अधूरापन - 8 Falguni Dost द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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अधूरापन - 8

अध्याय - 8

अमृता को अचानक चक्कर आ गए और इससे पहले कि वह गिरती, राजेश ने उसे अपनी बांहों में थाम लिया। आज तक कभी उसे अमृता की चिंता नहीं हुई थी और उसका कारण सिर्फ एक ही था—अमृता मेरी भावनाओं के साथ खेल रही है और घर के सभी सदस्यों के सामने अच्छी बनने की कोशिश कर रही है... लेकिन उसकी आंखों के सामने का पर्दा कुदरत ने अब गायत्री के माध्यम से हटा दिया था। राजेश की बहन गायत्री, राजेश की आंखें खोलने का जरिया बनी थी।

राजेश को एक तो उस दीवार का बहुत पछतावा था, जो उसने अमृता और अपने रिश्ते के बीच खड़ी कर दी थी। वह पछतावे की आग में जल रहा था और उस आग के धुएं की वजह से अब उसे सब कुछ धुंधला-धुंधला दिखाई दे रहा था। उस आग की लपटें शांत होते ही उसकी नजर बेहोश अमृता पर पड़ी। इस तरह अचानक अमृता को चक्कर आते देख वह सचमुच घबरा गया। राजेश का चेहरा पसीने से तर-बतर हो गया।

कभी पानी के लिए भी न पूछने वाला राजेश आज अमृता की ऐसी हालत देखकर एकदम बेहाल और व्याकुल हो गया था।

देखिए, कुदरत ने किया खुलासा और प्रेम फिर दिल को छू गया।
पूरी हुईं सब कसौटियां और समय भी साथ दे गया।
दोस्त! आज सच के सामने मानो समय भी हार गया था।

भार्गवी तुरंत पानी का गिलास भर लाई और राजेश भाई को दिया। राजेश ने थोड़ा सा पानी अमृता पर छिड़का। चेहरे पर पानी के छींटे पड़ते ही अमृता ने अपनी आंखें हल्की सी झपकाईं। अमृता की आंखों में फिर थोड़ी हलचल हुई। उसने आंखें खोलीं और वह होश में आई। उसकी आंख खुलते ही उसकी नजर राजेश पर पड़ी। उसकी और राजेश की नजरें मिलीं और अमृता को अपना प्रतिबिंब राजेश की आंखों में दिखाई दिया। आज दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे के चेहरे को एकटक ताक ही रहे थे। अमृता मन ही मन राजेश से कह रही थी:

तेरी आंखों का यह कितना प्यारा दर्पण है!
मेरा जीवन तो सदा तुझ पर ही समर्पित है!

और राजेश भी मन ही मन उसका जवाब देते हुए मानो कह रहा था:

तू ही है मेरी जीवनसंगिनी,
रहने न दूंगा तुझे अब बंदिनी।
तोड़ दूंगा तेरी ये सारी बेड़ियां,
बनेगी तू अब मेरी सत्यसंगिनी।

कुछ पलों तक अमृता अपने पति की आंखों में दिखाई दे रहे अपने चेहरे को एकटक देखती रही। अमृता एक अलग ही अहसास महसूस कर रही थी। शायद यह सालों बाद राजेश के मन का अहसास था जो उसने महसूस किया था। आज दोनों के बीच शरीर से परे एक आत्मीय रिश्ता कायम हुआ था।

देखिए, भावनाएं अभी भी बरकरार थीं,
दोस्त! प्यार की जीत तो तय ही थी!

अमृता पूरी तरह होश में आते ही, पूरे परिवार के बीच जो दो पल के लिए राजेश को एकटक देख रही थी, उस पर थोड़ी शर्मिंदगी महसूस करने लगी। अपनी शर्म की लाली को छुपाते हुए वह तुरंत राजेश की बांहों से अलग होकर बोली, "मुझे दो-चार दिनों से चक्कर आ रहे हैं, लेकिन आज पहली बार मेरा संतुलन बिगड़ा।"

राजेश तुरंत बोल उठा, "तो इतने समय से तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?"

रमेशभाई भी तुरंत बोले, "हां बेटा! कम से कम तुम्हें राजेश को तो बताना चाहिए था।"

अमृता बोली, "मुझे लगा कि थकान की वजह से होगा, इसलिए आराम करूंगी तो ठीक हो जाएगा।"

शोभाबहन ने तंज कसते हुए कहा, "अमृता, तुझे ऐसा किस बात का तनाव या थकान हो गया?"

राजेश आज पहली बार अपनी मां के सामने बोल पड़ा, "कई बार थकान काम की ही नहीं, मन की भी तो होती है न!" आज शादी के इतने सालों बाद पहली बार राजेश की आंखों में शोभाबहन को अमृता के लिए प्यार और अपनापन दिखाई दिया, जिसने शोभाबहन को पैर से लेकर सिर तक जलाकर राख कर दिया।

कभी-कभी ख्याल आता है कि क्या ऐसे भी माता-पिता होते हैं जो अपने अहम के लिए अपने ही बच्चे की खुशी भी बर्दाश्त न कर सकें?

अमृता ने माहौल को सामान्य करते हुए तुरंत कहा, "कल मैं भार्गवी के साथ जाकर डॉक्टर से दवा ले आऊंगी।"

राजेश तुरंत बोला, "बेवजह देर क्यों करनी? चलो, अभी चले चलते हैं।" अमृता को आज राजेश बहुत बदला हुआ लगा। वह राजेश के इस बर्ताव को समझ नहीं पा रही थी। उसे बहुत हैरानी हो रही थी और उसका मन सवालों से घिरा होने के बावजूद वह बिल्कुल सामान्य रहने की कोशिश कर रही थी। वह बोली, "रात हो गई है, खाना बना लेती हूं। बच्चे भी भूखे हुए होंगे, हम कल चलेंगे।" राजेश ने हां में सिर हिला दिया।

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दूसरी तरफ, मानस ब्रेड-बटर खाकर और चाय पीकर सोने की व्यर्थ कोशिश कर रहा था। जैसे ही थोड़ी नींद आती, उसे अहसास होता कि गायत्री उसे गले लगाकर सोई हुई है और उसकी आंखें खुल जाती थीं। कभी सोनाली का 'पापा' कहकर पुकारना उसके कानों में गूंजता था। बेटी हमेशा उसके हाथ को तकिया बनाकर सोती थी, यह बात मानस को सोचने पर मजबूर कर रही थी कि सोनाली मेरे बिना कैसे सोई होगी? मानस को एक पल के लिए लगा कि गायत्री को फोन करके पूछूं? उसने फोन हाथ में लिया, गायत्री का नंबर निकाला और थोड़ी देर उस डायल वाले हरे बटन को देखता रहा। फिर उसने अचानक ही डायल किए बिना ही फोन बंद करके रख दिया। आधी रात को अपनी पत्नी को कॉल करने की हिम्मत उसमें कहां थी?

मन पछतावे से जल रहा है आज मेरा!
तेरे बिना जीवन में कैसा यह अंधेरा!
तेरे होने से ही रोशन था घर मेरा,
सपनों में भी अब तो देखूं चेहरा तेरा।

पूरी रात उसके मन में बहुत उथल-पुथल चलती रही। उसने सोने की व्यर्थ कोशिश की, लेकिन भला आज उसे नींद कहां आने वाली थी!