुव सर यहाँ बहुत रूड और शांत रहते हैं। लड़कियों से तो बात भी नहीं करते! स्कूल में तो तुम हर दूसरी लड़की पर फ्लर्ट करने का मौका नहीं छोड़ते थे। यहाँ इतनी खूबसूरत लड़कियाँ हैं, तुम्हें तो और भी अच्छे ऑप्शंस मिल रहे होंगे... फिर ये संन्यासी बनने का नाटक क्यों?"
ध्रुव ने तारा की आँखों में झाँका, उसके होंठों पर एक बेहद प्यारी और हल्की सी मुस्कान आ गई। उसने थोड़ा करीब झुककर शरारती अंदाज़ में कहा, "अरे बुद्धू! वहाँ स्कूल में तू मेरे साथ होती थी, तो मुझे हिम्मत मिलती थी। यहाँ अगर मैं किसी लड़की पर ट्राई मारता और वो मुझे पीट देती... तो मैं किसके पीछे छुपता?"
तारा की खिलखिलाहट से पूरा कॉरिडोर गूँज उठा। लेकिन उस हँसी के बीच, ध्रुव की नज़रें तारा के चमकते चेहरे से हट नहीं रही थीं।
उस पल ध्रुव को एक गहरा अहसास हुआ। हॉस्टल आने के बाद से जिन पलों में वह खुद को अकेला महसूस करता था, या जिन लड़कियों से वह दूर भागता था... वो इसलिए नहीं था कि वह संन्यासी बन गया था। वह तो जाने-अनजाने हर चेहरे में सिर्फ तारा को ढूँढ रहा था। तारा तो बचपन से ही ध्रुव को चाहती थी, लेकिन आज ध्रुव को भी अहसास हो गया था कि उसके दिल में तारा के लिए जो जज़्बात हैं, वो महज़ दोस्ती से कहीं ज़्यादा—बेइंतहा मोहब्बत हैं।
ध्रुव को जब इस गहरी मोहब्बत का अहसास हुआ, तो उसकी आँखों में एक अजीब सा सुकून तैर गया। उसने अपनी घबराहट छुपाने की कोशिश करते हुए धीरे से कहा, "अच्छा बाबा, अब ज़्यादा मत हँसो! सब लोग देख रहे हैं।"
तारा ने अपनी हँसी पर बमुश्किल काबू पाया और ध्रुव की तरफ झुककर बोली, "अच्छा! तो मिस्टर हैंडसम सीनियर को किसी से पिटने का डर था, इसलिए शरीफ बने घूम रहे थे? मुझे तो लगा था यहाँ आते ही मुझे भूल ही गए होंगे।"
ध्रुव ने गहरी सांस ली और सीधे तारा की आँखों में देखते हुए कहा, "तुझे भूलना इतना आसान होता तो शायद ये दिल इतना बेचैन न रहता, तारा।"
उसकी आवाज में आए अचानक इस ठहराव और संजीदगी ने तारा को चौंका दिया। उसकी शरारती मुस्कान पल भर के लिए थम गई। ध्रुव की आँखों में दोस्ती से परे एक अलग ही गहराई थी, जिसे पढ़कर तारा का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
इससे पहले कि तारा कुछ समझ पाती, दूर से कबीर और रोहन की खिलखिलाती आवाजें सुनाई दीं। ध्रुव ने खुद को संभाला और मुस्कुराते हुए कहा, "चलो, पहली ही क्लास के लिए लेट हो जाओगी। शाम को कैंटीन में मिलोगी?"
तारा ने धक-धक करते दिल के साथ बस सिर हिला दिया।
उस दिन के बाद से उनके कॉलेज के दिन एक हसीन सपने की तरह बीतने लगे। कभी लाइब्रेरी की अलमारियों के पीछे छुपकर बातें करना, तो कभी अचानक कॉरिडोर में एक-दूसरे से टकरा जाना। कभी-कभी दोनों पहली क्लास बंद करके चुपके से कॉलेज कैंपस से बाहर शहर घूमने निकल जाते, जहाँ छोटी-छोटी टपरियों की चाय और ढेर सारी बातें उनकी दुनिया बन जातीं।
हँसते-खेलते, पढ़ते-लिखते और एक-दूसरे के साथ खूबसूरत यादें बनाते हुए न जाने कब पहला सेमेस्टर खत्म हो गया। एग्जाम्स खत्म होते ही छुट्टियों का ऐलान हुआ। हॉस्टल के खाली होते कमरों के बीच दोनों ने अपने बैग पैक किए और अपने गाँव लौटने के लिए एक साथ निकल पड़े। ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए तारा के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी, और पास बैठा ध्रुव बस मन ही मन मुस्कुरा रहा था—क्योंकि इस बार का सफर सिर्फ घर लौटने का नहीं, बल्कि दिलों के और करीब आने का था।
अठारहवां भाग समाप्त, कहानी जारी है....