Devil की दास्तान - 53 Sonam Brijwasi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 53

(सूरज की हल्की किरणें कमरे में प्रवेश कर रही हैं। सीया अभी भी हल्की थकी हुई है। कबीर उसे सहारा देकर कार में बैठाता है।)

कबीर (धीमे स्वर में, खुद से) बोला - 
"बस, आज डॉक्टर से पता चल जाएगा… सब ठीक हो जाएगा… मुझे यकीन है।"

(सीया धीरे-धीरे सामने की सीट पर बैठती है, सिर झुका कर। वो अभी भी उल्टियाँ और सिरदर्द महसूस कर रही है।)

सीया (कमज़ोर आवाज़ में) बोली - 
"कबीर जी… मुझे डर लग रहा है… क्या मैं ठीक हो जाऊँगी?"

(कबीर बस उसका हाथ पकड़ता है, कुछ नहीं बोलता। उसकी आँखों में चिंता है, पर शब्द नहीं निकलते।)

(सड़क पर कार चल रही है। कबीर की नजरें सड़क पर नहीं, सीया की तरफ़ टिकी हैं। वो मन ही मन सोचता है।)

वॉयसओवर (कबीर के मन में) बोला - 
"ये मेरी 20 साल की मासूम पत्नी…इतना कुछ सह चुकी है… और अब ये बीमारी…मैं उसे किसी भी सूरत में दर्द में नहीं देख सकता…
मुझे उसे बचाना ही होगा… चाहे कुछ भी करना पड़े।"

(सीया खिड़की के बाहर झाँक रही है, बार-बार सिर पकड़ती है।
कबीर उसका हाथ कसकर पकड़ लेता है।)

(क्लिनिक का दृश्य — सफेद दीवारें, मेडिकल उपकरण।
डॉक्टर एक नोटबुक में कुछ लिख रहे हैं। सीया हल्की घबराहट में बैठी है, कबीर उसके बगल में बैठा है। कुछ चैकअप हुए। )

डॉक्टर (सीधा) बोलीं - 
"सीया, आपकी रिपोर्ट्स देखकर पता चला कि आपको एक दुर्लभ डिसऑर्डर है। ये बीमारी आमतौर पर अधिक तनाव और मानसिक दबाव से होती है।।आपको सिरदर्द, उल्टियाँ और कभी-कभी खून की समस्या भी होती है। और हाँ… हल्लुसिनेशन भी इस बीमारी का हिस्सा है।"

(कबीर का चेहरा कड़ा हो जाता है। वो थोड़ा सा पीछे हटता है, लेकिन फिर सीया का हाथ पकड़ लेता है।)

कबीर (धीमे स्वर में, खुद से) बोला - 
"मेरी मासूम सीया… ये सब तुम्हारे साथ… क्यों?"

(सीया डरकर कबीर की तरफ़ देखती है। कबीर बस सिर हिलाकर सहारा देता है। वो चुपचाप उसे आराम की बात कहता है।)

(कबीर और सीया कार में लौट रहे हैं। सीया धीरे-धीरे कुछ समझ पा रही है।।कबीर सोचता है, मन में डर और चिंता के बीच प्यार का भाव है।)

कबीर ( मन में) बोला - 
"मुझे उसे हर हाल में बचाना होगा…ये बीमारी जितनी दुर्लभ है, उतना ही यह मेरी जिम्मेदारी भी है…सीया, मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।"

(कार धीरे-धीरे चलती है, बारिश की हल्की बूंदें गाड़ी की खिड़की पर गिर रही हैं। सीया खिड़की से बाहर झाँक रही है, और कबीर चुपचाप उसके हाथ थामे बैठा है।)

(कार धीरे-धीरे घर के गेट पर रुकती है। सीया अभी भी सिर पकड़कर बैठी है, उसकी आँखें आधी बंद हैं।बकबीर गाड़ी रोकता है, धीरे-धीरे उतरता है और उसके पास आता है।)

कबीर (धीरे, प्यार भरे स्वर में) बोला - 
"सीया… चलो, घर चलते हैं। तुम थक गई हो।"

(सीया बस धीरे-धीरे सिर झुकाती है, शब्द नहीं बोल पाती। कबीर उसे सहारा देता है और घर तक ले जाता है।)

(घर के लिविंग रूम का दृश्य — हल्की रोशनी। सीया सीधे बिस्तर की ओर चली जाती है और लेट जाती है। कबीर उसकी तरफ बैठता है, उसकी हथेलियाँ पकड़कर सहारा देता है।)

सीया (रोते हुए, धीरे से) बोला - 
"कबीर जी… सिर… बहुत दर्द कर रहा है… मैं… मैं संभाल नहीं पा रही…"

(कबीर उसके गालों पर हाथ रखता है, धीरे से उसका चेहरा सहलाता है। वो अपनी आँखों में चिंता और प्यार लिए उसे देखता है।)

कबीर (धीमी, शांत आवाज़ में) बोला - 
"शांत रहो, सीया… मैं यहाँ हूँ… तुम्हें कुछ नहीं होगा…
तुम बस आराम करो… मैं तुम्हारे साथ हूँ।"

(सीया उसकी बाँहों में सिर रखती है और धीरे-धीरे रोती है।
बारिश की बूंदें की तरह उसके आँसू गिरते हैं, और कबीर उसे कसकर गले लगाता है।)

(कबीर और सीया का क्लोज़-अप। सीया के आँसू, दर्द और थकान उसके चेहरे पर साफ़ दिखाई दे रहे हैं। कबीर के चेहरे पर चिंता, प्यार और दृढ़ता है।)

 कबीर ( मन में) बोला - 
"सीया… तुम्हारे दर्द को मैं अपने दिल में महसूस कर रहा हूँ।
मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा…तुम चाहे कितनी भी मुश्किल में क्यों न हो…मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा।"

(सीया धीरे-धीरे अपने दर्द में थक कर सो जाती है। कबीर उसके पास बैठा रहता है, उसकी बाँहों में सिर रखे हुए। रात की खामोशी और हल्की बारिश की यादें कमरे में गहराई जोड़ती हैं।)

(कमरे की हल्की रोशनी। सीया बिस्तर पर आधी नींद में बैठी है।
कबीर उसके पास बैठा है, लैपटॉप स्क्रीन की नीली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही है।)

सीया (धीरे-धीरे, आधी नींद में) बोली - 
“कबीर जी… आप अभी भी यहीं बैठे हो?”

(सीया अपनी आँखें खोलती है, लेकिन लैपटॉप की नीली रोशनी से सिर में तेज़ दर्द उठता है। वो तुरंत आँखें बंद कर लेती है।)

सीसा (धीरे से, अपने आप से) बोली - 
“सर… बहुत तेज़ रोशनी… सिर… दर्द…”

(वो अपनी हथेलियाँ सिर पर रखती है और गहरी साँस लेती है।
वो अपने पति की गर्म साँसें महसूस कर सकती थी, जो उसे थोड़ा सुकून देती थीं।)

(कबीर लैपटॉप पर कुछ सर्च कर रहा है। उसकी आँखों में चिंता और गंभीरता दोनों हैं।)

कबीर (धीरे, खुद से) बोला - 
“सीया के लिए ये दवा… अगर सही समय पर और बिना तनाव के दी, तो शायद फायदा हो सके…पर ये बच्ची… हर बार तनाव ले लेती है। मैं कैसे करूँ कि वो शांत रहे?”

(कबीर स्क्रीन पर दवा के बारे में पढ़ता है। गूगल में लिखा था कि दवा तभी पूरी तरह से असर करेगी जब मरीज बिलकुल तनाव मुक्त हो।
कबीर के चेहरे पर चिंता और बेचैनी साफ दिख रही है।)

कबीर (धीरे, खुद से, हल्की सांस छोड़ते हुए) बोला - 
“सीया… तुम्हें रोकना मुश्किल है… तुम्हारी ओवरथिंकिंग…
लेकिन मैं ये करूँगा कि तुम्हें सही समय पर ये दवा मिले… चाहे कुछ भी हो जाए।”

(सीसा अपने पति की नजदीकी महसूस करती है। उसकी हथेली कबीर के हाथ की गर्मी को छूती है। कबीर धीरे से उसका हाथ अपनी हाथों में ले लेता है।)

सीसा (धीरे से, भावुक) बोली - 
“कबीर जी… आपका होना… मुझे थोड़ा सुकून देता है…”

(कबीर सिर हिलाता है, आँखों में प्यार और चिंता दोनों हैं।
वो लैपटॉप को थोड़ी दूर कर देता है और सिर्फ़ सीसा की ओर देखता है।)

कबीर (धीमी, प्यार भरी आवाज़ में) बोला - 
“सिया… मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ। कोई भी बीमारी, कोई भी डर… मैं तुम्हें अकेला नहीं छोड़ूँगा।”

(सीसा फिर से आँखे बंद कर लेती है। कबीर उसकी बाँहों में सिर रखकर बैठ जाता है। कमरे में सन्नाटा, लैपटॉप की नीली रोशनी और बाहर हल्की बारिश का मिज़ाज बना हुआ है।)