अध्याय-६
अमृता और भार्गवी दोनों ने मानसकुमार के घर में प्रवेश किया। उनके मन में जो डर था और उस डर के आधार पर जो उनकी धारणा थी, वह बिल्कुल सच साबित हुई। उन दोनों का मानसकुमार की तरफ से कोई अच्छा स्वागत नहीं हुआ। इसके बावजूद, अपनी ननद का भविष्य सुधर जाए—इसी इरादे और मन में एक आशा लेकर, मानसकुमार के उस दुर्व्यवहार को नजरअंदाज करते हुए भी वे दोनों मानसकुमार के घर के अंदर आ गईं।
"ओह! तो आ गईं आप दोनों! दोनों भाभियां अपनी ननद की वकालत करने आई हैं। आपको उसे समझा-बुझाकर अपने साथ यहाँ लेकर आना चाहिए था, उसकी बजाय आप दोनों अकेले ही चली आईं। पूरा खानदान ही ऐसा है क्या? दामाद की तो आपके घर में कोई इज़्ज़त ही नहीं है, है न! अगर आप लोगों को अपनी बेटी की ज़रा भी परवाह होती, तो इस तरह अकेले नहीं आतीं, उसे समझाकर साथ लेकर आतीं। उसे नौकरी करने की भला क्या ज़रूरत थी? क्या कमी है उसे यहाँ? नौकरी करके वह क्या साबित करना चाहती है? यही कि मैं उसकी ज़िम्मेदारी उठाने में सक्षम नहीं हूँ? क्या मैं उसे बहुत दुखी रखता हूँ? उसने जो कुछ भी माँगा, वह सब मैंने उसके सामने हाज़िर किया है। फिर भी वह नौकरी करने लगी और वह भी मुझे बताए बिना! मैं उसे कभी माफ नहीं करूँगा। और उसका वह बॉस... समझता क्या है वह खुद को? वह मेरी पत्नी के साथ जैसा चाहे वैसा व्यवहार करेगा और मैं चुपचाप बर्दाश्त करूँगा? उसके बॉस को शर्म आनी चाहिए। उसे इतनी समझ नहीं है कि गायत्री शादीशुदा है और एक बच्ची की माँ है? देर रात तक गायत्री को ऑफिस में रोककर रखने की क्या ज़रूरत है? किसी और को तो नहीं रोकता वह खूसट बॉस! उसकी नियत ही गायत्री पर खराब है।" इतना बोलते-बोलते मानसकुमार की आँखें लाल हो गईं और वे गुस्से में थर-थर काँपने लगे।
"आप पहले तो शांत हो जाइए मानसकुमार।" अमृता ने उन्हें शांत करने की कोशिश करते हुए कहा, "मानसकुमार, कई बार जो दिखता है, वह सच नहीं होता। वह केवल हमारे मन का वहम होता है और वहम की कोई दवा नहीं होती। कई बार सही बात समझते-समझते इतना वक्त बीत जाता है कि बहुत देर हो जाती है और फिर पछताने के अलावा कुछ बाकी नहीं रहता। हमारा आपसे बस इतना ही कहना है कि आप गायत्री बहन को एक मौका दीजिए और उस दौरान सच जानने की कोशिश कीजिए। हो सकता है कि आप जो कह रहे हैं, वह सिर्फ आपके मन का वहम हो और सच्चाई कुछ और ही हो। सच को पहचानना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन एक बार अगर आप सच समझ लेंगे तो मैं पूरे विश्वास के साथ कहती हूँ कि इसमें गायत्री का कोई कसूर नहीं है। आपके दोनों की ज़िंदगी में अभी जो तूफान उठा है और उस तूफान से जो आँधी आई है, वह भी शांत हो जाएगी।" इतना कहकर अमृता शांत हो गई।
अब बोलने की बारी भार्गवी की थी। उसने मानसकुमार को समझाते हुए कहा, "हाँ मानसकुमार, मैं भी भाभी की बात से सहमत हूँ। आपको गायत्री बहन को एक मौका ज़रूर देना चाहिए। और अगर गायत्री बहन ने घर की आर्थिक स्थिति को संभालने के लिए नौकरी करने का फैसला लिया भी है, तो इसमें गलत क्या है? हाँ, मैं मानती हूँ कि उन्हें यह फैसला आपको विश्वास में लेकर करना चाहिए था, वह उनकी गलती थी। लेकिन उनका वह फैसला आपके और परिवार की भलाई के लिए ही था न! हमारा फर्ज़ था आपको समझाना और अपनी बात आपके सामने रखना, बाकी आखिरी फैसला तो आपको ही करना है। अंत में तो आपको और गायत्री बहन को ही अंतिम निर्णय लेना है।" इतना कहकर भार्गवी रुक गई।
अमृता और भार्गवी दोनों मानसकुमार के जवाब का इंतज़ार करने लगीं।
डूबे हैं अब विश्वास के जहाज़,
इसलिए कहता हूँ, तू तैरना सीख ले आज!
जीवन के आनंद को अब तो तू जी ले,
खींच-खींचकर बात को यूँ न बढ़ा तू बेवजह।'
अमृता और भार्गवी को जो बात रखनी थी, वह उन्होंने मानसकुमार को बता दी थी। इतनी बात सुनकर मानसकुमार की सोच में तुरंत बदलाव नहीं आएगा, यह अमृता बहुत अच्छी तरह समझती थी। फिर भी दोनों मानसकुमार के जवाब की प्रतीक्षा कर रही थीं।
मानसकुमार अपनी ही बात और विचारों को पकड़कर बात कर रहे थे। वे बोले, "सुबह-सवेरे, देर रात और जब मन चाहे तब उसके बॉस का कॉल आ जाता है। जब मैं गायत्री को कॉल करता हूँ, तो उसका नंबर व्यस्त ही आता है, और वह यह मानती भी है कि बॉस से बात कर रही थी। उसे अब किसी बात का डर ही नहीं रहा... हद पार कर चुकी है आपकी गायत्री..." बहुत ही क्रोध में मानसकुमार रीते से चिल्ला ही रहे थे।
अमृता ने तुरंत बात की बागडोर अपने हाथ में ली। वह बातचीत को और बिगड़ने से पहले ही मानसकुमार को अपनी बात समझा देना चाहती थी। वह बोलीं, "गायत्री बहन के मन में अगर कोई पाप या कपट न हो, तभी तो वे आपको सच-सच बता पाती हैं कि वे अपने बॉस से बात कर रही थीं... इस तरह भी तो सोचा जा सकता है न मानसकुमार! अगर उनके मन में पाप होता तो क्या वे आपसे झूठ न बोलतीं? मैं जानती हूँ कि गायत्री बहन के मोबाइल में कॉल रिकॉर्डर है, तो क्या आपने कभी उसे सुनने की कोशिश की कि उन दोनों के बीच क्या बात होती है? पत्नी पर विश्वास होना ही चाहिए, क्योंकि बिना विश्वास के कोई रिश्ता नहीं टिकता। विश्वास पर ही यह पूरी दुनिया टिकी हुई है और उसमें भी पति-पत्नी का रिश्ता तो खास तौर पर। मैंने सुना है कि आपके ऑफिस में भी फीमेल स्टाफ है, तो क्या अपने स्टाफ की बहनों को आपने कभी ऑफिस के काम के सिलसिले में कॉल नहीं किया?? हम यहाँ गायत्री बहन की वकालत करने नहीं आए हैं, हम तो आपके रिश्ते की जो डोर छूट रही है, उसे सँभालने आए हैं। और अगर आप उस डोर पर मक्खन लगाते रहेंगे, तो वह और भी तेज़ी से हाथ से फिसल जाएगी; उसे छूटने में देर नहीं लगेगी। अगर आप अभी भी चाहें तो मोबाइल के कॉल और मैसेज की डिटेल्स, जब से उन्होंने ऑफिस जाना शुरू किया है तब से लेकर अब तक की पूरी जानकारी संबंधित कंपनी के हेड ऑफिस से मँगवा सकते हैं। टेक्नोलॉजी ने इतनी प्रगति कर ली है कि अब यह भी संभव है। अपने मन के समाधान के लिए आप वह भी देखकर देख लीजिए! क्योंकि जो सही समय पर न मिले, वह बाद में मिल भी जाए तो किसी काम का नहीं रहता। आप कोई जल्दबाजी मत कीजिए, शांति से सोचिएगा कि आपके रिश्ते में या आपकी बेटी सोनाली के प्रति गायत्री बहन से कोई कमी हुई है क्या? क्या उन्होंने अपनी पसंद-नापसंद आप पर थोपी या आज भी उनका रहन-सहन भारतीय नारी जैसा ही है? क्या वे आपके कॉल या मैसेज को इग्नोर करती हैं?? गायत्री बहन ने जब से ऑफिस जाना शुरू किया, उस पहले दिन वे आपके साथ जैसा व्यवहार करती थीं, क्या उसमें कोई बदलाव आया है??"
"इन सभी सवालों के सही जवाब, आप १५ दिन बाद जब गायत्री बहन को लेने आएँ, तब बिना कुछ बोले मुझे आपकी आँखों में वे सारे उत्तर दिख जाएँ—इसी आशा के साथ हम दोनों यहाँ से विदा ले रही हैं। आपका इंतज़ार मैं और हमारा पूरा परिवार करेगा।" एक निष्पाप और निस्वार्थ मुस्कान देकर वे दोनों वहाँ से विदा हो गईं।