अध्याय - ५
गायत्री अपनी दिनचर्या समाप्त करके घर के मंदिर में दीपक जलाते हुए प्रार्थना कर रही थी। उसे बहुत अफ़सोस हो रहा था। उसके मन-मस्तिष्क पर लगातार अमृता भाभी की स्थिति ही छाई हुई थी। अब तक उसके मन में भाभी के लिए सिर्फ़ सम्मान था, लेकिन आज से जैसे भाभी के प्रति विशेष सम्मान उमड़ रहा था... और इसका एकमात्र कारण यह था कि उसकी भाभी पिछले १२ वर्षों से इस दर्द को दिल में दबाकर अपने मायके और ससुराल की इज़्ज़त बचाकर बैठी हैं, वरना बिना किसी कारण के अपने चरित्र पर लगे आक्षेप भला कौन सह पाता है? इसके अलावा, सही होते हुए भी सच्चाई का प्रमाण देना पड़े, उससे बेहतर उन्होंने रिश्ते के अनुरूप मौन धारण करना ही बेहतर समझा था।
आज भार्गवी को उसकी भाभी सही मायनों में समझ में आईं। और उसके मन में अपनी भाभी के लिए बहुत सम्मान जाग उठा। वह सोच रही थी कि मैं इतनी स्वार्थी क्यों बन गई? कुदरत ने मुझे यह कैसी ठोकर मारी है? कर्म का यह कैसा सिद्धांत है? अचानक ही मुझे लगी यह ठोकर? क्या यह भी कर्म का ही सिद्धांत होगा? और इस एक ठोकर ने मुझे कितना समझदार बना दिया!
तभी उसकी नज़र सामने मंदिर में रखी प्रभु की मूर्ति पर पड़ी। उसे देखकर वह मन ही मन बोली,
प्रभु तेरी लीला अपरंपार, जीवन हुआ सबका तार-तार।
रही बाकी अब यही आस, अब तू हम सबको उबार॥
उसकी आँखें बंद हो गईं और उसने दोनों हाथ जोड़ लिए। फिर धीरे-धीरे वह विचारशून्य होती गई... तभी अमृता भाभी ने उसकी तंद्रा तोड़ी, "चलिए गायत्री बहन, चाय-नाश्ता कर लीजिए..."
गायत्री एकदम वर्तमान स्थिति में आ गई! आँखों के आँसू पोंछते हुए वह भाभी की तरफ़ मुड़ी। भाभी पिछले १० वर्षों से अमेरिका जैसे देश में रह रही हैं, फिर भी वही भारतीय सादगी आज भी उनके चेहरे पर चमक रही थी, इस बात पर गौर किए बिना आज गायत्री न रह सकी। वह भाभी को प्यार भरी नज़रों से निहारती रही।
भाभी फिर बोलीं, "किन विचारों में खोई हैं? गायत्री बहन, चिंता मत कीजिए, भगवान सब ठीक ही करेंगे। चलिए अब नाश्ता कर लीजिए। हम मानस कुमार को फोन करके मिलने का समय तय कर लेते हैं।"
भाभी के इन शब्दों ने गायत्री को गमगीन कर दिया। गायत्री बहुत भावुक हो गई और उससे भाभी से कहे बिना नहीं रहा गया, "भाभी, मैं आपकी गुनहगार हूँ, मुझे माफ़ कर दीजिए।" इतना बोलते ही उसकी आँखों से लगातार आँसू बहने लगे और वह रो पड़ी... अमृता ने उसे शांत कराते हुए कहा, "रोइए मत बहन, इसमें आपका क्या दोष? जो होना था वह तो हो गया। वह समय अलग था और वह बीत भी गया, और आज का समय भी अलग है। तब मैं चुप रही, लेकिन आज समझ आता है कि उस समय मुझे आवाज़ उठाने की ज़रूरत थी।"
गायत्री अपनी की हुई गलती का पश्चाताप करना चाहती थी। उसने भाभी से कहा, "१२ साल पहले भाई के साथ आपकी जो बात हुई थी, मैं उस बात को जानती हूँ..." अमृता भाभी ने बात टालते हुए कहा, "ऐसी क्या बात थी? मुझे तो कुछ याद नहीं कि १२ साल पहले क्या बात हुई थी...?"
गायत्री ने सारी बात साफ़-साफ़ बताई और अपनी माँ का षड्यंत्र भी भाभी के सामने ज़ाहिर कर दिया। उसने कहा, "माँ ने भाई की नज़र में आपके चरित्र को गलत तरीके से पेश क्यों किया...? और मैं मजबूर थी क्योंकि मुझे पढ़ना था और माँ का डर भी था! आज जब वही सब मेरे जीवन में भी दोबारा हुआ और बात मेरे चरित्र पर आई, तब मुझे आपकी स्थिति समझ आई। उस दिन मैंने चुप रहकर जो पाप किया था, उसी का फल मैं आज भुगत रही हूँ।" इतना बोलते-बोलते गायत्री बहन फिर रो पड़ीं। उनकी वह रोती हुई और अस्पष्ट आवाज़ अमृता के हृदय को कहीं न कहीं छू गई।
अमृता ने कहा, "जो हुआ सो हुआ, लेकिन अब फिर कभी ऐसी बात मत बोलना। क्योंकि अगर माँ का षड्यंत्र सबके सामने आ गया, तो माँ को खुद इस उम्र में बहुत शर्मिंदगी महसूस होगी! और मैं तो अब इस माहौल में रहने की आदी हो चुकी हूँ। और जो भुगत रही हूँ, शायद वह मेरे भाग्य में लिखा ही होगा! यह भी मेरे ही किसी कर्म का सिद्धांत होगा ना?"
राजेश दूर खड़ा ननद-भाभी की यह बात सुन रहा था। उसे यह सुनकर खुद पर बहुत गुस्सा आया कि, "अमृता उस रात मुझे कितना समझा रही थी, फिर भी मैं अपनी बात से टस से मस नहीं हुआ और माँ ने जो कहा उसी को सच मानकर बैठ गया... अरे रे! यह मैंने क्या कर दिया?" ऐसा कहते हुए वह गुस्से में अपने कमरे में वापस चला गया।
इधर अमृता और गायत्री दोनों इस बात से बेखबर थीं कि राजेश उन दोनों के बीच का संवाद सुन चुका है। अमृता ने गायत्री के आँसू पोंछे और उसे डाइनिंग टेबल पर बिठाया, तभी भार्गवी भी वहाँ आ गई...
सब साथ बैठकर माहौल को सामान्य बनाए रखने का निरर्थक प्रयास कर रहे थे। लेकिन मन में तो हर किसी के हलचल ही मची हुई थी। जो वे अनुभव कर रहे थे, वह प्रकट नहीं कर रहे थे और जो प्रकट कर रहे थे, वह वास्तव में महसूस हो भी रहा था या नहीं, यह भी एक प्रश्न था! इंसान का मन बहुत अजीब होता है ना! उसके अंदर लगातार कोई न कोई द्वंद्व चलता ही रहता है। यहाँ भी वैसी ही स्थिति थी, फिर भी दूसरों का मन रखने के लिए बेवजह मुस्कुरा लेते थे।
अमृता, भार्गवी और गायत्री नाश्ता करते हुए हल्की-फुल्की बातें कर रही थीं, जो शोभा बहन से बर्दाश्त नहीं हुआ... कभी-कभी घर के एक व्यक्ति का खराब स्वभाव पूरे परिवार को हिलाकर रख देता है और उसके असर से सबको परेशान होना पड़ता है। यहाँ शोभा बहन भी सिर्फ़ अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए अपने ही परिवार की खुशियों को दाँव पर लगाने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाती थीं। शोभा बहन तीनों को नाश्ता करते देखकर इस हद तक भड़क गईं कि उसकी आँच में अपनी ही बेटी को झोंकते हुए तंज कसकर बोलीं, "गायत्री, कल इतनी बड़ी किचकिच हो गई, फिर भी तेरे गले से गरमा-गरम नाश्ता उतर रहा है क्या?"
गायत्री के हाथ से थेपले का टुकड़ा छूट गया और गले में अटका निवाला मानो चुभकर गले में ही फँस गया। गायत्री ने नाश्ते की प्लेट को नमन किया और चाय पीकर खड़ी हो गई।
अमृता और भार्गवी दोनों एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगीं... दोनों को इस वक्त चुप रहना ही ठीक लगा। अमृता ने मानस कुमार को फोन किया। मानस कुमार ने फोन उठाया और अमृता की बात से सहमति जताते हुए सुबह आठ बजे मिलने का समय तय किया। मानस कुमार तो झगड़ा करने के पूरे प्लान के साथ ही सुबह का इंतज़ार कर रहे थे।