कुछ दिन बीत गए। विवान अब बिल्कुल ठीक था और चौहान हवेली में फिर से पहले जैसी हलचल लौट आई थी। लेकिन संयोगिता के अपने घर में एक अलग ही बात चल रही थी।
शाम को वह अपने माता-पिता के साथ बैठी थी। माँ काफी देर से उसे देख रही थीं। आखिरकार उन्होंने बात शुरू की।
माँ बोलीं -
बेटा…
संयोगिता ने उनकी तरफ देखा।
संयोगिता बोली -
जी माँ?
माँ ने प्यार से उसका हाथ पकड़ लिया।
माँ बोलीं -
तुम 26 की हो गई हो। आखिर कब शादी करोगी?
संयोगिता कुछ पल बिल्कुल शांत रही। उसके दिमाग में अचानक विवान का चेहरा आ गया। फिर विराट…
और संपूर्णा की आखिरी आवाज़—
मेरे पति और मेरे बच्चे का ख्याल रखना…
संयोगिता ने नजरें झुका लीं।
संयोगिता बोली -
माँ, अभी मेरा शादी करने का मन नहीं है।
पिता ने अखबार नीचे रखते हुए कहा—
बेटा, हम तुम पर कोई जबरदस्ती नहीं कर रहे। लेकिन उम्र भी देखनी पड़ती है। अच्छा रिश्ता बार-बार नहीं आता।
माँ ने तुरंत कहा—
हमने तुम्हारे लिए जो रिश्ता देखा है, लड़का बहुत अच्छा है। तुम एक बार मिल तो लो।
संयोगिता चुप रही। माँ ने उसके चेहरे को ध्यान से देखा।
माँ बोलीं -
क्या तुम्हारी जिंदगी में कोई है?
संयोगिता की आँखें एक पल के लिए ठहर गईं। उसके पास इसका जवाब था…लेकिन वो जवाब वो खुद भी किसी को नहीं दे सकती थी।
संयोगिता बोली -
नहीं माँ।
माँ मुस्कुरा दीं।
माँ बोलीं -
तो फिर इतनी परेशानी किस बात की?
संयोगिता ने धीमे से कहा—
पता नहीं…
उसने अपने फोन की स्क्रीन खोली। विवान की तस्वीर सामने थी।
उसे देखते हुए उसके मन में एक ही सवाल था—
अगर मैंने शादी कर ली… तो क्या मैं अपना वादा निभा पाऊँगी?
उसने फोन बंद कर दिया। लेकिन उसके चेहरे पर पहली बार अपने ही भविष्य को लेकर डर साफ दिखाई दे रहा था।
अगले दिन चौहान कंपनी में संयोगिता अपने केबिन में बैठी थी। सामने कई फाइलें खुली थीं, लेकिन उसका ध्यान काम में बिल्कुल नहीं था। वो बार-बार फोन देखती और फिर चुपचाप रख देती। तभी विराट उसके केबिन में आया। उसने संयोगिता को गौर से देखा।
विराट बोला -
क्या हुआ? आप आज बहुत परेशान लग रही हैं।
संयोगिता ने पहले बात टालने की कोशिश की।
संयोगिता बोली -
कुछ नहीं… बस घर की थोड़ी परेशानी है।
विराट उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठ गया।
विराट बोला -
अगर बताना चाहें तो बता सकती हैं।
संयोगिता कुछ पल खामोश रही।
फिर धीमे से बोली—
मेरे घरवाले… मेरे लिए रिश्ते देख रहे हैं।
विराट के चेहरे पर एक पल के लिए अजीब-सी खामोशी छा गई।
विराट बोला -
ओह…
संयोगिता ने उसकी तरफ देखा।
संयोगिता बोली -
वो चाहते हैं कि मैं शादी कर लूँ।
विराट ने नजरें झुका लीं। कुछ सेकंड तक दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई।
फिर विराट ने सामान्य स्वर में पूछा—
और आप?
संयोगिता ने लंबी साँस ली।
संयोगिता बोली -
मैं… शादी नहीं करना चाहती।
विराट ने उसकी तरफ देखा।
विराट बोला -
क्यों?
संयोगिता के मन में तुरंत विवान का चेहरा आया। फिर संपूर्णा की आखिरी बात।
उसने बस इतना कहा—
क्योंकि मेरी जिंदगी में कुछ जिम्मेदारियाँ हैं… जिन्हें मैं छोड़ नहीं सकती।
विराट उसकी बात समझ नहीं पाया।
लेकिन उसके मन में एक सवाल जरूर उठ गया—
ऐसी कौन-सी जिम्मेदारी है, जिसके लिए संयोगिता अपनी पूरी जिंदगी बदलने को तैयार नहीं है?
उधर संयोगिता के मन में सिर्फ एक डर था—
अगर उसके माता-पिता ने शादी के लिए मजबूर कर दिया… तो वह विवान और विराट से दूर कैसे होगी?
संयोगिता अपने केबिन में अकेली बैठी थी। विराट के साथ हुई बातचीत बार-बार उसके दिमाग में घूम रही थी।
और आप?
उस सवाल ने जैसे उसके अंदर कुछ हिला दिया था। वो कुर्सी से उठी और खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई। उसे खुद समझ नहीं आ रहा था कि वो इतनी परेशान क्यों है। उसे सिर्फ इतना पता था कि जब विराट किसी और से हँसकर बात करता है, तो उसे अच्छा नहीं लगता। जब विराट परेशान होता है, तो उसका मन बेचैन हो जाता है। जब विवान उसे “मम्मा” कहकर पुकारता है, तो उसका दिल भर आता है। और जब विराट उसे “संयोगिता” कहकर आवाज़ देता है…तो उसके चेहरे पर अनजाने में मुस्कान आ जाती है। लेकिन उसने कभी इन एहसासों को कोई नाम नहीं दिया था।
काँच के दरवाज़े से उसे विराट दिखाई दिया। वो एक कर्मचारी से बात कर रहा था। फिर अचानक कर्मचारी ने कोई मजेदार बात कह दी। विराट हल्का-सा मुस्कुरा दिया। संयोगिता उसे देखती रह गई। कुछ पल बाद उसे एहसास हुआ कि वो काफी देर से उसे ही देख रही है। वो तुरंत नजरें फेरकर अपने लैपटॉप की तरफ देखने लगी।
संयोगिता (मन में) बोली -
मैं इन्हें क्यों देख रही थी?
उसने खुद को समझाया—
वो सिर्फ विवान के पिता हैं… और संपूर्णा के पति थे।
लेकिन दिल ने जैसे उसकी बात मानने से इनकार कर दिया।
शाम को घर जाते समय उसके फोन पर माँ का संदेश आया—
बेटा, रिश्ते वालों से बात हो गई है। रविवार को लड़के वाले घर आने वाले हैं।
संयोगिता के कदम रुक गए। उसके मन में सबसे पहले अपने माता-पिता का चेहरा नहीं आया। विवान आया।फिर विराट।
उसकी आँखों में अचानक बेचैनी उतर आई।
संयोगिता (मन में) बोली -
अगर मैंने शादी कर ली… तो मैं विवान से दूर हो जाऊँगी।
फिर उसने खुद से पूछा—
लेकिन मुझे विराट से दूर होने का इतना डर क्यों लग रहा है?
वो खुद ही अपने सवाल से घबरा गई। रात को संयोगिता बिस्तर पर लेटी थी। उसने आँखें बंद कीं। लेकिन नींद नहीं आई।
उसे विराट की आवाज़ सुनाई दे रही थी—
आप आज बहुत परेशान लग रही हैं।
फिर विवान की आवाज़—
मम्मा, आप मुझे छोड़कर तो नहीं जाओगी ना?
संयोगिता ने तकिया सीने से लगा लिया। उसकी आँखों से एक आँसू निकल गया। उसे अभी तक अहसास नहीं था कि ये सिर्फ संपूर्णा से किया हुआ वादा नहीं था। धीरे-धीरे…वो विराट को चाहने लगी थी। लेकिन संयोगिता इस सच्चाई से अभी भी अनजान थी।
और सबसे बड़ा सवाल यही था—
अगर उसे सच का एहसास हो गया… तो क्या वो अपने दिल की सुनेगी या अपने किए हुए वादे की?