Devil की दास्तान - 42 Sonam Brijwasi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 42

घना जंगल। रात का समय। चारों तरफ़ ठंडी हवा बह रही है। चाँद आधा ढका हुआ है। पेड़ों की शाखाएँ अजीब आवाज़ें कर रही हैं।"
(कबीर अपनी बाँहों में सिया को उठाए धीरे-धीरे चल रहा है। उसके कपड़े फटे हुए हैं, और सिया का चेहरा अब पूरी तरह ज़ॉम्बी में बदल चुका है — नीली नसें, धुँधली आँखें, और होंठों पर सूखा ख़ून।)

कबीर (धीरे, टूटे स्वर में) बोला - 
“अब मैं तुम्हें किसी के सामने नहीं आने दूँगा, सिया…
ना इंसान के, ना शैतान के, ना इन जॉम्बीज़ के…”

(वो चारों तरफ़ देखता है — हवा में सड़न की बदबू है। दूर से कुछ आवाज़ें आ रही हैं —
जॉम्बीज़ की डरावनी कराहें।)

कबीर (फुसफुसाते हुए खुद से) बोला - 
“उन्हें पता चल गया है… वो तुम्हारे पीछे आएँगे…
क्योंकि अब तुम भी… उनकी तरह बन चुकी है।”

(सिया उसकी बाँहों में हिलती है। उसकी आँखें खुलती हैं। वो धीमे स्वर में ग़ुर्राती है, और अपने दाँत कबीर के कंधे की ओर बढ़ाती है।)

कबीर (धीरे से, पर सख्त स्वर में) बोला - 
“नहीं सिया… ऐसा मत करना… मैं तुम्हारा दुश्मन नहीं हूँ।”

(वो उसे और कसकर पकड़ता है। सिया की आँखों में एक पल के लिए पहचान की झलक आती है,
जैसे उसके अंदर कहीं वो पुरानी सिमरन अब भी ज़िंदा हो।)

सिया (बहुत धीमी आवाज़ में) बोली - 
“का…बीर…जी..”

(कबीर ठिठक जाता है। उसके चेहरे पर दर्द उभर आता है।)

कबीर (धीरे से, काँपती आवाज़ में) बोला - 
“हाँ… मैं यहीं हूँ सिया… बस थोड़ा और सह लो…”

(अचानक झाड़ियों से कई जॉम्बीज़ निकलते हैं — 10-15 के करीब।
उनके कपड़े फटे हुए, चेहरों पर खून, और उनकी आँखें नीली चमक रही हैं।)

पहला ज़ॉम्बी (घर्राते हुए) बोला - 
“वो… हमारी… है…”

(कबीर की आँखें लाल चमकने लगती हैं। उसके चारों ओर काला धुआँ घूमता है।)

कबीर (गरजते हुए) बोला - 
“सिया किसी की नहीं है!!”

(वो ज़मीन पर सिया को सुरक्षित रखता है और दोनों हाथ फैलाकर हवा में काला भँवर बनाता है।
भँवर से आग की लपटें निकलती हैं जो आधे जॉम्बीज़ को राख बना देती हैं।)
(बाकी जॉम्बीज़ सिया की ओर दौड़ते हैं। एक उसके पास पहुँचता है लेकिन अचानक हवा में रुक जाता है —
कबीर का हाथ हवा में उठा है, और वो जॉम्बी धूल बन जाता है।)
(कबीर ज़ोर से साँस लेता है — उसकी ताकत धीरे-धीरे खत्म हो रही है।)

कबीर (थके हुए स्वर में, खुद से) बोला - 
“मैं उन्हें खत्म कर दूँगा… चाहे इस बार अपनी जान क्यों न दे दूँ…”

(सिया धीरे-धीरे उठती है। वो अब पूरी तरह ज़ॉम्बी बन चुकी है, पर उसकी नज़रें अब भी कबीर पर हैं।
वो उसके पास आती है, और एक पल के लिए उसका हाथ उसके चेहरे पर रखती है।)

सिया (धीरे, काँपते स्वर में) बोली - 
“मुझे… बचाने की कोशिश… मत करिए कबीर जी…”

कबीर (आँखों में दर्द लिए) बोला - 
“अगर तुम्हें नहीं बचा पाया, सिया… तो मैं भी मर जाऊँगा…”

(सिया उसकी आँखों में देखती है — कुछ कह नहीं पाती।
उसके चेहरे पर एक पल के लिए इंसानियत की झलक लौटती है… फिर वो पीछे हट जाती है।)
(कबीर उसे देखकर टूट जाता है, पर फिर भी उसे कंधे पर उठाकर चलता है।)

कबीर (धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए, टूटे स्वर में) बोला - 
“जब तक मैं ज़िंदा हूँ… तुम्हे कोई नहीं छू सकता…
चाहे तुम ज़िंदा रहो या ज़ॉम्बी…तुम मेरी सिया ही रहोगी…”

(कबीर सिया को लेकर अंधेरे जंगल में गुम हो जाता है,
और दूर से जॉम्बीज़ की चीखें सुनाई देती हैं।)
“कभी प्यार ने उसे अमर बनाया था,
आज वही प्यार उसकी सज़ा बन गया था…”

रात का समय, घना जंगल। चारों तरफ़ अंधेरा, हल्की धुंध फैली हुई। हवा तेज़ चल रही है। सिया पूरी तरह ज़ॉम्बी जैसी हो चुकी है। उसकी आँखें लाल और आग सी जल रही हैं।)
(कबीर उर्फ़ करन, अपनी बाँहों में सिया को पकड़कर उड़ रहा है। सिया बार-बार झटकती है, दाँत निकालकर उसे काटने की कोशिश करती है।)

कबीर (धीरे से, खुद से फुसफुसाते हुए) बोला - 
“अब और नहीं… अब तुम्हें संभालना मुश्किल हो गया है…
जहाँ तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचा सकता — वही ले जाऊँगा…”

(सिया की आँखें फूंक मारती हैं। वो जोर-जोर से गर्राती है और अपनी शक्ति से कबीर को पीछे धकेलने की कोशिश करती है।)

कबीर (कसकर पकड़ते हुए) बोला - 
“रुक जाओ सिया! इस बार मैं तुम्हें छोड़ने वाला नहीं हूँ!”

(वो तेज़ी से उड़ता है और नीचे एक प्राचीन मंदिर की झलक दिखाई देती है — भैरव बाबा जी का मंदिर। मंदिर की चारदीवारी पर रहस्यमयी लाल लपटें चमक रही हैं।)

कबीर (मन में, साँस रोकते हुए) बोला - 
“यहीं… यही जगह है… इंसान और शैतान दोनों के लिए सुरक्षित…
कहीं और जाऊँगा तो तुझे झटका लगेगा, और ये और बिगड़ जाएगी।”
(मंदिर के गेट पर पहुँचते ही सिया झटका खाती है — उसकी शक्ति अचानक कम हो जाती है। वो हिलती-डुलती है, पर पूरी तरह शांत नहीं होती।)

कबीर (धीरे से, गंभीर स्वर में) बोला - 
“यहाँ कोई भी हमारी ताकत को छू नहीं सकता…
बस एक जगह… एक समय…
और मैं तुम्हें संभाल लूँगा…”

(कबीर मंदिर के भीतर प्रवेश करता है। अंदर हल्की लाल रोशनी है, दीवारों पर पुराने देवी-देवता और भैरव बाबा जी की तस्वीरें हैं।
सिया झुकती है, उसका सिर नीचे, आँखें लाल, सांसें तेज़।)

सिया (गर्राती हुई, धौंस देते स्वर में) बोली - 
“कबीर जी… मुझे मत रोको… मुझे काटना है… मुझे काटना ही होगा!”

कबीर (थकते हुए, पर दृढ़ता से) बोला - 
“नहीं सिया… इस बार मैं तुम्हें किसी के हाथ नहीं आने दूँगा…
तुम चाहे कितनी भी आक्रामक हो, मैं तुम्हें संभाल लूँगा!”

(कबीर सिया को दीवार के पास टिकाता है। मंदिर की लाल रोशनी सिया की लाल आँखों के साथ चमकती है।
उसका शरीर काँप रहा है, पर उसकी आक्रामकता कम नहीं हुई।)
“जहाँ जंगल में उसे कोई नहीं रोक सकता था,
वहीँ भैरव बाबा जी का मंदिर उसकी सीमा तय करेगा…
इंसान और शैतान की जंग अब केवल शुरू हुई थी।”

(रात का समय, काल भैरव का मंदिर। लाल रोशनी मंद है। कबीर उर्फ़ करन, थकते हुए पर सख्त इरादों के साथ खड़ा है। सिया पूरी तरह ज़ॉम्बी स्थिति में है, पर अब मंदिर की शक्ति से थोड़ी शांत है।)
(कबीर मंदिर के बीच में बड़े ध्यान से सिंदूर का गहरा बनाता है। उसके चारों ओर निम्बू और मिर्ची रखता है।
सिया को वह घेरे के बीच में बिठाता है। और खुद भी उसके करीब आकर घेरे के अंदर बैठ जाता है।)

कबीर (धीरे से, गंभीर स्वर में) बोला - 
“यह घेरा तुम्हें बाहर की बुरी ताकतों से रोकेगा…
और न तो तुम किसी को काट सकोगी, न ही कोई तुम्हें छू सकेगा।
बस मेरे अलावा।”

(कबीर सिया की मांग में हल्के हाथ से सिंदूर भरता है। सिया झुकती है, आँखें लाल, पर अब और अधिक आक्रामक नहीं।)

कबीर (मन में, फुसफुसाते हुए) बोला - 
“महा मृत्युंजय मंत्र… पुरानी धार्मिक ग्रंथों के मंत्र…
तुम्हारी रूह को शांत करेंगे, और बुरी शक्तियों से बचाएंगे।”

(वो मंत्र उच्चारण करता है। उसकी आवाज़ गूँजती है। )

कबीर ( मंत्र पढ़ते हुए) बोला - 
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥ 

(मंदिर की लाल रोशनी सिया के चारों ओर चमकने लगती है।
सिया बिठी-बिठी धीरे-धीरे झूमने लगती है, जैसे उसकी आंतरिक शक्ति और आक्रामकता संतुलित हो रही हो।)
“जैसे ही करन ने अपना टोटका शुरू किया,
सिया की आत्मा धीरे-धीरे नियंत्रण में आने लगी…
मंदिर की दिव्य शक्ति और करन के टोटका ने ज़ॉम्बी असर को कम कर दिया।”
(कबीर हाथ जोड़कर मंत्र पढ़ते हुए सिया की आँखों में देखता है।
वो कांप रहा है, पर उसकी निगरानी सिया पर लगातार है।)

कबीर (धीरे से, फुसफुसाते हुए) बोला - 
“बस… और थोड़ी देर…
तुम अब सुरक्षित हो… और मैं तुम्हें किसी के हाथ नहीं आने दूँगा।”

(सिया हल्की हँसी जैसी आवाज़ निकालती है। उसका शरीर धीरे-धीरे स्थिर हो जाता है।
कबीर टोटका जारी रखता है, मंदिर की हवा मंत्रों के प्रभाव से भारी हो जाती है।)
“भैरव का मंदिर, सिंदूर का गहरा, निंबू-मिर्ची और धार्मिक मंत्र…
अब तक की सबसे बड़ी जंग का पहला पड़ाव था खत्म।
लेकिन असली चुनौती अभी बाकी थी…।”

कबीर बोला - 
ओ............ म।