Devil की दास्तान - 43 Sonam Brijwasi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 43

मंदिर का अंदरूनी हिस्सा—धीमी अब्बर-लाल रोशनी, अगरबत्तियों की खुशबू हवा में फैली है। दीवारों पर भैरव की मूर्ति अर्ध-छायाँ में छपी हुई है। कनपालिका सन्नाटा। करन/कबीर सिया को अपनी बाँहों में थामे मंदिर के बीच बैठे हुए है। सिया आँखें बंद किए बेहोश पड़ी है — चेहरा पीला, चोंटा टूटा-सा, साँसें धीमी।

जैसे ही सिया ठीक होने की कगार पर थी — उसकी शक्ति थम गई, और वह अपनी बिल्कुल निर्बल अवस्था में करन की बाँहों में गिर पड़ी। करन के लिए उस पल ने सब कुछ रोक दिया — समय, हवा, साँसें। अब सिर्फ़ एक करार था: उसे बचाना।

कबीर धीरे-धीरे सिया का सिर अपने घुटने पर टिकाता है, उसकी उँगलियों से उसके चेहरे की आँसुओं और पसीने की बूंदें पोंछता है।

कबीर (फुसफुसाते हुए, आँखों में कठिनाई थी) बोला - 
सिया… तुम जाओगी नहीं… मैं तेरे बिना कुछ भी नहीं… सुनती हो? मैं तुझे खोने नहीं दूँगा।

वो मंदिर की माला उठाता है और धीमे स्वर में महाकाल/महा मृत्युंजय का मंत्र जपने लगता है — धीरे-धीरे और बार-बार।

कबीर (मंत्र पढ़ते हुए, लय में)बोला - 
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे...

उसका स्वर शुरुआत में काँपता है, पर जैसे-जैसे मंत्र आगे बढ़ते हैं, आवाज़ स्थिर होती जाती है। उसकी आँखों में आंसू हैं — पर वह रोता नहीं; उसकी जुबान मंत्र से और दिल वचन से भरी है।
वो रो नहीं सकता था — शैतानी प्रकृति में आँसू कम ही दिखते हैं — पर उसकी आँखें बोल रही थीं। हर मंत्र के साथ वो अपनी गलती, अपनी चाह और अपने वादे को दोहरा रहा था।

कबीर उठ कर मंदिर के कोने से पानी की लोटरी लाता है। अपने हाथों को धो कर सिया के होंठों पर पानी की कुछ बूंदें देता है। फिर अपनी जैकेट उसकी कंबल की तरह उसके चारों तरफ़ ठोस करता है।

कबीर (धीरे से) बोला - 
ठंड से बचना… गरम रहो… एक बार बस आँख खोलो।

वह बार-बार उसका छाती पर हाथ रख कर धड़कन जाँचना नहीं भूलता। समय-समय पर मंदिर की घंटी की टकराहट होती है — पर वह नहीं जाता। मध्यरात का सन्नाटा, घंटियाँ, कबीर के मंत्र, और कबीर का बार-बार सिया का नाम लेना — “सिया… सिया…” — कुल मिलाकर एक लय बन जाता है।

कबीर ने अपना पूरा मौन और अपनी आख़िरी ताकत वहाँ छोड़ दी — मंदिर के पैरों पर बैठकर प्रार्थना की, जप किया और खुद को प्रभु के हवाले कर दिया। वो जानता था कि जो भी हुआ — उसका अतीत, उसका शैतानपन — सबका हिसाब आएगा; पर अभी, उस एक पल में, सिर्फ़ एक काम बाकी था: उसे जिंदा रखना।

अँधेरा धीरे-धीरे हल्का होने लगता है — दीवारों पर सूरज की पहली किरणें छिद्रों से आती हैं। कबीर अभी भी मंत्र जप रहा है — पर उसका स्वर अब और थका हुआ है। सिया की साँसें अचानक गहराती हैं; उसका पल्लव सा शरीर हल्का काँपता है। उसकी पलकों में हरकत आती है।

कबीर (हाथ लगाते हुए, धीरे से) बोला - 
जागो… उठो — मेरी बात सुनो… उठ जाओ।

सिया आँखें मोड़ती है — आँखों की पुतलियाँ भरोसे और उलझन के बीच अटकी हुई हैं। धीरे-धीरे उसकी आँखें खुलती हैं। वह बुरी तरह हाँफती है पर ज़िंदा है।

सिया (धीरे-धीरे, बेजबान-सी आवाज़ में) बोली - 
कबीर जी… कहाँ…?

कबीर (रिलíf के साथ, उसकी बाँह और कसकर समेटते हुए) बोला-
यहाँ — मैं साथ हूँ… तू सुरक्षित है। तू ठीक है।

वो एक पल के लिए सिर झुका कर चुपचाप भगवान के सामने धन्यवाद देता है — उसकी आँखों में राहत, और फिर तुरंत सावधानी का भाव लौट आता है।

सुबह की किरने जब मंदिर की छत पर छनकर गिरती हैं, तब कुछ वादे पक्के होते हैं। कबीर ने रात भर जागकर एक वचन निभाया: चाहे कुछ भी हो, सिया की साँसें चलती रहें। और आज — उस वचन ने फल दिया।

कबीर सिया को धीरे से उठाता है, वह उसका कोई बड़ा घाव देखता है और फिर से माला लेकर पुनः मंत्र जपना शुरू करता है — पर इस बार उसकी आवाज़ में थकान के साथ नई उम्मीद भी है। सिया उसकी आँखों में देखती है, और बिना पूरा याद किए भी उसके हाथ थाम लेती है।

सिया (कमज़ोर सी हँसी के साथ) बोली - 
आप हमेशा… मेरे लिए हो ना?

कबीर (धीरे से मुस्कुराते हुए, पर स्वर में भारीपन लिए) बोला - 
हमेशा… हमेशा।

कभी-कभी बचने का एक ही रास्ता होता है — कोई रात भर तुम्हारे लिए जपे, बैठे और हाथ थामे रहे। और उस कड़ी रात के बाद — नई सुबह के साथ — किसी तरह की कच्ची उम्मीद भी लौट आती है।

मंदिर के शांत प्रांगण में — सुबह की हल्की किरणें, अगरबत्तियों की खुशबू, घंटियों की धीमी टंकार।बकबीर और सिया एक दीवार के किनारे बैठे हैं। सिया का चेहरा अब थोड़ी ताकत पाता दिख रहा है, पर वह अभी भी थोड़ा थकी हुई है।

सिया (धीमी, हल्की मुस्कान के साथ) बोली - 
कबीर जी… मुझे अभी-अभी एक अजीब सा सपना आया। ऐसा लगा जैसे… भगवान ने मुझे दिखाया हो।

कबीर (चौंक कर, उसके चेहरे को ध्यान से देखते हुए) बोला - 
सपना? क्या देखा तुमने?

सिया (धीरे-धीरे, भावुक स्वर में) बोली - 
मेरे सपने में… मेरे सामने कान्हा जी आए। उन्होंने मुझे देखा और बोले…
‘तुम बहुत मासूम हो… और तुम्हारा पति तुमसे बहुत प्रेम करता है।
तुम कभी अकेली नहीं होओगी… और अब तुम्हारा पति किसी भी मंदिर में जा सकता है। चाहे सामने सैतान ही क्यों न हो — उसकी आत्मा अब देवता के समान दयालु बन चुकी है।इसलिए मैंने उसे मंदिर में आने का आशीर्वाद दिया।’

कबीर सिया की बात सुनते हुए धीरे-धीरे आँखें बंद करता है। उसके चेहरे पर भावनाओं का तूफान है — गर्व, राहत और हल्की शर्म।

कबीर (धीरे से, मन ही मन) बोला - 
तो यह… भगवान का आशीर्वाद है… मुझे अब सच में इस संसार में कुछ भी कर सकता हूँ, पर मेरा धर्म सिर्फ़ सिया की रक्षा करना है।

सिया (उसकी बाँहों में सर रखती है, शांति से) बोली - 
कबीर जी… मुझे अब समझ में आ रहा है… जो कुछ भी हुआ — सबका कारण सिर्फ आपका दिल है। आप शैतान हो सकते हो, पर भगवान की तरह दयालु भी हो सकते हो। इसलिए… मुझे डर नहीं लगता। मैं आपके साथ हूँ। हमेशा।

कबीर उसकी आँखों में देखता है — उसके भीतर मासूमियत और विश्वास दोनों साफ़ झलक रहे हैं। वो धीरे से उसकी बाँह में अपने हाथ रखता है।

कबीर (धीमे, फुसफुसाते हुए) बोला - 
हमेशा… कभी तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकता… मैं हूँ न।

सिया हल्की मुस्कान देती है, और दोनों मंदिर की घंटियों की आवाज़ के बीच थोड़ी देर चुपचाप बैठे रहते हैं।

कभी-कभी, एक सपना और एक आशीर्वाद ही उस दिल को स्थिर कर देता है जो डर और अंधकार से टूट चुका हो।
और आज — सिया और कबीर के बीच का विश्वास फिर से जीवन की नई सुबह की तरह खिल उठा।”