एपिसोड 46— एक रिपोर्ट, कई राज़
सिटी हॉस्पिटल की शाम बाकी दिनों से कुछ ज्यादा शांत थी।
दिनभर की भागदौड़ के बाद मरीजों के वार्ड में हलचल थोड़ी कम हो गई थी। नर्सें अपनी ड्यूटी में व्यस्त थीं और डॉक्टर अपनी-अपनी रिपोर्ट पूरी करने में लगे थे।
लेकिन मेडिकल कॉलेज से आए उन दस छात्रों के लिए आज का दिन खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था।
खासकर अर्जुन और आयत के लिए।
कुछ देर पहले ही एक अजनबी ने आयत से उसके पिता की मौत को लेकर ऐसी बात कही थी, जिसने उसके मन में सालों से बंद पड़े सवालों को फिर से जगा दिया था।
अर्जुन उसे लेकर हॉस्पिटल के एक शांत कॉरिडोर में आया।
"यहाँ बैठो।"
आयत बेंच पर बैठ गई।
अर्जुन उसके सामने खड़ा रहा।
"अब मुझे पूरी बात बताओ। उसने तुमसे क्या कहा?"
आयत ने कुछ पल चुप रहने के बाद कहा,
"उसने कहा कि मेरे पापा की मौत कोई हादसा नहीं थी।"
अर्जुन का चेहरा गंभीर हो गया।
"और कुछ?"
"मैंने पूछा कि वो मेरे पापा को कैसे जानता है... लेकिन तभी आप आ गए।"
अर्जुन ने लंबी साँस ली।
"उसका चेहरा याद है?"
"हाँ।"
"अगर सामने आए तो पहचान लोगी?"
आयत ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
अर्जुन कुछ सोचने लगा।
फिर बोला,
"ठीक है। अभी इस बात को किसी और से मत कहना।"
आयत ने उसकी तरफ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे शक है कि हॉस्पिटल में कोई हमारी निगरानी कर रहा है।"
आयत की आँखें फैल गईं।
"आपको सच में ऐसा लगता है?"
"हाँ।"
"तो फिर हम यहाँ सुरक्षित नहीं हैं?"
अर्जुन उसके पास बैठ गया।
"जब तक हम सावधान हैं, कोई तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचा सकता।"
आयत ने धीमे से पूछा,
"और अगर आपको कुछ हो गया तो?"
अर्जुन उसकी तरफ देखने लगा।
"मुझे कुछ नहीं होगा।"
"आपको इतना भरोसा कैसे है?"
अर्जुन हल्का-सा मुस्कुराया।
"क्योंकि अभी मुझे तुम्हारे बहुत सारे सवालों के जवाब देने हैं।"
आयत के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
कुछ पल के लिए दोनों के बीच खामोशी छा गई।
फिर आयत ने धीरे से कहा,
"अर्जुन..."
"हम्म?"
"अगर मेरे अतीत में सच में कोई बहुत बड़ा राज़ है... तो क्या आप उसे मेरे साथ मिलकर ढूँढेंगे?"
अर्जुन ने बिना किसी झिझक के कहा,
"हाँ।"
"चाहे उससे आपके परिवार को नुकसान हो?"
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
"सच किसी परिवार का नहीं होता, आयत। सच... बस सच होता है।"
आयत उसे देखती रह गई।
उसके दिल में अर्जुन के लिए जो एहसास पिछले कुछ दिनों से धीरे-धीरे जन्म ले रहा था, वह अब और गहरा हो रहा था।
अचानक आई खबर
तभी गौरव तेज़ी से उनकी तरफ आया।
"अर्जुन!"
अर्जुन तुरंत खड़ा हो गया।
"क्या हुआ?"
गौरव ने कहा,
"सीनियर डॉक्टर ने तुम्हें तुरंत बुलाया है।"
"क्यों?"
"पता नहीं। बस कहा है कि इमरजेंसी केस है।"
अर्जुन ने आयत की तरफ देखा।
"तुम यहीं रहना।"
आयत ने सिर हिलाया।
"ठीक है।"
अर्जुन और गौरव वहाँ से चले गए।
लेकिन आयत अकेली बैठी रही।
कुछ सेकंड बाद उसे अपनी जेब में रखा कागज याद आया।
वही कागज जिस पर लिखा था—
कमरा नंबर 27।
उसने उसे बाहर निकाला।
वह उसे देखने लगी।
तभी उसके पीछे से किसी की आवाज आई—
"आप आयत खान हैं?"
आयत ने पलटकर देखा।
एक अधेड़ उम्र का आदमी खड़ा था।
"जी?"
"मैं आपके पिता को जानता था।"
आयत का दिल जोर से धड़कने लगा।
"आप... मेरे पापा को जानते थे?"
आदमी ने सिर हिलाया।
"बहुत अच्छी तरह।"
"आप कौन हैं?"
उस आदमी ने चारों तरफ देखा।
"यहाँ बात करना ठीक नहीं है।"
"तो कहाँ?"
"हॉस्पिटल की पुरानी लाइब्रेरी के पीछे एक छोटा-सा कमरा है। वहाँ आइए।"
आयत कुछ पल सोचती रही।
फिर उसने पूछा,
"आप मुझे मेरे पापा के बारे में क्या बताना चाहते हैं?"
आदमी ने सिर्फ इतना कहा,
"वो अपनी मौत से कुछ दिन पहले बहुत डरे हुए थे।"
आयत के चेहरे का रंग बदल गया।
"किससे?"
आदमी ने जवाब नहीं दिया।
वह मुड़कर आगे बढ़ गया।
आयत उसके पीछे जाने लगी।
लेकिन उसे नहीं पता था कि कुछ दूरी पर खड़ा एक व्यक्ति उसकी हर हरकत देख रहा था।
अर्जुन को मिली दूसरी रिपोर्ट
उधर अर्जुन इमरजेंसी यूनिट में पहुँचा।
सीनियर डॉक्टर ने उसे एक फाइल दी।
"इसे ध्यान से देखो।"
अर्जुन ने फाइल खोली।
मरीज का नाम पढ़ते ही उसकी भौंहें सिकुड़ गईं।
राघव मेहरा।
वही नाम जो आयत की रिपोर्ट में था।
अर्जुन ने पूछा,
"ये मरीज यहाँ कब से हैं?"
डॉक्टर ने कहा,
"कल रात से।"
"लेकिन मुझे इनकी रिपोर्ट पहले क्यों नहीं मिली?"
"क्योंकि केस हमारे सीनियर कंसल्टेंट के अंडर है। तुम्हें सिर्फ उनकी ऑब्जर्वेशन करनी है।"
अर्जुन ने रिपोर्ट पढ़नी शुरू की।
कुछ ही सेकंड बाद उसकी नजर एक मेडिकल नोट पर जाकर रुक गई।
उसमें लिखा था—
**"पुरानी चोटों के निशान।"
अर्जुन ने डॉक्टर की तरफ देखा।
"इनके शरीर पर पुरानी चोटें हैं?"
डॉक्टर ने कहा,
"हाँ। लेकिन हमें नहीं पता कि ये चोटें कब की हैं।"
अर्जुन कुछ सोचने लगा।
उसे रोहन याद आया।
और फिर उसके पिता की पुरानी फाइल।
क्या दोनों चीज़ों के बीच कोई संबंध था?
आयत और अजनबी
हॉस्पिटल की पुरानी लाइब्रेरी के पीछे आयत उस आदमी के पास पहुँची।
कमरा छोटा था और वहाँ पुराने मेडिकल रिकॉर्ड के ढेर पड़े थे।
आदमी ने दरवाजा बंद किया।
आयत थोड़ा घबरा गई।
"आपने मुझे यहाँ क्यों बुलाया?"
आदमी ने कहा,
"क्योंकि जो मैं बताने जा रहा हूँ, वो तुम्हारी पूरी जिंदगी बदल सकता है।"
आयत ने खुद को संभाला।
"बताइए।"
आदमी ने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली।
तस्वीर देखकर आयत की आँखें फैल गईं।
वह उसके पिता थे।
लेकिन उनके साथ...
राघव मेहरा भी खड़े थे।
आयत ने तस्वीर हाथ में लेते हुए पूछा,
"ये कहाँ की तस्वीर है?"
"लखनऊ। पंद्रह साल पहले की।"
"मेरे पापा राघव मेहरा के साथ क्या कर रहे थे?"
आदमी ने कहा,
"तुम्हारे पिता और राघव मेहरा एक ही प्रोजेक्ट पर काम करते थे।"
"कौन-सा प्रोजेक्ट?"
आदमी ने उसकी आँखों में देखा।
"A-27।"
आयत का चेहरा सफेद पड़ गया।
"कमरा नंबर 27?"
"नहीं।"
आदमी ने धीमे से कहा,
"कमरा नंबर 27 तो सिर्फ उस प्रोजेक्ट के सबूत छिपाने की जगह थी। असली प्रोजेक्ट कुछ और था।"
आयत की आवाज काँप गई।
"क्या?"
आदमी ने कहा,
"तुम।"
आयत पीछे हट गई।
"मैं?"
"हाँ।"
"मेरे पापा मेरे ऊपर कोई प्रोजेक्ट क्यों करेंगे?"
आदमी ने कहा,
"क्योंकि तुम पैदा होते ही ऐसी चीज़ लेकर आई थीं, जिसकी वजह से कई बड़े लोग डरते थे।"
आयत कुछ समझ नहीं पा रही थी।
"कौन-सी चीज़?"
आदमी कुछ कहता, उससे पहले दरवाजा खुल गया।
अर्जुन सामने खड़ा था।
उसकी आँखों में गुस्सा था।
"आयत!"
आयत ने उसे देखा।
"अर्जुन..."
अर्जुन तेजी से उसके पास आया।
"मैंने तुम्हें यहाँ अकेले आने से मना किया था।"
आयत ने कहा,
"लेकिन ये मेरे पापा को जानते थे।"
अर्जुन ने उस आदमी की तरफ देखा।
"आप कौन हैं?"
आदमी चुप रहा।
अर्जुन ने फिर पूछा,
"नाम?"
कुछ सेकंड बाद उसने कहा,
"इमरान।"
अर्जुन की नजर उस पर टिकी रही।
"और आप आयत के पिता को कैसे जानते थे?"
इमरान ने जवाब दिया,
"मैं उनके साथ काम करता था।"
अर्जुन ने पूछा,
"किसके लिए?"
इमरान ने धीमे स्वर में कहा—
"रुद्र वशिष्ठ के लिए।"
अर्जुन की मुट्ठी कस गई।
रोहन की बेचैनी
उधर रोहन अपने पिता के कमरे में फिर से उस फाइल को देख रहा था।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके पिता और आयत के पिता के बीच आखिर ऐसा क्या संबंध था।
तभी उसके फोन पर मैसेज आया।
"अगर सच जानना है तो आज रात 11 बजे पुराने रेलवे यार्ड में आओ। अकेले।"
रोहन ने मैसेज पढ़ा।
नंबर अनजान था।
उसने कुछ देर सोचा।
फिर रिप्लाई किया—
"तुम कौन हो?"
तुरंत जवाब आया—
"वही आदमी जिसने तुम्हारे पिता का सच तुम्हारे सामने रखा।"
रोहन के चेहरे पर गंभीरता आ गई।
वह जानता था कि यह जाल भी हो सकता है।
लेकिन अब वह पीछे हटना नहीं चाहता था।
उसने जैकेट उठाई।
"आज पता चल जाएगा।"
वापस अस्पताल
अर्जुन ने इमरान को घूरते हुए पूछा,
"रुद्र के लिए क्या काम करते थे?"
इमरान ने कहा,
"बहुत साल पहले।"
"और A-27?"
इमरान ने आयत की तरफ देखा।
"ये वो कहानी है जिसे तुम्हारे परिवार ने तुम दोनों से छिपाया है।"
अर्जुन ने तुरंत कहा,
"साफ-साफ बोलिए।"
इमरान ने गहरी साँस ली।
"पंद्रह साल पहले रुद्र सिर्फ पैसे के पीछे नहीं था। उसे एक ऐसी चीज़ चाहिए थी जो आयत के पास थी।"
आयत ने पूछा,
"क्या?"
इमरान ने उसकी तरफ देखा।
"एक रिकॉर्ड।"
"किस चीज़ का?"
"एक ऐसा रिकॉर्ड जो साबित कर सकता था कि रुद्र ने कई लोगों की जिंदगी बर्बाद की थी।"
अर्जुन ने पूछा,
"और वो रिकॉर्ड कहाँ है?"
इमरान ने आयत के लॉकेट की तरफ देखा।
"उसी के अंदर।"
आयत ने तुरंत अपना लॉकेट पकड़ लिया।
अर्जुन की आँखें फैल गईं।
"लेकिन हमने तो इसे खोला था।"
इमरान ने कहा,
"तुमने सिर्फ पहला हिस्सा देखा है।"
अर्जुन ने पूछा,
"दूसरा हिस्सा?"
इमरान ने जवाब दिया—
"उसे खोलने के लिए तुम्हें उस इंसान की जरूरत होगी जिसने इसे बनाया था।"
"कौन?"
इमरान ने दरवाजे की तरफ देखा।
फिर धीरे से बोला—
"तुम्हारे दादा।"
अर्जुन स्तब्ध रह गया।
उसी समय अस्पताल की लाइट अचानक बंद हो गई।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
आयत ने डरकर अर्जुन का हाथ पकड़ लिया।
बाहर से किसी के दौड़ने की आवाज आई।
अर्जुन ने तुरंत आयत को अपने पीछे किया।
कुछ सेकंड बाद लाइट वापस आई।
लेकिन...
इमरान वहाँ नहीं था।
दरवाजा खुला हुआ था।
अर्जुन ने बाहर दौड़कर देखा।
कॉरिडोर खाली था।
बस फर्श पर एक छोटा-सा कागज पड़ा था।
उसने कागज उठाया।
उस पर सिर्फ एक लाइन लिखी थी—
"अगला सच जानना है तो वशिष्ठ हवेली के पुराने मंदिर में जाना। वहाँ तुम्हें अपने दादा का आखिरी संदेश मिलेगा।"
अर्जुन ने कागज को कसकर पकड़ लिया।
आयत उसके पास आकर खड़ी हो गई।
"अर्जुन..."
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
"अब हमें वापस हवेली जाना होगा।"
लेकिन उसी वक्त...
दूर खड़े रोहन ने अपने फोन पर एक तस्वीर देखी।
तस्वीर में अर्जुन और आयत अस्पताल से बाहर निकल रहे थे।
और तस्वीर के नीचे लिखा था—
"अगर अर्जुन को रोकना है, तो आयत को उससे अलग करो।"
रोहन ने कुछ पल स्क्रीन को देखा।
फिर उसके चेहरे पर एक अजीब-सी मुस्कान आई।
"तो अब खेल शुरू करते हैं..."
क्रमशः...