ध्रुव की तारा
भाग - १३
लेखिका: "अनामिका"
सिया के वे कड़वे शब्द तारा के सीने में सीधे तीर की तरह चुभे थे। ध्रुव के शहर छोड़कर जाने से उसकी ज़िंदगी में जो खालीपन आया था, सिया के इस अचानक और कठोर फैसले ने उसे पूरी तरह तोड़कर बिखेर दिया। स्कूल खत्म होते ही वह भारी कदमों से घर की तरफ लौट आई, लेकिन घर की चारदीवारी उसे काटने को दौड़ रही थी। न ध्रुव का साथ था, न सिया का दिलासा। वह खुद को पूरी दुनिया में एकदम तन्हा और बेबस महसूस कर रही थी।
शाम ढलते ही, अपने बेकाबू कदमों को संभालते हुए वह कॉलोनी के उसी स्विमिंग पूल की तरफ चल दी। यह वही जगह थी जहाँ ध्रुव घंटों पानी में तैरता था और तारा किनारे पर बैठकर मुस्कुराते हुए उसे देखा करती थी। पूल का वह शांत पानी आज भी ध्रुव की मौजूदगी की गवाही दे रहा था। तारा उसी सीढ़ी पर बैठ गई जहाँ वह हमेशा बैठा करती थी।
सामने खाली पड़े शांत पूल को देखते ही उसकी आँखों का बाँध टूट गया। उसने घुटनों में सिर छिपा लिया और फूट-फूट कर रोने लगी। उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे—हर बहते आँसू के साथ ध्रुव की हँसी, उसकी नादान बातें और उसका दिया हुआ सुरक्षा का अहसास याद आ रहा था।
उसी अकेलेपन और सन्नाटे के बीच, तारा के दिल में एक बिजली सी कौंधी। उसने अचानक गहराई से महसूस किया कि ध्रुव उसके लिए सिर्फ एक बचपन का दोस्त या रक्षक नहीं था। इतने सालों से जो कसक, जो निर्भरता और जो बेपनाह हक वह ध्रुव पर महसूस करती आई थी, वह सिर्फ दोस्ती नहीं थी। उस ठंडी शाम को, रोते हुए तारा को पहली बार यह अहसास हुआ कि वह ध्रुव से बेहद प्यार करती है—एक ऐसा प्यार जिसे पहचानते-पहचानते शायद उससे बहुत देर हो चुकी थी।
दूसरी तरफ, ध्रुव भी एक नए शहर और हॉस्टल के सख्त माहौल के बीच खुद को ढालने की पूरी कोशिश कर रहा था। हॉस्टल के कमरे में उसका ज़्यादातर वक्त किताबों के बीच बीतता था। जब भी देर रात पढ़ाई करते-करते उसकी आँखें थकतीं, वह आदतन मुस्कुराते हुए अपने बराबर वाली कुर्सी की तरफ देख लेता—मानो तारा अभी भी वहीं बैठकर अपनी किताबों से ज़्यादा उसे घूर रही हो। पर खाली कुर्सी को देखकर हर बार उसे कड़वी हकीकत का अहसास होता, और एक ठंडी साँस भरकर वह फिर अपनी पढ़ाई में जुट जाता।
कॉलेज में ध्रुव अपनी पर्सनालिटी और व्यवहार की वजह से जल्द ही आकर्षण का केंद्र बन गया था। स्कूल के दिनों में बेफिक्र फ्लर्ट करने वाला ध्रुव अब पूरी तरह बदल चुका था। जब भी कोई लड़की उसके करीब आने की कोशिश करती, उसका ध्यान अनजाने में ही तारा के मासूम चेहरे पर चला जाता और वह मुस्कुराकर दूरी बना लेता। उसे लग रहा था कि बचपन की आदत की वजह से वह तारा को इतना याद कर रहा है, पर सच्चाई यह थी कि तारा उसके दिल में बेहद गहराई से उतर चुकी थी।
इसी उधेड़बुन के बीच, तारा जब किसी काम से ध्रुव के घर पहुँची, तो सुमन आंटी को ज़मीन पर बेसुध पड़ा देख उसकी चीख निकल गई। वह घबराकर तुरंत अपनी माँ को बुला लाई। सुधा और विजय (ध्रुव के पापा) तुरंत उन्हें अस्पताल ले गए। डॉक्टरों ने जाँच के बाद कहा, "ट्यूमर अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन दवाइयाँ असर नहीं कर रही हैं। अगर अभी छोटा सा ऑपरेशन कर दिया जाए, तो घबराने की कोई बात नहीं रहेगी।" विजय जी की सहमति से तुरंत ऑपरेशन की तैयारियाँ शुरू कर दी गईं।
ऑपरेशन थियेटर के बाहर खड़े होकर तारा ध्रुव को फोन करने ही वाली थी कि विजय जी ने उसे रोक लिया। उन्होंने उदास मन से कहा, "तारा, ध्रुव को अभी मत बताओ। वह अपने सपनों को छोड़ चुका है, माँ की बीमारी की वजह से पहले ही दुखी है। नया कॉलेज है, बेवजह परेशान हो जाएगा। हम सब मिलकर संभाल लेंगे।" तारा भारी मन से मान गई और उसने ध्रुव से यह सच छिपाने का फैसला किया।
उधर अपने घर-परिवार में चल रहे इस बड़े संकट से ध्रुव पूरी तरह बेखबर था। उसने अपने बास्केटबॉल और स्पोर्ट्स के सपनों को पीछे छोड़ दिया था, क्योंकि वह सिर्फ अपने माता-पिता के चेहरे पर सुकून और खुशी देखना चाहता था। वह जानता था कि उसकी माँ सुमन का सपना उसे एक बड़ा और कामयाब इंसान बनते देखने का है। इसीलिए वह दिन-रात एक करके सिर्फ मेहनत से पढ़ाई कर रहा था। देर रात तक जागते हुए, तारा की यादों को दिल के किसी कोने में सहेजकर, वह बस अपनी माँ के सपनों को पूरा करने की धुन में लगा था।
वह इस बात से बिल्कुल अनजान था कि अपनों की खुशी और भले के लिए रखा गया यह 'एक झूठ' और दिल में छुपा यह दर्द, आने वाले वक्त में उन दोनों के रिश्ते के ताने-बाने को किस नए और अनदेखे मोड़ पर लाकर खड़ा करने वाला था...
तेरहवाँ भाग समाप्त, कहानी जारी है....