रविवार की शाम संयोगिता के घर में काफी चहल-पहल थी।
उसके माता-पिता ने घर को अच्छी तरह से सजा रखा था। कुछ ही देर में लड़के वाले आ गए। संयोगिता हल्के रंग की साड़ी पहनकर चाय की ट्रे लेकर कमरे में आई। उसने नजरें झुकाकर सबको चाय दी और सामने जाकर बैठ गई। लड़का भी उसके सामने बैठा था।नवो देखने में काफी हैंडसम था, पढ़ा-लिखा और समझदार भी लग रहा था।
लेकिन संयोगिता के मन में पहला ही ख्याल आया—
विराट से ज्यादा तो बिल्कुल नहीं।
वो खुद अपने इस विचार पर चौंक गई।
संयोगिता (मन में) बोली -
मैंने विराट से तुलना क्यों की?
उसने तुरंत नजरें झुका लीं। लड़का काफी आत्मविश्वास से बात कर रहा था।
लड़का बोला -
मैंने इंजीनियरिंग के बाद अपना बिजनेस शुरू किया। अभी कंपनी का विस्तार कर रहा हूँ। वैसे मुझे घूमना बहुत पसंद है…
वो लगातार बोलता जा रहा था। संयोगिता चुपचाप सुन रही थी। कुछ मिनट बाद लड़के ने फिर एक नया विषय शुरू कर दिया।
लड़का बोला -
और हाँ, मैं बहुत सोशल हूँ। मुझे बिल्कुल पसंद नहीं कि मेरी पत्नी हर वक्त चुप बैठी रहे। मैं चाहता हूँ कि मेरी पत्नी मेरे साथ हर चीज़ शेयर करे…।
संयोगिता ने उसकी तरफ देखा। वो अब भी बोल रहा था।
उसने मन ही मन सोचा—
ये इंसान इतना बोलता क्यों है?
उसके माता-पिता मुस्कुरा रहे थे।
लड़के की माँ ने संयोगिता से पूछा—
बेटा, तुम्हें हमारा बेटा कैसा लगा?
संयोगिता ने शिष्टता से जवाब दिया—
अच्छा है।
लेकिन उसके मन में कोई उत्साह नहीं था। लड़का संयोगिता से कुछ पूछ रहा था। लेकिन संयोगिता का ध्यान कहीं और था।
उसे विराट की शांत आवाज़ याद आ गई। विराट ज्यादा बातें नहीं करता था। लेकिन जब संयोगिता परेशान होती थी, तो बिना ज्यादा सवाल किए समझ जाता था। उसे विवान के साथ विराट का व्यवहार याद आया।
और अचानक उसके मन में वही सवाल आया—
अगर मुझे शादी करनी ही है… तो मैं विराट जैसा इंसान क्यों चाहती हूँ?
उसने तुरंत अपने विचारों को रोक दिया।
संयोगिता (मन में) बोली -
“हीं… ये सिर्फ इसलिए है क्योंकि मैं उन्हें जानती हूँ।
लेकिन दिल शायद अब बहाना सुनने के लिए तैयार नहीं था।
लड़के वाले आखिरकार चले गए। दरवाज़ा बंद होते ही संयोगिता ने लंबी साँस ली। उसकी माँ मुस्कुराते हुए उसके पास आईं।
माँ बोलीं -
तो बेटा, कैसा लगा लड़का?
संयोगिता ने तुरंत अपना चेहरा बना लिया।
संयोगिता बोली -
ऐसा पंचायती लड़का देखा है आपने?
माँ और पापा एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
संयोगिता बोली -
मेरी तो सुन ही नहीं रहा था! खुद ही बोले जा रहा था, बोले जा रहा था… लगता था रेडियो चालू है।
पापा अपनी हँसी रोकने लगे।
संयोगिता बोली -
मैं नहीं करूँगी उस सिरदर्द से शादी। पूरी जिंदगी उसकी बातें सुनती रहूँगी क्या?
माँ ने उसे समझाते हुए कहा—
लेकिन बेटा, लड़का पढ़ा-लिखा है, समझदार है…
संयोगिता बोली -
तो क्या हुआ? समझदार होने का मतलब ये थोड़ी है कि सामने वाले को बोलने का मौका ही न दो!
पापा हँस पड़े।
पापा बोले -
तो हमारी बेटी को ऐसा लड़का चाहिए जो कम बोले?
संयोगिता ने बिना सोचे जवाब दिया—
हाँ! जो जरूरत के वक्त बोले, समझे और…
वो अचानक रुक गई। उसके दिमाग में विराट का चेहरा आ गया।
वो धीरे से बोली—
जो बिना कहे भी समझ जाए…
माँ ने उसकी बात पकड़ ली।
माँ बोली -
क्या कहा?
संयोगिता तुरंत संभल गई।
संयोगिता बोली -
कुछ नहीं!
वो अपने कमरे की तरफ जाने लगी। माँ पीछे से मुस्कुराईं।
माँ बोलीं -
हमें तो लगता है बेटी के मन में पहले से कोई है।
संयोगिता के कदम अचानक रुक गए। उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
संयोगिता (मन में) बोली -
क्या सच में…?
कुछ दिन बीत गए। आज चौहान कंपनी में एक विशेष समारोह था। पूरा कार्यालय रोशनी और फूलों से सजा हुआ था।
कर्मचारी भी उत्साह में थे। शाम होते-होते संयोगिता कार्यालय पहुँची। उसने एक बेहद सुंदर साड़ी पहन रखी थी। उसके खुले बाल और सादगी भरा श्रृंगार उसकी खूबसूरती को और निखार रहे थे। उसे देखते ही कई कर्मचारियों के कदम रुक गए।
कुछ पल के लिए ऐसा लगा जैसे—
संपूर्णा वापस आ गई हो।
चेहरा वही…कद-काठी वही…बस आँखों में वो चंचलता नहीं थी। कुछ देर बाद विराट भी विवान को लेकर समारोह में पहुँचा। उसके साथ काजल और उसके पति प्रेम भी थे। ऋषभ और वर्षा भी उनके साथ आए थे। विवान पूरे रास्ते उत्साहित था।
विवान बोला -
पापा! आज पार्टी में केक मिलेगा ना?
विराट मुस्कुराया।
विराट बोला -
हाँ, मिलेगा। लेकिन पहले सबको नमस्ते करना।
विवान ने तुरंत सिर हिलाया। विराट के माता-पिता आज नहीं आए थे।
उन्होंने साफ कह दिया था—
ये जवान बच्चों की पार्टी है। हम बूढ़े वहाँ जाकर क्या करेंगे?
इसलिए आज पूरा युवा परिवार ही समारोह में आया था। जैसे ही विवान की नजर संयोगिता पर पड़ी, वो तुरंत उसकी तरफ दौड़ा।
विवान बोला -
मम्मा!
संयोगिता ने मुस्कुराकर अपनी बाँहें खोल दीं। विवान उससे लिपट गया।
संयोगिता बोली -
अरे मेरा राजा बाबू! कितने अच्छे लग रहे हो आज।
विवान ने गर्व से अपनी शर्ट दिखाई।
विवान बोला -
पापा ने तैयार किया है।
संयोगिता ने विराट की तरफ देखा। विराट मुस्कुरा रहा था।
संयोगिता बोली -
अच्छा… तो आज पापा ने मेहनत की है।
विराट ने मजाक में कहा—
हाँ, कभी-कभी मैं भी अच्छा पिता बन जाता हूँ।
संयोगिता हल्का-सा हँस दी। काजल उन्हें देख रही थी। उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान थी। उसे संपूर्णा की याद आ रही थी। लेकिन आज पहली बार उसे ये भी लगा संयोगिता और विवान के बीच रिश्ता अब सिर्फ एक औपचारिक रिश्ता नहीं रहा था। विवान के लिए संयोगिता सच में उसकी मम्मा बन चुकी थी।और विराट…वो चुपचाप संयोगिता को देख रहा था।
उसके मन में फिर वही सवाल उठा—
तुम मेरी जिंदगी में इतनी आसानी से कैसे शामिल हो गईं, संयोगिता?