पुलिस स्टेशन में इंस्पेक्टर वर्मा अपनी मेज पर बैठे राहुल के फोन की लोकेशन ट्रैस करने की कोशिश कर रहे थे। स्क्रीन पर एक लाल बिंदु चमक रहा था, जो शहर के दूसरे छोर पर, एक सुनसान इलाके में दिखाई दे रहा था।
इंस्पेक्टर वर्मा (अपने सहयोगी से) -
देखो, फोन अभी भी एक्टिव है। लोकेशन शहर के बाहरी इलाके, पुरानी ईंट भट्ठी के पास आ रही है। लगता है कातिल ने फोन वहीं फेंका है ताकि हमें गुमराह कर सके। टीम तैयार करो, हम वहां चलते हैं।
लेकिन पुलिस को नहीं पता था कि यह संयोगिता की चालाकी थी। वास्तविकता कुछ और ही थी। रात के अंधेरे में, संयोगिता ने राहुल के फोन को निकाला था। उसने SIM कार्ड तोड़ दिया था, लेकिन फोन को चालू छोड़ दिया था और उसे एक ट्रक में छिपाकर शहर से दूर, उस पुरानी ईंट भट्ठी के पास फेंक आई थी, जहाँ कचरा डंप किया जाता था। इससे पुलिस का ध्यान भटक गया। और राहुल की लाश?
संयोगिता ने गोदाम के अंदर ही एक बड़े ड्रम में पुराने रसायन और तेल डाला था। उसने राहुल के शरीर को उसमें डाल दिया और आग लगा दी। इतनी तेज आग और रसायनों के मिलने से शरीर पूरी तरह जलकर राख हो गया। पहचानना नामुमकिन था। सिर्फ कुछ हड्डियों के टुकड़े बचे थे, जिन्हें संयोगिता ने अलग से इकट्ठा करके एक गहरे कुएं में फेंक दिया, जो सालों से सूखा पड़ा था।
लेकिन सबसे बड़ी चुनौती थी CCTV कैमरा। संयोगिता जानती थी कि गोदाम के बाहर एक कैमरा है। वह रात भर जागी रही। आधी रात को, जब सब सो रहे थे, वह वापस गोदाम गई। उसने अपने संपर्कों में से एक ऐसे व्यक्ति को बुलाया जो चोरों के नेटवर्क से जुड़ा था (उसके 'अतीत' का हिस्सा)। उस व्यक्ति ने चुपचाप कैमरा उखाड़ लिया और उसे संयोगिता को सौंप दिया।
संयोगिता ने उस कैमरे को भी उसी ड्रम में जला दिया, जहाँ राहुल का शरीर जला था। अब कोई सबूत नहीं बचा था। न फोन, न लाश, न ही वीडियो।
अगली सुबह।
पुलिस ईंट भट्ठी के पास पहुंची। उन्हें वहां सिर्फ एक जला हुआ फोन मिला, जिसकी मेमोरी चिप पहले ही नष्ट की जा चुकी थी।
इंस्पेक्टर वर्मा (निराशा से) -
कुछ नहीं मिला सर। फोन जला हुआ है। और राहुल का कोई पता नहीं। लगता है यह कोई किडनैपिंग का मामला है या फिर वह खुद कहीं छिप गया है।
दूसरी तरफ, चौहान हाउस में। संयोगिता नाश्ते की टेबल पर बैठी थी। विवान उसके सामने बैठकर नाश्ता कर रहा था। विराट भी वहां था, लेकिन वह चुप था। उसकी नजरें संयोगिता पर थीं, लेकिन संयोगिता ने उसकी तरफ देखा ही नहीं।
विराट (धमी आवाज़ में) -
संयोगिता... क्या तुम ठीक हो? तुम्हारे चेहरे पर थकान है।
संयोगिता ने अपना कॉफी का कप रखा और विराट की तरफ देखा। उसकी आँखों में वही ठंडक थी।
संयोगिता बोली -
मैं ठीक हूँ, मिस्टर विराट। बस काम का दबाव ज्यादा था।
विराट कुछ कहने वाला था, लेकिन तभी उसका फोन बजा। यह इंस्पेक्टर वर्मा का कॉल था। विराट ने फोन उठाया।
विराट बोला -
हलो, इंस्पेक्टर?
इंस्पेक्टर वर्मा बोला -
सर, एक बुरी खबर है। आपके दोस्त राहुल लापता हैं। हमें उनका फोन मिला है, लेकिन वे गायब हैं। हमें शक है कि कोई अपहरण हुआ है। क्या आपने हाल ही में किसी से उनकी दुश्मनी देखी थी?
विराट का चेहरा पीला पड़ गया। उसने अनजाने में संयोगिता की तरफ देखा। संयोगिता शांत बैठी चाय पी रही थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
विराट (घबराहट से) बोला-
नहीं... नहीं तो। राहुल तो बहुत मिलनसार था।
इंस्पेक्टर बोले-
ठीक है सर। हम जांच जारी रखेंगे। अगर आपको कोई सुराग मिले, तो बताएं।
कॉल कट गया। विराट ने फोन नीचे रखा। उसका हाथ कांप रहा था।
विराट (मन में) बोला -
राहुल लापता? और संयोगिता इतनी शांत क्यों है? क्या उसे कुछ पता है?
लेकिन संयोगिता के मन में कोई डर नहीं था। क्योंकि उसने अपना काम पूरा कर लिया था।
संयोगिता (मन में) बोली -
एक और पापी सजा पा गया। अब बारी किसकी है?
तभी विवान ने अपनी छोटी सी आवाज़ में पूछा—
पापा, आप उदास क्यों हो? और मम्मा... आपकी साड़ी पर यह लाल दाग क्या है?
संयोगिता और विराट दोनों की नजरें संयोगिता की साड़ी के कोने पर पड़ीं, जहाँ खून का एक बहुत ही हल्का, न दिखने वाला दाग था, जिसे संयोगिता ने धोने की कोशिश की थी लेकिन शायद पूरी तरह नहीं धुला था। संयोगिता का दिल एक पल के लिए रुक सा गया।
संयोगिता (मुस्कुराते हुए, लेकिन आवाज़ में कंपन) -
यह... यह सिर्फ लाल स्याही है, बाबू। ऑफिस में पेन फट गया था।
विराट ने गौर से उस दाग को देखा। उसे संदेह होने लगा था।
क्या संयोगिता सच में वही मासूम लड़की थी जिससे उसने शादी की थी? या उसके पीछे कोई गहरा, अंधेरा राज छिपा था?
विराट की नजरें उस लाल दाग पर टिकी थीं। संदेह की एक लहर उसके चेहरे से गुजरी। वह धीरे-धीर उठा और संयोगिता के करीब आया।
विराट (संदेह भरी आवाज़ में) बोला-
संयोगिता... यह स्याही नहीं लग रही। यह तो खून जैसा...
संयोगिता का दिल जोर से धड़का, लेकिन उसने अपने चेहरे पर कोई हलचल नहीं आने दी। उसने तुरंत मेज के नीचे अपना हाथ बढ़ाया, जहाँ नाश्ते की टेबल की नुकीली लकड़ी का एक छोटा सा टूटा हुआ हिस्सा बाहर निकला हुआ था। बिना एक पल गंवाए, उसने अपनी हथेली को उस नुकीले किनारे पर जोर से रगड़ा।
*खर्र...*
त्वचा कटी और खून की एक ताजी लकीर बन गई। दर्द हुआ, लेकिन संयोगिता ने दांतों तले जीभ दबा ली। उसने तुरंत अपना हाथ ऊपर उठाया और विराट के सामने कर दिया। हथेली से खून बह रहा था, जो उसकी साड़ी के उसी हिस्से पर लगा, जहाँ पहले से हल्का सा दाग था। अब वह ताजा खून उस पुराने दाग को ढक रहा था।
संयोगिता (शांत स्वर में) बोली-
देखिए मिस्टर विराट। मैंने कहा था कि पेन फट गया था, लेकिन असल में... मैं थोड़ी घबरा गई थी और हाथ टेबल के किनारे से कट गया। शायद कल रात के बाद से मैं थोड़ी अस्थिर हूँ।
विराट ने उस कटे हुए हाथ को देखा। खून ताजा था। उसका संदेह थोड़ा कम हुआ, लेकिन पूरी तरह नहीं गया। उसे लगा कि शायद संयोगिता सच में मानसिक तनाव में है।
विराट (नरम आवाज़ में) बोला -
तुम्हें डॉक्टर को दिखाना चाहिए। और इस कपड़े को बदल दो।
संयोगिता ने मुस्कुराने की कोशिश की, लेकिन उसकी आँखों में वही ठंडक थी। उसने रुमाल से अपने हाथ को पोंछा।
तभी, उसने धीमे स्वर में, जैसे खुद से बात कर रही हो, कहा—
लोग इतना अपराध क्यों करते हैं? अगर कानून उन्हें सही सजा दे दे, तो क्यों मुझे अपने हाथ गंदे करने पड़ें?
विराट ने यह वाक्य सुना, लेकिन उसे लगा कि संयोगिता शायद किसी फिल्म या समाचार की बात कर रही है, या फिर अपने तनाव को जायज ठहरा रही है। उसने गौर नहीं किया कि इन शब्दों में कितना गहरा अर्थ छिपा था।
विराट बोला -
कानून अपनी गति से चलता है, संयोगिता। हमें सब्र रखना होगा।
संयोगिता ने सिर हिलाया और उठकर अपने कमरे की तरफ चली गई।
रास्ते में, उसने मन ही मन सोचा—
सब्र? जब तक कानून जागेगा, तब तक कई राहुल पैदा हो जाएंगे। और मेरा काम है उन्हें समय से पहले ही खत्म करना।"
लेकिन उसे नहीं पता था कि विराट की नजरें अब उस पर हमेशा के लिए बदल चुकी थीं। वह अब सिर्फ 'संपूर्णा की परछाई' नहीं थी, बल्कि एक रहस्यमयी महिला थी, जिसके पास कुछ ऐसे राज थे जो विराट समझ नहीं पा रहा था।
और शहर के दूसरे कोने में, इंस्पेक्टर वर्मा को एक नया सुराग मिला था—राहुल के फोन की लास्ट लोकेशन के पास एक ट्रक ड्राइवर का बयान, जिसने एक महिला को रात के अंधेरे में कुछ जलाते हुए देखा था।
ड्राइवर ने कहा था—
सर, वो महिला बहुत खतरनाक लग रही थी। उसकी आँखों में इंसानियत नहीं थी...
इंस्पेक्टर वर्मा ने फाइल बंद की और मुस्कुराया।
वो बोला -
अब शिकार पास है।