कैमरा दिखाता है — सीया बाथरूम से बाहर आती है। चेहरा पीला, हाथों में हल्की कांप। कुछ देर बाद उसका मूड और बिगड़ जाता है।
वो फिर बाथरूम में चली जाती है और उल्टी करने लगती है।)
सीया (धीमी, दर्द भरी आवाज़ में) बोली -
"ये क्या हो रहा है मेरे साथ... 20 साल की उम्र में... इतना दर्द?"
(उसकी उल्टी में बहुत सारा खून होता है। सीया पूरी तरह से सहम जाती है। उसके सिर में तेज़ दर्द उठता है।)
(सीया जानती है कि कबीर काम में लगा है। वो उसे परेशान नहीं करना चाहती। इसलिए अपने मुंह पर रुमाल रखती है और दूसरे हाथ को सिर पर रखकर चुपचाप हॉल से होकर कमरे में चली जाती है।)
सीया (खुद से, फुसफुसाते हुए) बोली -
"नहीं… उन्हें परेशानी नहीं देना… मैं खुद ही सह लूँगी।"
(कबीर अभी भी लैपटॉप पर काम कर रहा है। पर उसकी नजर अचानक सीया पर पड़ती है। वो कुछ नहीं कहता, बस चुपचाप उसे देखता है।)
(सीया कमरे में जाती है और पेनकिलर ढूंढने लगती है।
सिर में असहनीय दर्द है। वो पेनकिलर की एक गोली खाती है और जमीन पर बैठकर दर्द से मुंह दबा कर रोने लगती है।)
सीया (दर्द में, बुदबुदाते हुए) बोली -
"क्यों हर चीज़ इतनी मुश्किल है... क्यों मैं इतनी कमजोर हूँ?"
(अचानक उसकी नजर उठती है और वो देखती है — कबीर कमरे में आ रहे हैं।)
(सीया जल्दी से बिस्तर पर जाकर लेट जाती है। वो सोने का नाटक करती है ताकि कबीर को उसके दर्द का पता न चले। कबीर धीरे-धीरे उसके पास आता है। उसका चेहरा चिंता और प्यार से भरा है।)
कबीर (धीरे स्वर में, खुद से) बोला -
"सीया… कुछ भी हो जाए, मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूंगा..."
(सीया का चेहरा, हल्की साँसें, और कबीर की आँखों में चिंता। सिर्फ़ कमरे की खामोशी और सिया की हल्की साँसें।)
(सीया बिस्तर पर लेटी है, दर्द छुपा रही है। कबीर उसके पास बैठा है, उसे चुपचाप देख रहा है। लाइट धीरे-धीरे फेड होती है।)
"कभी-कभी सबसे बड़ा दर्द वही होता है, जिसे हम छुपा कर प्यार करने वालों को भी नहीं बताते..."
(सीया बिस्तर पर लेटी है। उसने अपना मुंह पलट लिया है ताकि कबीर उसके हाथ पर लगे खून को न देख पाए। उसका सिर जोर-जोर से दर्द कर रहा है। सिर और तेज़ दर्द से उसकी साँसें भारी हैं।)
सीया (धीमे, दर्द में, खुद से) बोली -
"सिर... बहुत दर्द हो रहा है… पेनकिलर लेने के बाद भी… कुछ ठीक नहीं हो रहा…"
(वो धीरे-धीरे कबीर की तरफ़ मुख मोड़ती है। उसकी आँखों में थकान और बेचैनी झलक रही है।)
सीया (धीमे स्वर में, दर्द में) बोली -
"कबीर जी… मेरा सिर बहुत दर्द कर रहा है… कुछ करो…"
(कबीर कमरे में खड़ा है। वो थोड़ी नाराजगी में है क्योंकि सीया ने उसे सच नहीं बताया। पर उसकी आँखों में प्यार और चिंता साफ़ झलक रही है।)
कबीर (धीरे, प्यार भरे स्वर में, सीया के पास झुकते हुए) बोला -
"सीया… चाहे मैं कितना भी नाराज़ क्यों न रहूँ…तुम्हें ये दर्द नहीं सहना पड़ेगा।"
(वो धीरे-धीरे सीया को अपनी बाँहों में लेता है। सीया उसकी बाँहों में हल्की से आवाज़ निकालती है। कबीर उसकी पीठ पर हाथ फेरता है और धीरे से गले लगाता है।)
कबीर (धीमे, प्यार भरे स्वर में, फुसफुसाते हुए) बोला -
"सो जाओ… अब सब ठीक है… मैं यहाँ हूँ…"
(सीया कबीर की बाँहों में धीरे-धीरे आराम महसूस करती है।
उसकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य होती हैं। कबीर उसका सिर अपने कंधे पर टिकाता है। कमरे में सन्नाटा, हल्की साँसों की आवाज़ और बारिश की हल्की आवाज़।)
"जब शब्द बोल न पाएं, तब सिर्फ़ एहसास ही काफी होता है… प्यार वही है, जो दर्द में भी साथ खड़ा रहे।"
(कैमरा क्लोज़-अप — सीया की आँखें धीरे-धीरे बंद होती हैं। कबीर उसका सिर अपने कंधे पर टिकाए रहता है। लाइट धीरे-धीरे फेड होती है। बैठकर प्यार में सहारा देते हुए, दोनों शांति की नींद में खो जाते हैं।)
(सीया बिस्तर पर कबीर की बाँहों में लेटी है। उसका चेहरा अब भी हल्का परेशान है। कबीर धीरे-धीरे उसके चेहरे की ओर देखता है।)
कबीर (धीरे से, खुद से) बोला -
"क्या हुआ… सीया… कुछ तो सही नहीं है…"
(वो उसके होंठों पर नजर डालता है और वहां खून देखता है।
उसकी आँखों में हल्की चिंता और गुस्सा एक साथ झलकती है।)
कबीर (हल्का गुस्से में, धीरे से) बोला -
"ये खून… कहाँ से आया?"
(सीया अचानक हड़बड़ा कर दूसरी तरफ़ मुख मोड़ लेती है।)
सीया (घबराई हुई, धीमे स्वर में) बोली -
"न-नहीं… कुछ भी नहीं… कोई खून नहीं है… आप गलत समझ रहे हैं… ये आपका वहम है…"
(कबीर का गुस्सा बढ़ जाता है। वो धीरे-धीरे सीया को अपनी बाँहों में पकड़ता है, उसकी आँखों में प्यार और नाराज़गी दोनों हैं।)
कबीर (धीमे स्वर में, मजबूती से) बोला -
"सीया… मुझे सच बताओ… अब छुपाओ मत…"
(सीया डरकर कबीर के सीने से लग जाती है और बच्चों की तरह रोने लगती है। वो धीरे-धीरे सब कुछ कबीर को बता देती है — सिर का दर्द, उल्टियाँ, और खून।)
(कबीर अब शांत हो जाता है। वो धीरे से उसका सिर अपने कंधे पर टिकाता है। हाथ से उसकी पीठ थपथपाता है।)
कबीर (धीमे, प्यार भरे स्वर में) बोला -
"ठीक है… अब डरो मत, सीया।
कल मैं तुम्हें डॉक्टर के पास ले जाऊँगा। सब कुछ ठीक हो जाएगा।"
(सीया धीरे-धीरे शांति महसूस करती है। उसकी आँखे झपकती हैं और नींद धीरे-धीरे उसे घेर लेती हैं। वो कबीर के सीने से लगी हुई सो जाती है।)
(कबीर अब भी जागा है। वो सीया के सोते हुए चेहरे को देखता है।
उसके माथे पर हाथ फेरता है, पर उसके मन में चिंता का समंदर है।)
वॉयसओवर (कबीर के मन में) बोला -
"मैं नहीं जानता कि उसे कौन सी बीमारी है…
लेकिन जितना दर्द वह सह रही है, मैं उसे कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा…
चाहे कुछ भी हो, मैं हमेशा उसके पास रहूँगा…"
( कबीर जागा हुआ, सीया की सुरक्षा में। बारिश की हल्की आवाज़ और रात की चुप्पी सीन को और गहरा बनाती है।)