Mr. & Ms. Fake
Episode 30 – The Identity She Never Knew
रात के करीब बारह बजे...
सिंह हाउस पूरी तरह शांत था।
दिनभर की घटनाओं ने हर किसी को थका दिया था।
लेकिन एक इंसान ऐसा था जिसकी आँखों में नींद का नाम तक नहीं था।
आर्यवीर।
वह बालकनी में खड़ा शहर की रोशनी देख रहा था।
आज पहली बार उसके सामने उसके पिता की मौत का सच आने की उम्मीद जगी थी।
लेकिन उसी सच के साथ सान्वी का अतीत भी उलझ गया था।
पीछे से धीमे कदमों की आवाज़ आई।
आर्यवीर ने बिना मुड़े कहा—
"सोई नहीं?"
सान्वी उसके पास आकर खड़ी हो गई।
"तुम भी तो नहीं सोए।"
"मेरे पास सोचने के लिए बहुत कुछ है।"
सान्वी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
"और मेरे पास?"
आर्यवीर उसकी तरफ मुड़ा।
"तुम्हारे पास तो पूरा अतीत पड़ा है।"
सान्वी ने उसकी बाँह पकड़ ली।
"तो मिलकर सुलझाएँगे।"
आर्यवीर ने उसकी तरफ देखा।
"तुम्हें डर नहीं लग रहा?"
"बहुत।"
"फिर भी?"
सान्वी ने सिर हिलाया।
"फिर भी।"
"क्योंकि अब मैं अकेली नहीं हूँ।"
आर्यवीर कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर धीरे से बोला—
"मैं तुम्हें अकेला होने भी नहीं दूँगा।"
सान्वी मुस्कुरा दी।
"लेकिन एक बात बताओ..."
"क्या?"
"अगर मेरा अतीत तुम्हारी जिंदगी से भी जुड़ा निकला तो?"
आर्यवीर ने बिना देर किए कहा—
"तो उसे भी साथ में स्वीकार करेंगे।"
अगली सुबह
देवेंद्र अपने कमरे में पुरानी अलमारी खोल रहे थे।
उनके हाथ में वही छोटी चाबी थी, जिसे उन्होंने पिछले पंद्रह सालों से संभालकर रखा था।
अलमारी खुली।
अंदर पुराने कागज़, कुछ तस्वीरें और एक काली डायरी रखी थी।
देवेंद्र ने डायरी उठाई।
उनकी आँखों में डर उतर आया।
"अब इसे छुपाने का कोई फायदा नहीं।"
उन्होंने डायरी आर्यवीर को देने के लिए बाहर कदम बढ़ाया।
लेकिन तभी...
कमरे के दरवाज़े के बाहर कोई खड़ा था।
देवेंद्र रुक गए।
"कौन?"
कोई जवाब नहीं।
उन्होंने दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
बस फर्श पर एक लिफाफा पड़ा था।
देवेंद्र ने उसे उठाया।
उस पर लिखा था—
"अगर डायरी आर्यवीर तक पहुँची, तो अगली मौत तुम्हारे परिवार में होगी।"
देवेंद्र का चेहरा सफेद पड़ गया।
उधर...
डाइनिंग टेबल पर पूरा परिवार बैठा था।
चिंटू माहौल को सामान्य बनाने की कोशिश कर रहा था।
"दादी, आज नाश्ते में क्या है?"
दादी ने कहा—
"जो तुम्हें पसंद है।"
चिंटू खुश हो गया।
"पराठे?"
"हाँ।"
वह खुशी से चिल्लाया—
"आज तो जिंदगी सफल है!"
कबीर ने कहा—
"तेरी जिंदगी की सफलता पराठे से शुरू और खत्म होती है।"
सान्वी हँस पड़ी।
आर्यवीर उसे देखकर मुस्कुरा दिया।
दादी ने दोनों को देखा।
कल की सारी परेशानियों के बीच पहली बार उनके चेहरे पर भी हल्की मुस्कान आई।
लेकिन तभी...
दरवाज़े पर देवेंद्र आ गए।
उनका चेहरा देखकर आर्यवीर समझ गया कि कुछ गड़बड़ है।
"ताऊजी?"
देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।
"आर्य... मुझे तुमसे अकेले में बात करनी है।"
आर्यवीर उठ खड़ा हुआ।
"अभी?"
"हाँ।"
दोनों स्टडी रूम में गए।
देवेंद्र ने दरवाज़ा बंद किया।
उन्होंने डायरी टेबल पर रख दी।
आर्यवीर ने उसे देखते ही पूछा—
"ये क्या है?"
"तुम्हारे पिता की डायरी।"
आर्यवीर के चेहरे पर हैरानी छा गई।
"आपके पास थी?"
देवेंद्र ने सिर हिलाया।
"तुम्हारे पिता ने मुझे दी थी।"
"उस रात से पहले।"
आर्यवीर ने डायरी उठा ली।
उसके हाथ काँप रहे थे।
"इसमें क्या है?"
देवेंद्र ने कहा—
"तुम्हारे पिता की आखिरी खोज।"
"समर से जुड़ी?"
"समर से भी..."
"और माधवी से भी।"
आर्यवीर ने तुरंत डायरी खोल दी।
पहले कुछ पन्नों पर बिजनेस से जुड़ी बातें थीं।
फिर एक पन्ने पर मोटे अक्षरों में लिखा था—
"अगर मुझे कुछ हो जाए, तो माधवी की बेटी को सुरक्षित रखना।"
आर्यवीर की साँस रुक गई।
उसने अगला पन्ना पलटा।
वहाँ लिखा था—
"उस बच्ची की पहचान ही इस पूरे खेल की सबसे बड़ी कुंजी है।"
आर्यवीर ने डायरी बंद कर दी।
"सान्वी?"
देवेंद्र ने धीरे से सिर हिलाया।
"हाँ।"
आर्यवीर तुरंत सान्वी के पास जाना चाहता था।
लेकिन देवेंद्र ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"अभी नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि आगे जो लिखा है..."
"वो तुम्हें सान्वी को बताने से पहले खुद समझना होगा।"
आर्यवीर ने डायरी दोबारा खोली।
अगली लाइन पढ़ते ही उसके चेहरे के भाव बदल गए।
"सान्वी, माधवी की जैविक बेटी है... लेकिन उसका असली जन्म रिकॉर्ड जानबूझकर बदला गया है।"
आर्यवीर ने देवेंद्र की तरफ देखा।
"मतलब?"
देवेंद्र ने कहा—
"सान्वी को किसी और नाम से दर्ज किया गया था।"
"किस नाम से?"
देवेंद्र ने धीरे से कहा—
"सिया मल्होत्रा।"
आर्यवीर की आँखें फैल गईं।
"मल्होत्रा?"
"हाँ।"
"तो क्या..."
देवेंद्र ने उसकी बात पूरी कर दी।
"समर का परिवार और सान्वी का जन्म..."
"एक ही कहानी का हिस्सा हैं।"
उसी वक्त...
स्टडी रूम के बाहर सान्वी खड़ी थी।
वह आर्यवीर को बुलाने आई थी।
लेकिन अंदर से उसे अपनी माँ का नाम सुनाई दिया।
फिर...
"सिया मल्होत्रा।"
सान्वी का चेहरा सफेद पड़ गया।
उसने धीरे से दरवाज़ा खोला।
दोनों उसकी तरफ देखने लगे।
"क्या कहा आपने?"
आर्यवीर चुप हो गया।
सान्वी की आँखों में आँसू आ गए।
"सिया मल्होत्रा कौन है?"
देवेंद्र ने नजरें झुका लीं।
सान्वी ने काँपती आवाज़ में पूछा—
"मुझसे कुछ मत छुपाइए।"
आर्यवीर उसके पास आया।
"सान्वी..."
"नहीं।"
उसने हाथ पीछे कर लिया।
"आज नहीं।"
"मुझे पूरी सच्चाई चाहिए।"
आर्यवीर ने डायरी उसकी तरफ बढ़ा दी।
सान्वी ने उसे पढ़ना शुरू किया।
कुछ पन्ने पलटने के बाद...
उसकी आँखें एक तस्वीर पर रुक गईं।
एक अस्पताल।
एक नवजात बच्ची।
और उसके नीचे नाम—
Sia Malhotra.
सान्वी के हाथ से डायरी गिर गई।
"तो..."
उसकी आवाज़ टूट गई।
"मैं सान्वी नहीं हूँ?"
आर्यवीर ने तुरंत कहा—
"तुम जो भी हो, मेरे लिए तुम वही सान्वी हो।"
लेकिन सान्वी की आँखों में सवाल था।
"मेरा नाम बदला क्यों गया?"
"मेरे पिता कौन थे?"
"और..."
वह रुक गई।
उसने काँपते हुए पूछा—
"क्या समर मल्होत्रा मेरा रिश्तेदार है?"
कमरे में खामोशी छा गई।
देवेंद्र ने कोई जवाब नहीं दिया।
और यही खामोशी...
सान्वी के लिए सबसे डरावना जवाब बन गई।
उसी समय – रिया
रिया अपने कमरे में थी।
उसके फोन पर एक तस्वीर आई।
तस्वीर में वही पुराना अस्पताल था।
नीचे मैसेज था—
"अब तुम्हें समझ आ गया होगा कि सान्वी कौन है।"
रिया ने जवाब दिया—
"क्या समर उसका पिता है?"
कुछ सेकंड बाद जवाब आया—
"नहीं।"
रिया चौंकी।
"तो फिर?"
अगला मैसेज आया—
"लेकिन सान्वी का असली पिता वही आदमी है जिससे समर सबसे ज्यादा नफरत करता था।"
रिया की आँखें फैल गईं।
"कौन?"
मैसेज आया—
"अमन शर्मा।"
रिया का चेहरा बदल गया।
उसे समझ आ गया...
अगर यह सच था...
तो सान्वी और समर के बीच सिर्फ दुश्मनी नहीं थी।
उनके परिवारों के बीच खून से जुड़ा एक पुराना रहस्य था।
सिंह हाउस – शाम
सान्वी पूरे दिन किसी से बात नहीं कर पाई।
वह अपने कमरे में बैठी पुरानी तस्वीरें देख रही थी।
एक तस्वीर में उसकी माँ थी।
एक में छोटा-सा बच्चा।
और एक तस्वीर...
जिसे देखकर उसकी धड़कन रुक गई।
तस्वीर में उसकी माँ माधवी के साथ एक आदमी खड़ा था।
वह आदमी...
अमन शर्मा।
और उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी...
जो सान्वी ने बचपन की अपनी धुंधली यादों में देखी थी।
दरवाज़ा खुला।
माधवी अंदर आईं।
सान्वी ने तस्वीर उनकी तरफ बढ़ाई।
"ये मेरे पिता हैं?"
माधवी की आँखों में आँसू आ गए।
उन्होंने सिर हिला दिया।
"हाँ।"
सान्वी रोते हुए बोली—
"आपने मुझे इतने साल उनसे दूर क्यों रखा?"
माधवी उसके पास बैठ गईं।
"क्योंकि मैं तुम्हें बचाना चाहती थी।"
"किससे?"
माधवी ने उसकी आँखों में देखा।
और बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
"समर से नहीं, सान्वी..."
"मैं तुम्हें तुम्हारे अपने पिता के दुश्मनों से बचा रही थी।"
सान्वी ने पूछा—
"मेरे पिता ने ऐसा क्या किया था?"
माधवी ने काँपते हुए कहा—
"तुम्हारे पिता ने समर के सबसे बड़े राज़ का पता लगा लिया था।"
"कौन-सा राज़?"
माधवी कुछ कह पातीं...
उससे पहले बाहर जोरदार धमाका हुआ।
धड़ाम!
खिड़की का शीशा टूट गया।
सान्वी चीख पड़ी।
आर्यवीर दौड़ता हुआ कमरे में आया।
"सान्वी!"
माधवी ने उसे पीछे किया।
फर्श पर एक छोटा-सा पैकेट पड़ा था।
आर्यवीर ने उसे उठाया।
अंदर एक USB ड्राइव थी।
और एक कागज़।
उस पर लिखा था—
"तुम अपने पिता का सच जानना चाहती हो?"
"तो इसे अकेले देखना।"
आर्यवीर ने कागज़ पलटा।
पीछे सिर्फ़ एक नाम लिखा था—
समर मल्होत्रा
आर्यवीर और सान्वी ने एक-दूसरे को देखा।
अब उन्हें समझ आ गया था...
उनके प्यार की अगली परीक्षा सिर्फ़ उनके रिश्ते की नहीं थी।
यह परीक्षा उनके पूरे अतीत की थी।
और इस बार...
सच शायद किसी एक का नहीं,
दो परिवारों का भविष्य बदलने वाला था।
क्रमशः...