ध्रुव की तारा
भाग - १४
लेखिका: "अनामिका"
अस्पताल से डिस्चार्ज होकर जब सुमन घर वापस आईं, तो घर की फ़िज़ा में फैली बीमारी की खामोशी हर किसी को उदास कर रही थी। विजय जी ने शुरुआत के कुछ दिन ऑफिस से छुट्टी लेकर सुमन का पूरा ख्याल रखा, लेकिन काम की मजबूरियों के चलते उन्हें जल्द ही काम पर लौटना पड़ा। ऐसे में तारा और उसकी माँ सुधा, सुमन के लिए सबसे बड़ा सहारा बनकर उभरीं।
रोज़ की तरह जैसे ही स्कूल की घंटी बजती, तारा के कदम खुद-ब-खुद ध्रुव के घर की तरफ दौड़ पड़ते। घर पहुँचते ही, बिना कुछ खाए-पिए, वह झटपट कपड़े बदलती और भागकर सुमन आंटी के कमरे में पहुँच जाती। सुमन जी के समय पर दवाइयाँ देने से लेकर, उनके खाने-पीने और आराम का ख्याल रखने तक—तारा हर छोटी-छोटी चीज़ को बड़े सलीके से सँभालती। अपनी खुद की पढ़ाई और ११वीं के एग्ज़ाम्स की तैयारियों का भारी दबाव होने के बावजूद, उसकी इस निस्वार्थ सेवा में ज़रा भी थकान या शिकन नज़र नहीं आती थी।
दिन बीतते गए और यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा। तारा की यह सादगी और अपनापन देखकर सुमन जी की आँखें अक्सर भर आतीं।
एक दोपहर, जब तारा रसोई में सुमन जी के लिए सूप बनाने गई थी, सुमन जी ने पास बैठी सुधा का हाथ थाम लिया। उनकी आवाज़ में बेपनाह भावुकता थी, "सुधा, मैं जानती थी कि तेरी बेटी बहुत समझदार है... पर ध्रुव की गैर-मौजूदगी में जिस तरह उसने मुझे सँभाला है ना, सच कहूँ तो अगर मेरी अपनी सगी बेटी भी होती, तो शायद इतना नहीं कर पाती। ध्रुव होता तो भी शायद इतना ध्यान न रख पाता।"
सुधा ने मुस्कुराते हुए सुमन के हाथ पर अपना हाथ रखा और बड़े प्यार से डाँटते हुए बोली, "यह कैसी बातें कर रही हो सुमन? क्या तारा सिर्फ मेरी बेटी है? उसका जितना हक मुझ पर है, उतना ही तुम पर भी है। वह अपनी माँ का ध्यान नहीं रखेगी तो किसका रखेगी?"
दरवाज़े की ओट में खड़ी तारा ने जब अपनी दोनों माँओं की यह बातें सुनीं, तो उसकी आँखों में नमी और चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान तैर गई। ध्रुव भले ही दूर था, लेकिन उसकी यादें और उसका परिवार अब तारा की ज़िंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन चुके थे।
धीरे-धीरे समय बीतता गया। तारा की निस्वार्थ सेवा और देखभाल से सुमन जी अब पूरी तरह ठीक हो चुकी थीं। उधर तारा ने भी अपने ११वीं के एग्ज़ाम दे दिए थे और ध्रुव ने भी अपने कॉलेज के फर्स्ट ईयर के सेमेस्टर एग्ज़ाम सफलतापूर्वक क्लियर कर लिए थे।
छुट्टियाँ शुरू होते ही ध्रुव ने घर लौटने का फैसला किया। वह इस बात से पूरी तरह बेखबर था कि उसकी माँ का ऑपरेशन हुआ था और वे एक बड़े संकट से गुज़री थीं। वह अपने माता-पिता को सरप्राइज देने के लिए बिना किसी को बताए सीधे घर के लिए निकल पड़ा।
जैसे ही उसने अपने घर के दरवाज़े पर कदम रखा और डोरबेल बजाई, सुमन जी ने दरवाज़ा खोला। अपने बेटे को इतने महीनों बाद अचानक सामने खड़ा देख उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। सुमन जी के चेहरे पर खुशी के आँसू छलक पड़े और उन्होंने ध्रुव को तुरंत सीने से लगा लिया। आहट सुनकर विजय जी भी बाहर आए और ध्रुव को देखकर खुशी से झूम उठे।
विजय जी ने हँसते हुए ध्रुव का भारी बैग हाथ से लिया और उसे घर के अंदर लाते हुए प्यार से डाँटा, "अरे ध्रुव! तूने आने से पहले एक बार बताया भी नहीं? अगर बता देता तो मैं तुझे लेने स्टेशन आ जाता, यूँ अचानक आ गया!"
ध्रुव ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ के हाथ चूम लिए और बोला, "पापा, अगर बता देता तो आप सबकी आँखों में यह सरप्राइज़ वाली खुशी कैसे देखता? मैं आप दोनों को बहुत मिस कर रहा था।"
तीनों ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठ गए। सुमन जी तो अपने बेटे का चेहरा निहारते थक ही नहीं रही थीं। चाय की चुस्कियों के साथ घर में बातों का दौर शुरू हो गया।
"हॉस्टल का खाना कैसा है ध्रुव? पढ़ाई कैसी चल रही है? और तूने हमें याद भी किया या दोस्तों में ही व्यस्त रहा?" सुमन जी ने ढेरों सवाल एक साथ पूछ डाले।
ध्रुव ने हँसते हुए अपनी माँ का हाथ पकड़ा और बोला, "माँ, हॉस्टल का खाना तो आपके हाथ के खाने के आगे कुछ भी नहीं है। और मिस करने की बात... तो ऐसा कोई दिन नहीं था जब मुझे आप दोनों की और घर की याद न आई हो।"
पूरे घर में महीनों बाद एक अलग ही रौनक और खुशियों की गूँज लौट आई थी। लेकिन ध्रुव अभी भी उस सच से अंजान था जो इस घर की दीवारों में मुस्कुरा रहा था—और उस चेहरे से भी, जो उसकी एक झलक पाने के लिए बेताब होने वाला था...
थोड़ी देर अपने कमरे में आराम करने के बाद, ध्रुव आदतन खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया। उसकी नज़रें सीधे सामने तारा के कमरे की खिड़की पर जा टिकीं, लेकिन वहाँ कोई हलचल नहीं थी।
"तारा अभी तक नज़र क्यों नहीं आई? क्या कर रही होगी वो?" ध्रुव ने मन ही मन सोचा। उसके चेहरे पर एक शैतानी भरी मुस्कान तैर गई, "चलो, उसे भी सरप्राइज़ दिया जाए! देखते हैं मुझे सामने देखकर उसका क्या रिएक्शन होता है।"
तारा के घर जाने से पहले वह अपनी माँ को बताना चाहता था कि वह तारा को सरप्राइज़ देने जा रहा है और वे उसे बिल्कुल न बताएँ। वह माँ को आवाज़ देते हुए उनके कमरे की तरफ बढ़ा, "माँ... आप कहाँ हो?"
कमरे में सुमन जी तो नहीं थीं, लेकिन ध्रुव की नज़र साइड टेबल की एक दराज़ (ड्रॉर) पर पड़ी, जो थोड़ी सी खुली हुई थी। ध्रुव जैसे ही उस ड्रॉर को पूरी तरह बंद करने के लिए आगे बढ़ा, उसकी नज़र अंदर रखे कुछ मेडिकल पेपर्स और रिपोर्ट्स पर पड़ गई।
चौदहवां भाग समाप्त, कहानी जारी है....