अधूरापन - 11 Falguni Dost द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

अधूरापन - 11

अध्याय - ११

अमृता की समझदारी और चतुराई भरे निर्णय के कारण मानसकुमार और गायत्री के बीच का रिश्ता बहुत अच्छा हो गया था। दोनों ने अपने इस रिश्ते को अपनी समझदारी और एक-दूसरे के प्रति प्रेम से अच्छी तरह सुलझा लिया था। और उसी का परिणाम था कि गायत्री और मानसकुमार दोनों आज साथ थे। गायत्री ने अब आज अपने घर हंसते हुए चेहरे के साथ लौटने का निर्णय लिया था और अपने इस निर्णय से वह बहुत खुश थी। और उसकी यह खुशी उसके चेहरे पर मुस्कुराहट के रूप में झलक रही थी।

आज झलक रही है खुशी मेरे रोम-रोम में,
मिल गया है अब सैंया का साथ इस भवोभव में।
"दोस्त" की महक उठी है मेरे इस बागबां में,
"प्रीत" के फूल खिले हैं मेरे घर की धरोहर में।

लेकिन साथ ही साथ उसने मानस से वचन भी मांगा कि अतीत में जो कुछ भी घटनाएं घटी हैं, उनका पुनरावर्तन अब फिर से नहीं होगा और मानस फिर कभी ऐसी गलती नहीं करेगा तथा फिर कभी उस पर शक नहीं करेगा। और अपने मन में भूल से भी ऐसा विचार कभी नहीं लाएगा।

और मानस ने भी गायत्री की मौजूदगी में और पूरे परिवार के सामने वचन देते हुए कहा, "आज से मैं वचन देता हूं कि मैंने जो पहले गलती की थी, ऐसी गलती मैं फिर कभी नहीं करूंगा और मैं गायत्री को हमेशा खुश रखने का प्रयास करूंगा। गायत्री के प्रति शक के कीड़े को अब फिर कभी अपने मन में पनपने नहीं दूंगा। और मैं एक पति के रूप में अपने कर्तव्य से कभी पीछे नहीं हटूंगा। और फिर भी 'इंसान गलतियों का पुतला है' इस कहावत के अनुसार अगर मुझसे कोई भी गलती हो जाती है, तो मुझे विश्वास है कि गायत्री मुझे कभी अपने कर्तव्य से भटकने नहीं देगी। वह हमेशा मेरा साथ देगी।"

इतना कहकर वह अमृता भाभी के चरण स्पर्श करके उनके प्रति आदर भाव से देखते हुए बोला, "अमृता भाभी! मैं आपका यह साथ कभी नहीं भूलूंगा। जिंदगी भर मैं इसे याद रखूंगा और जिस तरह से आपने मुझे शांति से समझाया और मेरी आंखें खोलीं, उसके लिए मैं हमेशा आपका ऋणी रहूंगा। और अगर कभी मुझे मौका मिला तो मैं आपका यह ऋण जरूर चुकाऊंगा।"

अमृता ने बड़े ही सरल भाव से उससे कहा, "बड़ों के आशीर्वाद तो हमेशा होते ही हैं और हमारा भी कर्तव्य है कि आपके बीच जो भी परेशानियां हों, उनका समाधान करें। और मैंने तो सिर्फ अपना फर्ज निभाया है, इससे ज्यादा कुछ नहीं। बच्चों की परेशानी में उनकी मदद करना हर बड़े का कर्तव्य होता है। आपको मेरा ऋणी बनकर मन पर कोई बोझ लेने की जरूरत नहीं है। कोई भी भार अपने मन में मत रखिये। मैं तो बस इतना चाहती हूं कि आप दोनों हमेशा खुश रहें और सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ रहें तथा जिंदगी की मुश्किलों का सामना एक-दूसरे के साथ मिलकर करें, यही मेरे दिल से आपको आशीर्वाद हैं। सदा खुश रहो।"

अमृता की यह बात सुनकर शोभाबहन मन ही मन अंदर ही अंदर कुढ़ रही थीं। कल की आई हुई बहू अपने जमाई को आशीर्वाद दे, यह उनसे भला कैसे बर्दाश्त होता? उन्होंने मुंह बनाया और पांव पछाड़ते हुए अपने कमरे में चली गईं।

इधर मानस और गायत्री दोनों ने अपने घर की ओर हंसते हुए प्रस्थान किया। घर के सभी लोगों ने उन्हें खुशी-खुशी विदाई दी, सिवाय शोभाबहन के। अभी तक तो शोभाबहन सिर्फ अपनी बहुओं से ही नाराज थीं, लेकिन अब तो वह अपनी बेटी से भी नाराज रहने लगीं। आज उनकी इकलौती बेटी ने उनकी बात सुनने के बजाय अपनी भाभी की बात सुनी थी, यह उनसे बर्दाश्त नहीं हुआ।

इधर राजेश अपनी पत्नी अमृता के बारे में सोच रहा था कि, "कुदरत की मेहरबानी से मुझे कितना अच्छा जीवनसाथी मिला है। लेकिन मेरी किस्मत तो देखो कि मैंने अपनी जिंदगी का कितना समय सिर्फ नकारात्मक विचारों में ही गंवा दिया। मैंने उसे सभी सुखों से वंचित रखा। मैं पति के रूप में उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने में चूका। लेकिन अब मैं इस बार अतीत को दोहराने नहीं दूंगा। मैं अब अमृता को वह सब कुछ दूंगा जो पहले नहीं दे सका।"

ऐसा मन ही मन सोचकर वह पश्चाताप की आग में जल रहा था।

उतने में ही उसके मोबाइल की रिंग बजी। फोन डॉक्टर का था।

डॉक्टर ने कहा, "मैं डॉ. भावेश बोल रहा हूं।"

नाम सुनते ही राजेश के कान खड़े हो गए और उसने पूछा, "डॉक्टर साहब! अमृता की रिपोर्ट आ गई क्या? सब ठीक तो है ना? चिंता करने जैसी कोई बात तो नहीं है ना?"

सामने से डॉक्टर ने सिर्फ इतना ही कहा, "क्या कल आप और अमृता दोनों मेरे क्लिनिक पर आ सकते हैं? मुझे आप दोनों से बहुत जरूरी बात करनी है। बिल्कुल देरी मत करना। अगर देरी हुई तो तकलीफ हो जाएगी। जितना जल्दी हो सके मुझसे मिलने आ जाइये।"

"ठीक है डॉक्टर साहब! हम कल आपसे मिलने आ जाएंगे।" इतना कहकर राजेश ने फोन रख दिया।

उसने पूरी रात बिस्तर पर करवटें बदलते हुए काटी। अमृता की चिंता में उसकी पूरी रात बीती। उसका मन बहुत घबराहट अनुभव करने लगा था।

दूसरे दिन की सुबह हुई। रोज के नित्यकर्म निपटाकर राजेश और अमृता दोनों डॉक्टर से मिलने के लिए रवाना हुए। रास्ते में राजेश सोच रहा था कि, "आज हमारा कोई बच्चा होता तो कितना अच्छा होता ना? लेकिन अब मैं अमृता को एक बच्चा जरूर दूंगा। फिर चाहे वह बेटी ही क्यों ना हो! अतीत में की गई गलतियों को मैं अब नहीं दोहराऊंगा।"

अधूरे सपनों की यह अधूरी दुनिया,
अधूरी खुशियां और अधूरे हम!
गूंजे अब जो किकारी आंगन में,
चलो ना बनते हैं अब तो पूरे हम!