एपिसोड 1 – शादी से बचने का आख़िरी रास्ता
सुबह के आठ बजे।
दिल्ली की सड़कें रोज़ की तरह भाग रही थीं। हॉर्न, मेट्रो की आवाज़, चाय की दुकानों पर भीड़ और लोगों के चेहरों पर काम पर पहुँचने की जल्दी।
लेकिन इस भागती हुई दुनिया में एक इंसान ऐसा भी था, जो किसी मीटिंग या ट्रैफिक से नहीं, बल्कि अपनी शादी से भाग रहा था।
आर्यवीर सिंह।
सफ़ेद शर्ट, नीली जींस, कंधे पर लैपटॉप बैग और चेहरे पर ऐसी बेचैनी जैसे आज उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा इंटरव्यू हो।
वह ऑफिस पहुँचने ही वाला था कि मोबाइल बज उठा।
स्क्रीन पर नाम चमका—
"दादी ❤️"
आर्यवीर ने गहरी साँस ली।
"हे भगवान... सुबह-सुबह फिर शुरू हो गई।"
उसने कॉल उठाई।
"जी दादी..."
दूसरी तरफ़ से दादी की तेज़ आवाज़ आई—
"कहाँ है तू?"
"ऑफिस जा रहा हूँ।"
"सीधे घर आ जाना शाम को।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज लड़की वाले आ रहे हैं।"
आर्यवीर वहीं रुक गया।
"क्या... फिर से?"
"हाँ! इस बार मना मत करना। पिछली बार तूने कहा लड़की ज़्यादा चुप थी। उससे पहले कहा ज़्यादा बोलती थी। उससे पहले कहा उसे कॉफ़ी पसंद नहीं थी। बेटा, तू शादी करेगा या रिसर्च?"
ऑफिस के बाहर खड़े गार्ड तक हँसी रोक नहीं पाए।
आर्यवीर ने आँखें बंद कर लीं।
"दादी, अभी मेरा शादी का कोई इरादा नहीं है।"
"शाम सात बजे घर। बस!"
कॉल कट गई।
आर्यवीर ने मोबाइल जेब में रखा और आसमान की तरफ़ देखकर बुदबुदाया—
"भगवान... मेरी गलती क्या है?"
ऑफिस में घुसते ही उसका सबसे अच्छा दोस्त कबीर मुस्कराते हुए सामने आ गया।
"चेहरा देखकर लग रहा है, आज फिर शादी का बम फूटा है।"
आर्यवीर कुर्सी पर गिरते हुए बोला—
"यार, दादी नहीं मानेंगी। हर हफ्ते नई लड़की।"
कबीर हँस पड़ा।
"एक काम कर।"
"क्या?"
"एक गर्लफ्रेंड बना ले।"
"मेरी है ही नहीं।"
"तो... नकली बना ले।"
आर्यवीर ने उसे ऐसे देखा जैसे उसने कोई पागलपन की बात कर दी हो।
"दिमाग़ खराब है क्या?"
कबीर मुस्कराया।
"दिल्ली में सब किराए पर मिलता है—घर, गाड़ी, सूट... तो गर्लफ्रेंड क्यों नहीं?"
आर्यवीर ने तकिया उठाकर उसकी तरफ़ फेंका।
"चुप रह।"
लेकिन कबीर की बात उसके दिमाग़ में कहीं अटक गई।
उधर...
दिल्ली के एक छोटे-से थिएटर में ज़ोरदार रिहर्सल चल रही थी।
एक लड़की अलग-अलग आवाज़ों में डायलॉग बोल रही थी।
कभी गाँव की लड़की...
कभी अंग्रेज़ी बोलने वाली बिज़नेस वुमन...
कभी रोती हुई बहू...
कभी गुस्सैल पुलिस अफ़सर।
डायरेक्टर ताली बजाकर बोला—
"वाह सान्वी! कमाल कर दिया।"
सान्वी हँस पड़ी।
"सर, एक्टिंग ही मेरी सुपरपावर है।"
सभी कलाकार हँसने लगे।
तभी उसका फोन बजा।
उसने देखा—
पापा।
चेहरे की मुस्कान एक पल में गायब हो गई।
"हैलो पापा..."
उधर से धीमी आवाज़ आई—
"बेटा... अस्पताल से फोन आया था। ऑपरेशन जल्दी कराना होगा।"
सान्वी कुछ पल चुप रही।
"कितने पैसे?"
राशि सुनते ही उसकी आँखों की चमक फीकी पड़ गई।
उसके पास इतने पैसे नहीं थे।
लेकिन उसने आवाज़ में हिम्मत रखी।
"आप चिंता मत कीजिए... मैं इंतज़ाम कर लूँगी।"
कॉल कट गई।
वह एक कुर्सी पर बैठ गई।
धीरे से बोली—
"इतने पैसे... कहाँ से लाऊँ?"
शाम होने लगी।
आर्यवीर अनमने मन से घर पहुँचा।
जैसे ही अंदर आया, पूरा घर सजाया हुआ था।
फूल...
मिठाइयाँ...
नई चादरें...
और बीच में बैठी थीं उसकी दादी।
उसे देखते ही बोलीं—
"जल्दी तैयार हो जा। लड़की वाले आते ही होंगे।"
आर्यवीर ने सिर पकड़ लिया।
उसी समय डोरबेल बजी।
उसने मन ही मन कहा—
"अब बस... बहुत हो गया। कुछ करना पड़ेगा।"
उसे कबीर की बात याद आई—
"नकली गर्लफ्रेंड बना ले..."
आर्यवीर की आँखों में पहली बार उम्मीद की एक हल्की-सी चमक आई।
शायद...
यही उसकी शादी से बचने का आख़िरी रास्ता था।
लेकिन उसे बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि यह एक झूठ उसकी पूरी ज़िंदगी बदलने वाला है...