अध्याय-१७
अपूर्व जब अपने कमरे में गया, तब भार्गवी अलमारी में कपड़े व्यवस्थित रख रही थी। वह पीठ फेरकर खड़ी होकर अपना काम कर रही थी, इसलिए उसे अंदाज़ नहीं था कि अपूर्व दरवाज़े के पास खड़ा होकर उसे ही निहार रहा है। भार्गवी कपड़े रखकर अलमारी का दरवाज़ा बंद करने ही वाली थी कि उसकी नज़र अपूर्व के उस कोट पर पड़ी, जो उसने अपनी शादी के समय पहना था। उसने उस कोट पर हाथ फेरा और बोली, "अपूर्व, मैं आपकी विरोधी नहीं हूँ, लेकिन हमारे विचार अलग होने के कारण आज रात खाना खाते समय मैं अमृता भाभी और राजेश भाई के भविष्य के लिए बच्चे की बात सबके सामने ज़रूर रखूँगी। मुझे माफ कर देना अपूर्व..."
इतना बोलकर वह निराश होकर दरवाज़ा बंद कर उस पर सिर टिकाकर जैसे एक गहरी ठंडी सांस भर रही थी, तभी अपूर्व उसके पास गया और धीरे से उसके कान के पास बोला, "मैं जानता हूँ कि तुम मेरे विरोध में नहीं हो सकतीं..."
अचानक अपूर्व की बात सुनकर भार्गवी बहुत खुश हो गई और खुशी के मारे उससे लिपट गई। अपूर्व ने भी उसे सहज होने दिया। कुछ क्षण ऐसे ही रहने के बाद अपूर्व ने भार्गवी से माफी मांगी और कहा, "कल मैंने तुम्हारे साथ जैसा व्यवहार किया, मुझे वैसा नहीं करना चाहिए था। पर जो हुआ सो हुआ, अब आज नहीं... २-४ दिन बीत जाने दो, फिर मैं खुद राजेश भाई से बात करूँगा।"
भार्गवी को अपने कानों पर यकीन ही नहीं आया। उसने तुरंत वादा माँग लिया; क्योंकि आज पूरे दिन भार्गवी को अपने साथ जो भी हुआ था, वह सब किसी फिल्म की रील की तरह एक-एक करके आँखों के सामने आ रहा था। इसलिए वह अपूर्व को वचनबद्ध करना चाहती थी। वह किसी भी कीमत पर अमृता भाभी के साथ अन्याय न हो, इसकी सावधानी रखना चाहती थी और अपूर्व ने भार्गवी को वचन देकर उसे थोड़ी सफलता दिला दी थी। भार्गवी का जैसे आधा बोझ हल्का हो गया। फिर भी मन में बसी अपूर्व की पुरानी छवि के कारण उसे डर था कि कहीं अभी मुझे मना कर दिया और बाद में वह खुद भी न कहे तो? ऐसा नकारात्मक विचार आने के बावजूद भार्गवी ने यही अंतिम राय मन में रखी कि अपूर्व मन में कोई पाप रखकर वचन नहीं दे रहा है। इसके बाद दोनों खाना खाने के लिए डायनिंग टेबल की तरफ गए। अपूर्व को देर हो गई थी, इसलिए घर के कुछ सदस्यों ने खाना खा लिया था। भव्या तो सो भी चुकी थी।
राजेश अपने मन में बहुत ग्लानि अनुभव कर रहा था। उसे लग रहा था कि मैंने पति के तौर पर कोई फर्ज़ निभाया ही नहीं। उसे मन ही मन विचारों में डूबा देखकर अमृता बोली, "आप बेवजह चिंता मत कीजिए, जो होना होगा वह होगा, लेकिन ऐसे चिंता करेंगे तो आपकी तबीयत भी खराब हो जाएगी। मैं देख रही हूँ कि आप ठीक से खाना भी नहीं खा रहे हैं, अभी भी ठीक से नहीं खाया।" दोनों के बीच बात चल ही रही थी कि अचानक अमृता के पेट में बहुत तेज दर्द होने लगा। धीमा-धीमा दर्द सहने की तो अमृता को आदत ही पड़ गई थी, लेकिन अभी का दर्द उससे सहा ही नहीं जा रहा था। राजेश ने तुरंत डॉक्टर को फोन करके अमृता की हालत बताई। डॉक्टर ने कहा, "मैं इस स्थिति को समझ ही गया था, इसीलिए मैंने ऑपरेशन के लिए कहा था। अभी आप मेरे द्वारा दी गई दवाओं में से जो एक अतिरिक्त दवा है, वह अमृता को दे दीजिए, जिससे उसे दर्द में राहत मिलेगी।"
अपूर्व, भार्गवी और शोभाबहन टेबल पर आ गए, लेकिन रमेशभाई अभी तक नहीं आए थे। इसलिए भार्गवी उन्हें बुलाने गई और शोभाबहन को जैसे मौका मिल गया।
भार्गवी रमेशभाई को बुलाने सीधे पूजा घर में गई; क्योंकि उनकी आदत थी कि जब भी उनका मन अशांत होता, वे भगवान के पास बैठकर माला जपते थे। भार्गवी भी वहीं बैठ गई और उनकी माला पूरी होने का इंतज़ार करने लगी, क्योंकि बीच में माला में बाधा डालना भार्गवी को ठीक नहीं लगा।
शोभाबहन ने फिर बात शुरू की, "अपूर्व बेटा! मेरी चिंता में तू किस उलझन में था, यह तो तूने बताया ही नहीं।"
माँ के इस सवाल से अपूर्व को याद आया कि ऑफिस से आया तब माँ रो रही थीं। इसलिए उसने माँ से पलटकर सवाल किया, "आप क्यों रो रही थीं?"
जैसा वैद्य ने कहा था वैसा ही हुआ, शोभाबहन ने अपनी बात शुरू कर दी, "बेटा, मैं भी एक माँ हूँ। मुझे भी तकलीफ होती है अगर घर में सब खुश न हों तो... इसमें अमृता और भार्गवी दोनों मिलकर इस घर में अशांति ही पैदा कर रही हैं। वे दोनों शाम को खाना बनाते समय कुछ बात कर रही थीं, लेकिन मैं जैसे ही रसोई में गई कि बात करना बंद कर दिया... वे ज़रूर कोई षड्यंत्र ही रच रही होंगी, उसी चिंता में मन दुःखी था, जो तूने भांप लिया।" इतना बोलकर वे देखने लगीं कि अपूर्व क्या प्रतिक्रिया देता है।
अपूर्व ने बात शांति से सुनी, लेकिन अब उसकी आँखों से पर्दा हट चुका था। इसलिए उसने माँ से पूछा, "आपको उनकी किस बात से ऐसा लगा? आपने ऐसा क्या सुना? और ऐसा क्या देखा कि आप दावे के साथ कह रही हैं कि वे दोनों कोई षड्यंत्र ही रच रही थीं...? मुझे बताइए ताकि अभी बात का खुलासा हो जाए... भार्गवी आए तो उससे पूछता हूँ और अगर कोई आनाकानी करेगी तो दो थप्पड़ मारूँगा तो सब सच-सच उगल देगी।"
शोभाबहन थोड़ा घबरा गईं; क्योंकि आज पूरे दिन अमृता आराम ही कर रही थी। थोड़ा-बहुत काम किया लेकिन रसोई में तो गई ही नहीं थी। इसलिए अब बात को पकड़े रहने में शोभाबहन को अपना ही नुकसान लगा, इसलिए उन्होंने तुरंत बात बदलते हुए कहा, "मैंने तो तुझसे बस इतना कहा था कि मुझे ऐसा वहम हुआ था, और भला वहम पर भी कोई सफाई दी जाती है बेटा??"
अपूर्व तुरंत अपनी माँ की झूठी बात समझ गया। आज जो थोड़ा-बहुत भी उसके मन में अपनी माँ के लिए सम्मान बचा था, वह भी पूरी तरह खत्म हो गया। मन में दर्द की एक आह अपूर्व के दिल को चीर गई कि 'क्या यह मेरी माँ हैं?!! कोई माँ भला ऐसी कैसे हो सकती है?'