( सुबह का वक्त। हल्की धूप खिड़की से छनकर कमरे में गिर रही है। हवा में सन्नाटा है। सिया धीरे-धीरे बिस्तर से उठती है। उसके चेहरे पर रात भर की बेचैनी साफ दिखती है।)
(टेबल पर रखी पुरानी डायरी — करण की डायरी — खुली पड़ी है। सिया उसके पन्ने पलट रही है।)
सिया (धीरे, खुद से बुदबुदाते हुए) बोली -
“‘मैंने उसे बचाने के लिए झूठ कहा... वो अब वो नहीं रही जो थी।’
इसका मतलब क्या है?
कौन सी ‘वो’... कौन सा झूठ?”
(वो गहराई से सोच में डूबी है। पन्ने दर पन्ने पढ़ती है — पर हर लाइन उसके लिए रहस्य बनती जाती है।)
*(अचानक सीन बदला— दोपहर का वक्त। सिया कमरे की अलमारी साफ कर रही है। वो कपड़े निकालती है, कुछ पुराने बक्से हटाती है। तभी उसके हाथ किसी सख्त चीज़ से टकराते हैं।)
सिया (हैरान होकर) बोली -
“ये क्या है…?”
(वो कपड़ों के बीच से एक और डायरी निकालती है। डायरी पर धूल जमी है, पर नाम साफ लिखा है — “Simran’s Diary.”)
सिया (साँस रोककर) बोली -
“Simran...!
मतलब... मेरी ही?”
(उसकी उँगलियाँ काँपने लगती हैं। वो डायरी खोलती है — अंदर प्यारे शब्द, हँसी, दर्द, और कुछ तस्वीरें चिपकी हैं। एक पन्ने पर लिखा है —)
> “आज हमारी शादी को एक महीना हो गया। करण जी बहुत बदल गए हैं, लेकिन मैं जानती हूँ, उनके अंदर कोई भारी राज़ छिपा है। पर वो मुझसे कुछ कह नहीं पाते…”
(सिया की आँखों से आँसू निकल आते हैं। उसे अब शक नहीं, डर लगने लगा है कि वो किसी गहरे जाल में फँसी हुई है।)
सिया (धीरे से खुद से) बोली -
“तो ये सच है... मैं वही सिमरन हूँ…
पर... फिर मैं अब ‘सिया’ कैसे बन गई?”
(वो अगले पन्ने पलटती है — पर तभी पीछे से किसी के कदमों की आवाज़ आती है। दरवाज़ा चरमराता है। करण अंदर आता है।)
करण (हल्के स्वर में) बोला -
“सिया? क्या कर रही हो तुम?”
(सिया घबरा जाती है। वो जल्दी से डायरी को कपड़ों के नीचे छिपा देती है और सामान्य बनने की कोशिश करती है।)
सिया (थोड़ी हड़बड़ाई आवाज़ में) बोली -
“वो... कुछ नहीं... बस अलमारी साफ कर रही थी।”
(करण उसकी ओर बढ़ता है, उसकी आँखों में झाँकता है — जैसे कुछ महसूस कर रहा हो।)
करण (धीरे स्वर में) बोला -
“सब ठीक तो है न?”
(सिया मुस्कुराने की कोशिश करती है, पर उसकी आवाज़ काँपती है।)
सिया बोली -
“हाँ, बस... थोड़ा सामान बहुत बिखरा हुआ था।”
(करण हल्की मुस्कान देता है, उसके सिर पर हाथ रखता है।)
करण (धीरे से) बोला -
“तुम आराम कर लो... बाकी मैं देख लूँगा।”
(वो उसकी आँखों में कुछ पल तक देखता रहता है — जैसे उसे पढ़ने की कोशिश कर रहा हो — फिर कमरे से चला जाता है।)
(जैसे ही करण बाहर निकलता है, सिया जल्दी से कपड़े हटाती है और डायरी को बैग में छिपा लेती है। उसकी साँसें तेज़ हैं, दिल धड़क रहा है।)
सिया (धीरे, खुद से) बोली -
“एक डायरी झूठ की थी... और ये शायद सच की है।
पर सच्चाई क्या है... ये अब मुझे खुद निकालनी होगी।”
“सिया के हाथ में अब दो डायरी थीं —
एक करण की... और एक सिमरन की।
एक में लिखा था झूठ... दूसरी में लिखा था प्यार।
अब इन दोनों के बीच फँसा था एक ऐसा सच —
जो या तो उन्हें हमेशा के लिए जोड़ देगा...
या हमेशा के लिए अलग कर देगा।”
रात का सन्नाटा। कमरे में हल्की नीली रौशनी। बाहर से हवा खिड़की के पर्दे हिला रही है। करण गहरी नींद में है। पास ही टेबल पर रखी डायरी की छाया दीवार पर पड़ रही है।)
(सिया धीरे-धीरे उठती है, बिना आवाज़ किए डायरी उठाती है और टेबल लैम्प जलाती है। उसकी आँखों में डर और जिज्ञासा दोनों हैं।)
सिया (धीरे बुदबुदाते हुए) बोली -
“देखते हैं... इसमें ऐसा क्या है... जो मुझसे छुपाया गया…”
(वो पहला पन्ना खोलती है — पन्ने पर सिमरन की साफ-सुथरी लिखावट है।)
सिया (धीरे पढ़ती है) -
> “आज मैं साढ़े 17 साल की हो गई हूँ।
मैं आज अपने पहले इंटरव्यू के लिए गई थी।
सभी को लगता है कि मैं 18 की हूँ... पर सच्चाई सिर्फ मुझे पता है।”
(सिया हल्का मुस्कुराती है, उसकी आँखों में मासूमियत झलकती है — जैसे वो खुद को पढ़ रही हो।)
सिया (धीरे से) बोली -
“साढ़े 17... यानी मैं...”
(वो आगे पढ़ती है —)
> “मेरा इंटरव्यू बहुत अच्छा गया।
लेकिन जब मैं बाहर निकली, तो एक लड़का मुझसे टकरा गया।
बड़ा ही अजीब था… उसकी आँखें लाल थीं… जैसे उनमें आग जलती हो।
वो बहुत हैंडसम और स्मार्ट था…पर उसकी लाल आँखों ने मुझे डरा दिया।”
(सिया के चेहरे का रंग बदलता है। वो धीरे से करण की ओर देखती है — जो बिस्तर पर सो रहा है।)
सिया (धीरे, काँपती आवाज़ में) बोली -
“लाल आँखें… हैंडसम... और डरावना लड़का…”
(वो धीरे से दूसरा पन्ना पलटती है।)
> “वो लड़का आज मुझे फिर मिला।
जब मैं रात में सड़क पर चल रही थी,
वो अचानक अपनी कार लेकर मेरे सामने आ गया।
मैं डर के मारे चीख भी नहीं पाई।”
(सिया के हाथ काँपने लगते हैं। उसकी साँसें तेज़ हो रही हैं।)
> “आज मुझे पता चला…
कि वो खतरनाक लड़का ही मेरा बॉस है।
और उसका नाम है — करण सूर्यवंशी।”
(सिया की आँखें चौड़ी हो जाती हैं। उसका दिल तेज़ी से धड़कता है।)
सिया (धीरे, सदमे में) बोली -
“करण सूर्यवंशी...!
यानी... मेरा... बॉस?
पर... फिर मैं यहाँ कैसे...?”
(वो जल्दी-जल्दी पन्ने पलटती है, पर तभी पीछे से आवाज़ आती है —)
करण (नींद में कराहते हुए) बोला -
“सिया...”
(सिया सिहर उठती है। डायरी उसके हाथ से गिरते-गिरते बचती है। करण हल्का करवट लेकर उसके हाथ को पकड़ लेता है।)
करण (धीरे से, आधी नींद में) बोला -
“कहाँ जा रही हो... सो जाओ... बहुत रात हो गई है…”
(सिया का चेहरा सफ़ेद पड़ जाता है। उसके हाथ काँपते हैं। वो धीरे से मुस्कान बनाती है और डायरी को अपने पीछे तकिए के नीचे छिपा देती है।)
सिया (कृत्रिम मुस्कान के साथ) बोली -
“कुछ नहीं... नींद नहीं आ रही थी... बस... ऐसे ही बैठी थी।”
(करण नींद में मुस्कुराता है और उसका हाथ थोड़ा और कसकर पकड़ लेता है।)
करण (धीरे) बोला -
“हमेशा... मेरे पास रहना... कहीं मत जाना…”
(सिया की आँखों से हल्का आँसू निकलता है। वो धीरे से सिर हिलाती है, पर नज़र उसकी डायरी की ओर जाती है जो तकिए के नीचे छिपी है।)
“डायरी का पहला पन्ना सिया को उसके अतीत की झलक दे चुका था...पर ये तो बस शुरुआत थी।
आगे के पन्नों में वो राज़ लिखा था —
जिसे पढ़ने के बाद ना सिर्फ़ सिया की ज़िंदगी बदलने वाली थी...
बल्कि करण का सच भी... सामने आने वाला था।”
( रात का समय। बाहर बारिश हो रही है। खिड़की से आती ठंडी हवा कमरे में झूम रही है। कमरे में बस हल्की-सी रौशनी है — मोबाइल की टॉर्च।)
(सिया उर्फ़ सिमरन धीरे से उठती है। करण उसके पास गहरी नींद में सो रहा है। सिया तकिए के नीचे से वही डायरी निकालती है — करण की पुरानी डायरी।)
सिया (धीरे से, खुद से) बोली -
“आज जो भी सच है… सब जानकर रहूँगी…”
(वो धीरे से मोबाइल की लाइट ऑन करती है और डायरी खोलती है। पन्ने पुराने हैं, किनारों से पीले पड़ चुके। वो पहला शब्द पढ़ती है — “मेरे बॉस…”)
सिया (धीरे पढ़ती हुई) बोली -
“मेरे बॉस बहुत ख़राब हैं।
मुझसे बहुत सारा काम करवाते हैं।
रात में ओवरटाइम कराते हैं…और साथ में डराते भी हैं।
आज उन्होंने मुझसे कहा —
‘जब इंसान डरता है तो उसकी धड़कन तेज़ हो जाती है,
और उसका खून… और मीठा हो जाता है।’”
(सिया की साँस अटक जाती है। उसके हाथ काँपने लगते हैं। वो धीरे से करण की ओर देखती है — जो उसी के पास लेटा है।)
सिया (मन में) बोली -
“क्या वो… सच में ऐसे थे?”
(वो धीरे से अगला पन्ना पलटती है।)
> “आज रात फिर से ओवरटाइम करवाया मुझसे।
लेकिन आज कुछ अलग हुआ…जब मैं घर लौट रही थी,
तो कुछ लड़के मेरा पीछा करने लगे।
मैं बहुत डर गई थी…पर तभी sir वहाँ आए…
उन्होंने सबको बुरी तरह मारा और मुझे बचा लिया।
फिर अपनी कार से घर तक छोड़ा।”
(सिया का चेहरा थोड़ा नरम पड़ता है। उसकी आँखों में कृतज्ञता की झलक।)
सिया (धीरे मुस्कुराते हुए) बोली -
“तो... वो हमेशा बुरे नहीं थे...”
(वो आगे पढ़ती है।)
> “आज ऑफिस में सब मेरा मज़ाक बना रहे थे।
कहते थे, मैं गाँव की लड़की हूँ… सड़क पार करना भी नहीं आता।
पर सर ने सबको डाँट दिया।
कहा, ‘जो लड़की डरती नहीं, वो जीतती है।’
सब चुप हो गए।”
(सिया मुस्कुराती है। उसकी आँखें करण पर टिकती हैं जो अब करवट लेकर उसकी तरफ सो रहा है।)
सिया (धीरे से) बोली -
“आप... बाहर से सख्त हो, पर अंदर से...”
(वो पन्ना पलटती है।)
> “करण सर नारियल जैसे हैं —
ऊपर से सख्त, डरावने…पर अंदर से एकदम मुलायम।
पर फिर भी… मुझे उनसे डर लगता है।
वो रात में देर तक जागते हैं, और कभी-कभी… अजीब-अजीब बातें करते हैं।”
(सिया थोड़ा सिहरती है।)
सिया (धीरे बुदबुदाती है) बोली -
“अजीब बातें… क्या बातें करती थीं वो रातें…?”
(वो आगे पढ़ने ही वाली होती है कि अचानक करण करवट लेकर उठ बैठता है।)
करण (कड़क आवाज़ में) बोला -
“सिया!!”
(सिया घबरा जाती है। डायरी उसके हाथ से गिर जाती है। करण उठता है, उसके हाथ से डायरी छीन लेता है। उसकी आँखों में गुस्सा और डर दोनों हैं।)
करण (कठोर स्वर में) बोला -
“तुम्हें कितनी बार कहा है… मेरी चीज़ों को मत छुओ!”
(सिया काँप रही है, पर उसकी आँखों में अब डर से ज़्यादा सवाल हैं।)
सिया (धीरे से) बोली -
“क्यों…?
क्या है इसमें… जो आप मुझसे छिपा रहे हो, करण जी?”
(करण कुछ पल उसे देखता है, फिर नज़रें झुका लेता है। उसके चेहरे पर दर्द है, पर शब्द नहीं निकलते।)
करण (धीरे से) बोला -
“कभी-कभी… कुछ बातें जानना अच्छा नहीं होता।”
(वो डायरी अपने सीने से लगाकर रखता है और बिस्तर पर लेट जाता है। सिया खामोश बैठी रहती है।)
(कुछ पल बाद करण उसकी ओर बढ़ता है, उसका हाथ पकड़कर उसे अपने करीब खींच लेता है।)
करण (थके स्वर में) बोला -
“अब सो जाओ… बहुत बातें हो गईं…”
(सिया कुछ नहीं कहती, बस उसकी बाँहों में फँसी रह जाती है। उसकी आँखें खुली हैं, मन में तूफ़ान चल रहा है।)
“उस रात करण ने डायरी तो बचा ली…
पर सिया के मन में उठ चुके सवालों को नहीं रोक पाया।
क्योंकि अब उसके दिल में सिर्फ़ शक नहीं…
बल्कि उस सच्चाई की तलाश थी —
जो उसके और करण के रिश्ते की जड़ तक जाएगी…”