अध्याय-१६
विनय अपूर्व के मन की बात जानकर उसे सही सलाह देकर, दोनों अपने-अपने घर जाने के लिए निकल पड़े थे।
विनय घर पहुँचा तो उसकी पत्नी नीला ऑफिस से आ चुकी थी और टेबल पर डिनर तैयार रखकर विनय का इंतज़ार कर रही थी। जैसे ही विनय आया, उसने उसे प्यार से गले लगा लिया और पूछा, "क्यों जान आज देर हो गई? ऑफिस में सब ठीक तो है न?"
विनय ने भी नीला के माथे पर चूमा और अपने गले की टाई ढीली करते हुए कहा, "हाँ डार्लिंग! सब ठीक है।"
विनय अभी अपूर्व की बात बताता, उससे पहले ही नीला बोल पड़ी, "तो चलो जानू जल्दी फ्रेश होकर डायनिंग टेबल पर आओ। हम डिनर करते हैं, मुझे बहुत तेज़ भूख लगी है।"
विनय और नीला दोनों बहुत ही प्रेमी युगल थे... साथ ही, जैसे विनय एकदम होशियार था वैसे ही नीला भी हर तरह से सुयोग्य थी... दोनों एक-दूसरे की भावनाओं को समझकर आगे बढ़ते और अपनी प्रगति में एक-दूसरे का आभार भी मानते... दोनों का जीवन बहुत ही भावुक और संतोषजनक था।
यहाँ दूसरी तरफ अपूर्व विनय से अलग तो हो गया, लेकिन उसके मन में विनय का एक-एक शब्द गूँज रहा था। अपूर्व को विनय की सलाह सही तो लगी, लेकिन उसका अहम् अभी उसकी बात मानने को तैयार नहीं था। वह खुद बार-बार उसी विचार पर अपने आप से तर्क कर रहा था, लेकिन उसके जवाब में वह खुद गलत साबित हो रहा था। आखिरकार न चाहते हुए भी उसका मन विनय की बात से ही सहमत हो रहा था और अंत में उसने मन ही मन सोचा, 'मुझे विनय ने जैसा कहा है वैसा ही करना चाहिए। मैं विनय की आज तक की हर सलाह में सफल ही साबित हुआ हूँ, तो इस बार भी वैसा ही करता हूँ... कहते हैं न कि जब कोई न समझा सके तब दोस्त समझा सकता है...'
जब निर्णय लेने में आए मोड़,
'दोस्त' दे तब समझ सटिक और बेजोड़!
यहाँ भी अपूर्व के साथ ऐसा ही हुआ, भार्गवी भी शांति से ही अपनी बात समझा रही थी, लेकिन अपूर्व के मन में भार्गवी की ऐसी छवि ही नहीं थी कि वह सचमुच बहुत समझदार है। इसमें गलती भार्गवी की बिल्कुल नहीं थी। गलती अपूर्व की भार्गवी के प्रति कम समझ की थी। विनय ने सही सलाह ही दी थी, लेकिन शायद गलत सलाह दी होती तो भी अपूर्व मान लेता; क्योंकि उसने विनय के लिए पहले से ही ऐसी धारणा बना रखी थी कि विनय सही ही सलाह देता है... आमतौर पर इंसान अपनी ही समझदारी से सामने वाले व्यक्ति के प्रति हीनभावना (लघुताग्रंथि) बाँध लेता है, उसी से उसे तकलीफ पहुँचती है। इसलिए हमेशा कोई भी बात या विषय हो, सभी पहलुओं से सोचकर सही रास्ता चुनना चाहिए ताकि कभी पछताना न पड़े।
अपूर्व घर पहुँचा तो शोभाबहन उसका इंतज़ार करते हुए हॉल में ही बैठी थीं। शोभाबहन घर में हुआ अपना अपमान ऐसे थोड़ी ही भूल सकती थीं? इसलिए अपने स्वाभिमान की शांति पाने का दूसरा रास्ता खोजकर ही बैठी थीं कि किसी भी कीमत पर अमृता और भार्गवी के बीच झगड़ा करवाऊँ, तभी मेरे मन को शांति मिलेगी—ऐसी गाँठ बाँधकर बैठी थीं... आमतौर पर परिवार में ऐसी सोच पैदा होती है तो बहुएँ तो झगड़ती ही हैं, उनके साथ-साथ उनके बेटे भी झगड़ते हैं और घर में ही जान-बूझकर कलेश पैदा होता है... देखा जाए तो यह बहुत ही छोटी सी बात थी! लेकिन उससे भी बड़ा शोभाबहन का अहम् था! इस वजह से उन्हें अपने कर्म का ज़रा भी भान नहीं रहा और अपने विचार पर अमल करने के लिए ही वे अपूर्व का इंतज़ार कर रही थीं।
अपूर्व अपनी माँ के पास बैठा। अभी अपनी कोई बात अपूर्व बताता, उससे पहले ही शोभाबहन ने आँखों में आँसू लाकर अपूर्व से पूछा, "तू भी क्यों उदास दिख रहा है?"
शोभाबहन ने चतुराई से बेटे का हाल-चाल भी पूछ लिया और खुद दुःखी हैं यह भी जता दिया।
अपूर्व ने माँ से पूछा, "आपको क्या हुआ? आप क्यों रो रही हैं?"
शोभाबहन को थोड़ा चैन मिला कि अपूर्व का ध्यान उनके आँसुओं पर गया... वे गमगीन होकर और आँसू पोंछते हुए बोलीं, "क्या बेटा, मैं तुझसे पूछ रही हूँ और तू मेरी चिंता कर रहा है! मैं अपने किए पापों का फल भुगत रही हूँ, तू मेरी चिंता मत कर, मैं और कितने दिन? तू अपनी बात बता, तेरा मुँह क्यों उतरा हुआ है?"
अपूर्व 'पाप' शब्द सुनकर कल के विचारों में खो गया और शोभाबहन आगे क्या बोलीं, यह बात अपूर्व के कानों तक पहुँची ही नहीं।
शोभाबहन ने अपूर्व को बेध्यान देखा तो उसके कंधे पर हाथ रखकर फिर बोलीं, "अपूर्व...!!"
अपूर्व अपने विचारों की दुनिया से बाहर आया और बोला, "माँ, भार्गवी दिखाई नहीं दी, वह कहाँ है?"
शोभाबहन ने कहा, "वह अभी-अभी अपने कमरे में गई।"
अपूर्व "मैं अभी खाना खाने आता हूँ, जरा कमरे में भार्गवी से मिल आता हूँ" कहते हुए कमरे की तरफ बढ़ गया।
शोभाबहन अपनी बात कहने का माहौल तो बना पाईं, लेकिन बात ही टल गई... वे मन ही मन बुदबुदाईं, "दिनों का कहाँ अकाल पड़ा है? कल अपूर्व को मौका देखकर बात करूँगी।"
अमृता और राजेश के जीवन में ऐसा बदलाव आया कि दोनों दुःखी होने के साथ-साथ एक-दूसरे के साथ हैं, इस बात का बहुत संतोष रखते थे। राजेश अमृता की गोद में सिर रखकर अमृता से कह रहा था, "कल फिर अस्पताल जाना है, तो तुम डर तो नहीं रही हो न? मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा... मैं इतने सालों तक तुम्हारा साथ नहीं दे सका, लेकिन अब ऐसा नहीं करूँगा। भगवान ने इतने साल मुझे भी तुमसे दूर रखा, मेरी भूल बस इतनी ही थी न कि मुझे अपनी माँ की बात पर विश्वास आ गया... लेकिन अमृता तुम ही बताओ, कौन सा बच्चा अपनी माँ पर विश्वास नहीं करेगा?"
अमृता बोली, "भूल जाइए सब पुरानी बातों को। वे सिर्फ दुःख ही देती हैं... अतीत को कुरेदेंगे तो सिर्फ दुःख ही मिलेगा। बीता हुआ दुःख अब सुख में परिवर्तित नहीं होगा।"
राजेश बोला, "आई लव यू अमृता..." और अमृता के चेहरे पर शर्म की लाली छा गई और वह भी लजाते हुए बोली, "आई लव यू टू... राजेश..."
राजेश और अमृता के रिश्ते ने अब नया रूप धारण कर लिया था। उनके जीवन में जो प्रेम का अधूरापन था, वह आज पूरा हो गया था।