अधूरापन - 10 Falguni Dost द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अधूरापन - 10

अध्याय - 10

गायत्री और मानस के बीच एक बार फिर प्यार का नया पुल बंध गया था। 'सब्र का फल मीठा होता है' की कहावत के अनुसार गायत्री ने सब्र रखा और उसे उसका मीठा फल चखने को मिल ही गया। यही नहीं, गायत्री ने समझदारी दिखाते हुए बड़ा दिल रखा और रिश्ते में घमंड को दूर रखकर रिश्ते को जीत लिया। रिश्तों में अक्सर पहल हमेशा औरत को ही करनी पड़ती है, क्योंकि शायद औरत के पास ही वह कुदरती ताकत है।

नारी तू नारायणी, कभी न तू हारी।
खट्टी-मीठी, तीखी, कड़वी और कभी खारी!
तेरी जिंदगी है अनेक स्वादों से भरी-भरी,
नवरसों से भरी जिंदगी संग कैसी तेरी यारी!

और यहाँ तो प्यार जीत में मिल रहा था, तो पहल करने में गायत्री क्यों पीछे रहती? और इस बार तो पहल करने के बाद मानस को खुद भी पछतावा हो रहा था। लेकिन हर बार ऐसा संभव नहीं होता। पुरुष को पछतावा है या नहीं, यह बात स्त्री को ज़रूर देखनी चाहिए और ज़रूरत पड़े तो सही रास्ता दिखाने के लिए पाठ भी पढ़ाना पड़े, तो वह भी उसे ज़रूर पढ़ाना चाहिए। कभी-कभी राई के दाने जितनी गलतफहमी भी आगे चलकर बहुत बड़ी समस्या बनकर सामने आती है, तब सब कुछ कैसा बिखर जाता है! समझदारी का पुल जितना मजबूत होगा, रिश्ता भी उतना ही मजबूत बनेगा—इस बात में कोई दो राय नहीं है। कई रिश्ते तो पति-पत्नी दोनों की समझदारी से ही टिके रहते हैं।

आखिरकार सातवें दिन की सुबह मानस कुमार गायत्री के मायके उसे लेने आए। घर के बाकी सदस्य रात को गायत्री और मानस के बीच हुई बात से अभी अंजान थे, और सुबह-सुबह ही मानस कुमार के हाजिर हो जाने से बात करने का मौका ही नहीं मिला। मानस कुमार ने जैसे ही घंटी बजाई, शोभाबहन दरवाजा खोलने गईं। दरवाजा खोलते ही सामने मानस कुमार को देखकर वे सोच में पड़ गईं। उन्हें लगा कि 15 दिन अभी पूरे भी नहीं हुए और यह आ धमका? वे मन ही मन बहुत कुढ़ गईं कि मेरे फोन के बिना काम कैसे हो गया? एक पल में तो न जाने कितने नकारात्मक विचार आ गए। और जैसे विचार, वैसा बर्ताव! अपने स्वभाव के मुताबिक वे बोलीं, "आइए कुमार! कैसे हैं? मैं तो सोच ही रही थी कि गायत्री से कहूँ कि पत्नी तो पति के चरणों में ही शोभा देती है, तू माफी मांग और कहना कि ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी।" कुमार घर के सोफे पर बैठते, उतनी ही देर में तो वे यह सब एक ही सांस में फटाफट बोल गईं।

मानस कुमार खुद भी अब तक गायत्री के साथ किए गए अपने बर्ताव की वजह से थोड़ा शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। गुस्से में कैसा व्यवहार किया था, यह अब उन्हें साफ समझ आ रहा था। लेकिन जो हुआ सो हुआ, अब सुधारना तो खुद को ही पड़ेगा न! इन सब विचारों में खोए मानस कुमार का इस बात पर ध्यान ही नहीं गया कि शोभाबहन क्या बोल गईं।

कुमार बोले, "सोनाली उठ गई? या अभी सो ही रही है?"

सोनाली अभी सो ही रही थी, लेकिन जहाँ भावनाएं दिल को छूती हैं वहाँ अहसास हो ही जाता है—वैसे ही सोनाली को भी अहसास हुआ कि पापा आए हैं, और वह उठ बैठी। आंखें मलते-मलते वह अपनी मम्मी को ढूंढने लगी। लेकिन उसे गायत्री कहीं दिखाई नहीं दी। "मम्मी... मम्मी..." कहती हुई वह गायत्री को ढूंढते-ढूंढते पूजाघर में आई और उसने देखा कि उसकी मम्मी पूजा कर रही है। नन्हीं सोनाली गायत्री के पास गई और उसे हाथ से हिलाकर "मम्मी... मम्मी..." कहकर बुलाने लगी। गायत्री ने सोनाली को गोद में उठाया और प्यार से उसके माथे पर चूमा। फिर दीये की लौ से हाथ सेककर सोनाली के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और बाहर हॉल में आई। हॉल में आते ही उसने सोफे पर बैठे मानस को देखा। मानस को देखते ही गायत्री के चेहरे पर एक अनोखी चमक आ गई और सोनाली तो "पापा!" कहकर चीखी और मम्मी के हाथों से छूटकर दौड़ती हुई सीधे अपने पापा से जा लिपटी। बेहद प्यारे और मासूम बाप-बेटी का यह मिलन वहां मौजूद हर किसी के दिल को छू जाने वाला था। थोड़ी ही देर में पूरा परिवार हॉल में इकट्ठा हो गया।

रमेशभाई हॉल में दाखिल होते ही बोल उठे, "आइए... आइए... कुमार!" कहकर मानस का प्यार भरा स्वागत करने लगे।

मानस आज फिर एक बार खुद की ही नजरों में गिर रहा था। उसकी आंखें जमीन को ताक रही थीं। आंखें उठाकर बात करने की हिम्मत वह अभी धीरे-धीरे जुटा रहा था। वह अपने मन में बात शुरू करने के लिए शब्द पिरो ही रहा था, लेकिन अभी तक उसे समझ नहीं आ रहा था कि बात कैसे शुरू करे या क्या बोले... उसकी यह उलझन उसके चेहरे पर अमृता भाभी ने तुरंत पढ़ ली। उन्हें मानस की हालत समझते बिल्कुल देर न लगी और उन्होंने माहौल को हल्का करने के लिए कहा, "मानस कुमार, चलिए डाइनिंग टेबल पर ही आ जाइए। वहीं चाय-नाश्ता कीजिए, इसी बहाने आपकी और गायत्री की इतने दिनों से जो साथ में चाय पीना बाकी है, उसका भी हिसाब बराबर हो जाएगा।"

भाभी के मुंह से यह सुनकर गायत्री और मानस हल्का सा मुस्कुरा दिए, और उन दोनों की मुस्कान देखकर पूरा घर भी खुश हो उठा और खिलखिलाकर हँस पड़ा। शोभाबहन इस वक्त बिल्कुल चुप थीं, लेकिन मन में अमृता के लिए बहुत गुस्सा था। मन ही मन वे बहुत कुढ़ रही थीं, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से अमृता की वजह से उनकी बड़प्पन और खोखली छवि को किसी भी तरह संतुष्टि नहीं मिल पा रही थी...

देखो, तेरे बिना जीवन में है ही एक कमी,
स्त्री और पुरुष दोनों को एक-दूसरे के बिना खलती है अधूरी नमी!