Devil की दास्तान - 48 Sonam Brijwasi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 48

( सुबह का समय। हल्की धूप पर्दों से छनकर कमरे में आ रही है। करण और सिया एक ही बिस्तर पर हैं। बाहर से पंछियों की आवाज़ आ रही है, पर कमरे के अंदर अब भी एक अजीब-सी खामोशी पसरी है।)
(सिया की आँखें धीरे-धीरे खुलती हैं। सामने करण अब भी गहरी नींद में है। उसके चेहरे पर शांति है — लेकिन वही चेहरा कल रात सिया के लिए डर और रहस्य का प्रतीक बन गया था।)

सिया (धीरे से, खुद से) बोली - 
“शायद अब… मैं सब जान लूँ…”

(वो धीरे-धीरे करवट बदलती है और तकिए के नीचे से डायरी निकालने की कोशिश करती है। करण की साँसें गहरी हैं, जैसे अब भी सपनों में खोया हुआ हो।)

(सिया धीरे से उसकी बाँह के नीचे से डायरी खींचने लगती है… तभी — करण का फ़ोन बज उठता है। तेज़, एकदम तेज़।)

📱 (फोन की रिंग: “Tring… Tring…”)

(सिया डर के मारे झट से डायरी छोड़ देती है और झटपट वापस लेट जाती है, आँखें बंद कर लेती है जैसे वो अब भी सो रही हो।)
(करण नींद में ही करवट लेकर फ़ोन उठाता है।)

करण (नींद भरी आवाज़ में) बोला - 
“हैलो… कौन?”

(फोन से महिला की आवाज़ आती है — कंपनी की HR, “मिस रीना”).

रीना (फोन पर) बोली - 
“सर, गुड मॉर्निंग! बस एक अपडेट देना था — कंपनी की छुट्टियाँ कल तक ख़त्म हो रही हैं। परसों से सबको ऑफिस आना है। आपको भी, सर।”

करण (धीरे से) बोला - 
“ठीक है… धन्यवाद।”

(वो कॉल काट देता है। कुछ सेकंड तक मोबाइल स्क्रीन को देखता रहता है। उसकी नज़रें थकी हुई हैं, जैसे किसी गहरे सोच में हों।)
(फिर उसकी नज़र सिया पर जाती है — जो आँखें बंद किए, सोने का नाटक कर रही है।)
(करण कुछ देर तक उसे घूरता रहता है। उसकी आँखों में मिश्रित भाव हैं — शक, स्नेह, और थोड़ा दर्द भी।)

करण (धीरे से, खुद से) बोला - 
“तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो, सिया…”

(सिया को महसूस होता है कि वो उसे देख रहा है। उसका दिल तेज़ धड़कने लगता है।)

सिया (मन में) बोली - 
“उन्होंने देखा तो नहीं न… कि मैं डायरी छू रही थी?”

(करण उठता है, बेड के पास रखे पानी के गिलास से घूंट भरता है। फिर खिड़की के पास जाकर बाहर देखता है — हल्की बारिश शुरू हो चुकी है।)

करण (धीरे से) बोला - 
“वक्त आ गया है… सब फिर से शुरू करने का।”

(वो वापस मुड़ता है, उसकी नज़र फिर सिया पर जाती है। इस बार उसकी आँखों में एक रहस्यमयी मुस्कान है।)

करण (धीरे से, बुदबुदाता है) -
“देखते हैं… इस बार तुम कितना जान पाती हो।”

(सिया के होंठ हल्के से हिलते हैं — वो सुन लेती है। उसके चेहरे पर अब डर नहीं, बल्कि जिज्ञासा है।)

“एक कॉल ने करण की नींद तोड़ दी…
पर उस कॉल ने सिया के मन में उठे सवालों की गूँज और तेज़ कर दी।
अब जब कंपनी की छुट्टियाँ खत्म हो रही थीं,
साथ ही शुरू होने वाला था —
सिया की सच्चाई की खोज का अगला अध्याय।”

( दोपहर का समय। रसोई में हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही है। सिया एप्रन पहने सब्ज़ी काट रही है। करण कमरे में कुछ कागज़ देख रहा है। हवा में हल्की सीनी का महक फैली हुई है।)

( सिया के हाथ पर।)
वो ध्यान से टमाटर काट रही होती है, लेकिन अचानक —
🔪 “छपाक!”
चाकू उसके हाथ में गहराई तक कट जाता है।

सिया (दर्द से) चिल्लाई -
“आह्ह…!”

(खून उसकी उंगलियों से टपकने लगता है। लाल, गाढ़ा… और वही दृश्य — करण की आँखों के सामने फैल जाता है।)

*(करण का चेहरा क्लोज़अप – उसकी आँखें धीरे-धीरे लाल होने लगती हैं। साँसें तेज़। दिल की धड़कन बढ़ती हुई।)

करण (मन में) बोला - 
“नहीं… नहीं… काबू रखो करण… वो तुम्हारी सिया है… उसका खून नहीं…”

(वो अचानक उठकर उसकी तरफ दौड़ता है। सिया घबरा जाती है, पीछे हटती है।)

सिया बोली - 
“करण जी… मैं ठीक हूँ, बस ज़रा सा कट गया—”

करण (तेज़, गुस्से में) बोला - 
“कहा था ना! चाकू मत छूना! तुम सब्ज़ी नहीं काटोगी!”

(उसकी आवाज़ इतनी तेज़ कि सिया एक पल को सिहर जाती है। करण तुरंत एहसास करता है कि वो कुछ ज़्यादा बोल गया है। वो गहरी साँस लेता है, फिर उसका लहजा बदल जाता है।)

करण (धीरे से, काँपते हुए) बोला - 
“मुझे माफ़ करना… पर जब मैंने खून देखा तो… मुझे खुद पर भरोसा नहीं रहा।”

(वो उसके हाथ को पकड़ता है। सिया उसकी लाल होती आँखें देख लेती है, पर कुछ नहीं कहती।)

सिया (धीरे से) बोली - 
“आपको खून देखकर डर लगता है?”

करण (थोड़ा मुस्कुराकर, पर दर्द भरी आँखों से) बोला - 
“डर नहीं सिया… कुछ और… बहुत पुराना दर्द जग जाता है।”

(वो जल्दी से पानी से उसका हाथ धोता है। फिर अलमारी से पट्टी निकालकर बहुत नर्मी से उसके कट पर बाँध देता है। उसकी उंगलियाँ सिया की उंगलियों को छूती हैं, और उस स्पर्श में एक अजीब गर्माहट है — जैसे दोनों के बीच कोई पुराना बंधन जाग उठा हो।)
(सिया उसकी ओर देखती है। उसकी आँखों में सवाल हैं, पर वो चुप रहती है।)

करण (धीरे से) बोला - 
“अब तुम कुछ नहीं करोगी। रसोई मैं संभाल लूंगा।”

सिया (हँसने की कोशिश करती हुई) बोली - 
“आपको खाना बनाना आता भी है?”

करण (थोड़ी मुस्कान के साथ) बोला - 
“इतना कि तुम्हें भूखा ना रहना पड़े।”

(वो उसके बालों को धीरे से कान के पीछे करता है, फिर मुड़कर रसोई में चला जाता है।)
(सिया दरवाज़े के पास खड़ी उसे देखती है — कड़ाही में सब्ज़ी डालते हुए, बहुत ध्यान से। उसकी पीठ के पीछे उसकी परछाई चमकती है, जैसे उस परछाई में कोई और चेहरा झलक रहा हो — कबीर का चेहरा।)

“खून की एक बूंद ने जगाया था करण के भीतर छिपा राक्षस…
पर उसी खून ने उसे सिया के और करीब भी कर दिया।
अब रसोई में पक रही थी सिर्फ सब्ज़ी नहीं…
बल्कि एक अधूरी मोहब्बत की खुशबू —
जिसे दबाया नहीं जा सकता था।”

 सुबह का समय। कमरे की खिड़की से हल्की धूप अंदर आ रही है। हवा में अजीब सी ठंडक है। सिया शीशे के सामने खड़ी है, अपने बाल संवार रही है।)
 सिया के चेहरे पर हल्की मुस्कान, पर आँखों में बेचैनी।)
वो अचानक अपने गले के पास कुछ महसूस करती है —
उंगली वहाँ जाती है और…
🔍 वहाँ एक हल्का सा गहरा निशान था — जैसे किसी ने कभी दाँत गड़ाए हों।

सिया (धीरे से, खुद से) बोली - 
“ये… ये निशान कब आया?”

(वो बालों को हटाकर ध्यान से देखती है। निशान बिल्कुल वैसा था जैसे किसी वैम्पायर के काटने का निशान फिल्मों में दिखाया जाता है।)

(उसकी साँसें तेज़ हो जाती हैं, कैमरा धीरे-धीरे ब्लर होता है और अचानक एक फ्लैशबैक सीन शुरू होता है।)

🎥 फ्लैशबैक — घना जंगल, काली रात, आसमान में लाल चाँद।
चारों तरफ़ पेड़ों की परछाइयाँ। सिया (कभी की Simran) ज़मीन पर गिरी हुई है, उसकी आँखों में आँसू हैं। अचानक अंधेरे से एक पंखों वाला आदमी आता है — उसके पंख काले हैं, आँखें लाल, और चेहरा… कबीर जैसा।

(वो झुककर उसके गले को छूता है, और धीरे से दाँत गड़ाता है।)

सिया (कमज़ोर आवाज़ में) बोली - 
“मत… मत करो… कृपया…”

(उसकी आँखों से आँसू गिरते हैं, और वो बेहोश हो जाती है।)
वो आदमी सिर उठाता है, होंठों पर खून, और आँखों में दर्द।

वो बुदबुदाता है —
“मुझे माफ़ करना… ये मजबूरी थी…”

🎥 कट टू — वर्तमान में।
(सिया अचानक झटके से पीछे हटती है, साँसें तेज़।)

सिया (डरी हुई, मन में) बोली - 
“वो सपना नहीं था… कुछ था… कुछ जो सच में हुआ था…”

(उसके हाथ काँप रहे हैं, वो शीशे से पीछे हट जाती है। उसी वक्त दरवाज़ा ज़ोर से खुलता है — करण अंदर आता है।)

करण (तेज़ लहजे में) बोला - 
“सिया! ये सब बिखरा हुआ क्यों है? और तुम इतनी घबराई क्यों लग रही हो?”

सिया (हकलाई हुई) बोली - 
“न-नहीं… कुछ नहीं… बस थोड़ा सिर दर्द है…”

करण (भौंहें सिकोड़ते हुए) बोला - 
“तुम हमेशा कुछ ना कुछ छुपाती क्यों हो मुझसे?”

(वो टेबल पर हाथ पटकता है। सिया सिहर जाती है।)

सिया बोली - 
“मैं… मैं तो बस…”

करण (गुस्से में) बोला - 
“कितनी बार कहा है सिया! हर बात छुपाना बंद करो! मैं तुम्हारे लिए सब कुछ कर रहा हूँ, और तुम…!”

(वो अचानक चुप हो जाता है। उसकी साँसें भारी हैं। सिया उसे देखती है — उसके चेहरे पर झुंझलाहट नहीं, बल्कि कोई और गहरा दर्द है।)

सिया (धीरे से) बोली - 
“आप ठीक तो हो ना, करण जी?”

करण (आँखें बंद करते हुए) बोला - 
“नहीं… मैं खुद को खोता जा रहा हूँ, सिया…”

(वो मुड़कर बाहर चला जाता है। दरवाज़ा ज़ोर से बंद होता है। सिया अकेली रह जाती है — शीशे में खुद को फिर देखती है।)

सिया (मन में) बोली - 
“ये निशान… ये दर्द… और करण जी का गुस्सा…
क्या सब एक ही कहानी के दो हिस्से हैं?”

(उसकी आँखें नम हैं। कैमरा धीरे-धीरे ऊपर उठता है — शीशे में उसका चेहरा, और पीछे करण की परछाई, जैसे वो अब भी उसे देख रहा हो…)

“कभी-कभी यादें मिटा दी जाती हैं,
पर जिस्म पर छोड़े निशान… वो सच्चाई की गवाही बन जाते हैं।
सिया अब उस सच्चाई के करीब थी —
जिससे करण खुद डरता था।”