संयोगिता ने अपनी चालाकी से ट्रक ड्राइवर को खामोश करा दिया था। उसने उसे एक मोटी रकम दी थी और धमकाया भी था कि अगर उसने जुबान खोली, तो अंजाम बुरा होगा। ड्राइवर, जो पैसों का लालची और पुलिस से डरने वाला इंसान था, उसने पुलिस को एक झूठा विवरण दिया और एक ऐसा स्केच बनवाया जिसमें संयोगिता की शक्ल बिल्कुल नहीं मिलती थी। वह स्केच किसी अनजान, साधारण दिखने वाली महिला का था।
इंस्पेक्टर वर्मा उस स्केच को देखकर भ्रमित थे, लेकिन जांच जारी रखी। लेकिन संयोगिता को लगा कि अब सब ठीक है। वह गलत थी। अगली शाम, संयोगिता अपने घर के बालकनी में खड़ी चाय पी रही थी। विवान अंदर खेल रहा था। तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर 'Unknown Number' लिखा था।
संयोगिता ने फोन उठाया।
संयोगिता बोली-
हलो?
उधर से कोई आवाज़ नहीं आई। सिर्फ भारी साँस लेने की आवाज़ थी।
संयोगिता (थोड़ी सख्त आवाज़ में) बोली-
कौन है? अगर कुछ नहीं कहना है तो फोन काट दूँ?
तभी, उधर से एक ठंडी, मशीनी सी आवाज़ आई।
अजनबी आवाज़ बोली -
बच्चे बहुत प्यारे होते हैं ना, संयोगिता जी... सोचो, अगर मैं बच्चे को उठा लूँ तो?
संयोगिता का खून जम गया। उसके हाथ से चाय का कप छूटकर जमीन पर गिरा और टूट गया।
संयोगिता (कांपती आवाज़ में) बोली-
तुम... तुम कौन हो? विवान को मत छूना!
अजनबी आवाज़ हँसी। एक ऐसी हँसी जिसमें पागलपन था।
अजनबी आवाज़ बोली-
मैं वो हूँ जिसे तुमने राहुल के जरिए नजरअंदाज किया था। मुझे पता है कि राहुल कहाँ है। मुझे पता है कि तुमने क्या किया। और अब... मैं तुम्हारी सबसे कीमती चीज़ चाहता हूँ।
संयोगिता की साँसें तेज हो गईं। उसने तुरंत फोन काट दिया और अंदर भागी। विवान सोफे पर बैठा कार्टून देख रहा था। संयोगिता ने उसे गोद में उठा लिया और कसकर जकड़ लिया।
विवान (हैरानी से) बोला -
मम्मा? क्या हुआ? आप क्यों कांप रही हैं?
संयोगिता ने विवान के चेहरे को देखा। उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर एक खौफनाक दृढ़ता थी।
संयोगिता (मन में) बोली-
कोई मेरे बच्चे को छूने की हिम्मत की तो मैं उसे जिंदा नहीं छोड़ूंगी।
तभी, दरवाजे की घंटी बजी।
*टिंग-टॉन्ग...*
संयोगिता सहम गई। इस वक्त कौन आ सकता है?
उसने विवान को कमरे में बंद किया और दरवाजे की तरफ बढ़ी। उसने डोरबेल कैमरे की स्क्रीन देखी। बाहर कोई नहीं था।
लेकिन जमीन पर एक लिफाफा रखा था। संयोगिता ने दरवाजा खोला और लिफाफा उठाया। उसके अंदर एक तस्वीर थी।
तस्वीर में विवान स्कूल से वापस आ रहा था, और एक अज्ञात व्यक्ति दूर से उसे देख रहा था।
तस्वीर के पीछे लिखा था -
**खेल अभी शुरू हुआ है, संयोगिता।**
संयोगिता ने तस्वीर को मुट्ठी में भींच लिया। उसकी आँखों में अब डर नहीं, बल्कि एक खतरनाक क्रोध था।
संयोगिता (धीमे स्वर में) बोली-
तुमने गलती की। तुमने मेरे बच्चे को निशाना बनाया। अब तुम्हारी मौत तय है।
लेकिन उसे नहीं पता था कि यह हमला सिर्फ एक शुरुआत थी। और जिस व्यक्ति ने यह धमकी दी थी, वह संयोगिता के अतीत का एक ऐसा साया था, जिससे बचना नामुमकिन था।
कुछ दिन बीत गए। राहुल के लापता होने की खबर धीरे-धीरे ठंडी पड़ गई थी। पुलिस की जांच भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंची थी, क्योंकि संयोगिता ने हर सबूत मिटा दिया था। लेकिन संयोगिता के मन का तूफान शांत नहीं हुआ था। वह हर पल सतर्क रहती थी। उसने विवान की सुरक्षा के लिए अपने अपार्टमेंट के बाहर और अंदर कुछ सीक्रेट कैमरे खुद लगवा लिए थे। वह नहीं चाहती थी कि उस अजनबी की धमकी विवान तक पहुंचे।
विवान अब संयोगिता के बिना एक पल नहीं रह पाता था। स्कूल की छुट्टी के बाद वह सीधा संयोगिता के अपार्टमेंट ही आता। उसे वहां का माहौल, संयोगिता का प्यार और उसका ध्यान बहुत अच्छा लगता था।
विराट ने ये सब चुपचाप देखा। वह जब भी विवान को लेने आता, तो देखता कि विवान संयोगिता के गले लगकर कैसे खिलखिलाता है। संयोगिता भी विवान को अपनी जान से ज्यादा प्यार करती थी, लेकिन विराट से वह अब भी दूरियां बनाए हुए थी। उस रात के बाद से, संयोगिता ने विराट से सिर्फ काम की बातें की थीं। आँखें चार होने पर वह नजरें झुका लेती थी, जैसे उस रात की यादें उसे अंदर से झकझोर देती हों।
एक शाम, विराट अपने घर लौटा। वह थका हुआ और विचारों में डूबा था। उसकी माँ, गंगा जी, ड्राइंग रूम में बैठी चाय पी रही थीं। विराट को देखकर उन्होंने उसे अपने पास बुलाया।
गंगा जी ने प्यार से उसका हाथ थामा और बोलीं -
बेटा... कब तक तुम अकेले रहोगे? देखो, विवान दिन-ब-दिन बड़ा हो रहा है। उसे भी माँ की जरूरत है। संपूर्णा को गए वक्त हो गया, लेकिन तुम्हारी जिंदगी वहीं थोड़ी रुक जानी चाहिए।
विराट ने गहरी साँस ली। उसकी आँखों के सामने संपूर्णा का चेहरा आया, और फिर... अनजाने में संयोगिता का।
विराट बोला -
माँ, मैं शादी नहीं कर सकता। मेरे दिल में आज भी सिर्फ संपूर्णा है। और दूसरी बात... कौन सी माँ अगर उसने मेरे बच्चे को अपना नहीं माना तो? लड़की कौन होगी, कैसी होगी, विवान को प्यार करेगी भी या नहीं... ये तो हमें नहीं पता ना। मैं विवान के भविष्य का रिस्क नहीं ले सकता।
गंगा जी मुस्कुराईं। उन्होंने विराट के सिर पर हाथ फेरा।
गंगा जी बोलीं -
तुम्हें पता है ना बेटा, विवान इन दिनों किसके साथ सबसे ज्यादा खुश रहता है? संयोगिता के साथ। वो उससे बहुत प्यार करती है और विवान भी उसे अपनी माँ ही मानता है। क्यों न तुम संयोगिता से पूछ लो? वो हमारे परिवार को भी अच्छे से जानती है।
विराट सन्न रह गया।
विराट बोला -
संयोगिता? लेकिन माँ... वो तो मेरी बिजनेस पार्टनर है। मैंने उसके बारे में ऐसा कभी सोचा ही नहीं।
गंगा जी बोलीं -
रिश्ते दिल से बनते हैं बेटा, सोच से नहीं। तुम बस एक बार उससे बात तो करो।
विराट कुछ बोल नहीं पाया। वह अपने कमरे में चला गया।
कमरे में अकेले बैठकर उसने उस रात को याद किया।
वह रात जब नशे की हालत में उसने संयोगिता को संपूर्णा समझ लिया था। लेकिन जब सुबह उसकी आँख खुली थी, तो उसे एहसास हुआ था कि बांहों में संपूर्णा नहीं, संयोगिता थी। और सच तो यह था कि उस रात के बाद से उसके अंदर भी कुछ बदल गया था।
जब भी वह ऑफिस में संयोगिता को देखता, उसे एक अजीब सी कशिश महसूस होती। उसकी खामोशी, उसका काम में डूबे रहना, उसकी आँखों का वह गहरा दर्द जो वह छिपाने की कोशिश करती है... यह सब विराट के दिल में एक अनजानी सी जगह बना रहा था। क्या वह सच में संयोगिता को सिर्फ एक हमशक्ल समझ रहा था, या अब वह संयोगिता को 'संयोगिता' के रूप में देखने लगा था?
विराट ने अपना फोन उठाया। स्क्रीन पर संयोगिता का नंबर था। उसने कॉल मिलाने के लिए उंगली बढ़ाई। उसे नहीं पता था कि संयोगिता की जिंदगी इस वक्त किस खतरे से घिरी हुई है।
दूसरी तरफ, संयोगिता के अपार्टमेंट में...संयोगिता विवान को सुलाकर अपने लैपटॉप पर उस अजनबी नंबर को ट्रैक करने की कोशिश कर रही थी। डार्क वेब पर कुछ सर्च करते-करते वह थक चुकी थी। तभी उसके फोन की स्क्रीन पर 'Virat Calling' फ्लैश होने लगा।
संयोगिता का दिल एक पल के लिए तेज धड़का। क्या विराट को राहुल के बारे में कुछ पता चल गया? या फिर... वह उस रात के बारे में बात करना चाहता है? उसने कांपते हाथों से कॉल रिसीव किया।
वो बोली -
हलो... मिस्टर विराट?
उधर से कुछ पल की खामोशी रही, और फिर विराट की भारी लेकिन कोमल आवाज़ आई...
विराट बोला-
संयोगिता... क्या तुम फ्री हो? मुझे तुमसे कुछ बहुत जरूरी बात करनी है। क्या मैं अभी तुम्हारे अपार्टमेंट आ सकता हूँ?
संयोगिता की साँसें थम सी गईं। इतनी रात गए?
संयोगिता (थोड़ी घबराहट के साथ) -
अभी? लेकिन... विवान सो गया है।
विराट बोला -
मैं उसे डिस्टर्ब नहीं करूँगा। बस तुमसे कुछ बात करनी है। मैं बस पहुँच रहा हूँ।
कॉल कट गई। संयोगिता ने फोन नीचे रखा। उसके मन में एक अजीब सी हलचल थी। वह जल्दी से शीशे के सामने गई, अपने बिखरे बालों को ठीक किया और दरवाजे की तरफ देखने लगी।
लेकिन उसे नहीं पता था कि विराट के अपार्टमेंट पहुँचने से ठीक पहले, सड़क के उस पार खड़ी एक काली गाड़ी में बैठा वह 'अजनबी' संयोगिता के फ्लोर की खिड़की को ही देख रहा था। खेल अब एक नए मोड़ पर आ चुका था।