Mr. Ms. Fake - एपिसोड 29 kajal jha द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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Mr. Ms. Fake - एपिसोड 29

Mr. & Ms. Fake
Episode 29 – The Betrayal
माधवी के सामने बंदूक लिए खड़े उस शख्स को देखकर आर्यवीर के कदम जैसे जमीन में जम गए।
सान्वी ने भी उस चेहरे को देखा...
और उसकी आँखें फैल गईं।
"चाचा...?"
सामने खड़े शख्स ने कोई जवाब नहीं दिया।
वह था—
देवेंद्र सिंह।
आर्यवीर के ताऊजी।
सिंह परिवार का वह इंसान, जिस पर आर्यवीर ने बचपन से सबसे ज्यादा भरोसा किया था।
आर्यवीर की आँखों में अविश्वास था।
"ताऊजी..."
देवेंद्र ने बंदूक नीचे नहीं की।
"मुझे मजबूर मत करो, आर्य।"
आर्यवीर कड़वी हँसी हँसा।
"मजबूर?"
"आप मुझे गोली मारने की बात कर रहे हैं और मैं आपको मजबूर कर रहा हूँ?"
देवेंद्र की आँखों में दर्द दिखाई दिया।
"तुम नहीं समझोगे।"
"तो समझाइए!"
आर्यवीर की आवाज़ गूँज उठी।
"मेरे पिता की मौत में आपका हाथ था?"
देवेंद्र चुप रहे।
बस यही खामोशी...
आर्यवीर के लिए जवाब बन गई।
सान्वी ने धीरे से आर्यवीर का हाथ पकड़ लिया।
"आर्य..."
आर्यवीर ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में गुस्सा था, लेकिन सान्वी के स्पर्श से वह खुद को संभालने लगा।
माधवी आगे आई।
"देवेंद्र..."
"तुमने वादा किया था कि तुम इन बच्चों को नुकसान नहीं पहुँचाओगे।"
देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।
"मैंने आज तक अपना वादा निभाया है।"
माधवी ने गुस्से से कहा—
"तो बंदूक क्यों उठाई है?"
देवेंद्र कुछ पल चुप रहे।
फिर बोले—
"क्योंकि अगर मैंने ऐसा नहीं किया..."
"...तो समर तुम तीनों को जिंदा नहीं छोड़ेगा।"
आर्यवीर चौंक गया।
"क्या?"
देवेंद्र ने बंदूक नीचे कर दी।
"मैं समर का आदमी नहीं हूँ।"
माधवी ने राहत की साँस ली।
लेकिन तभी नीचे से समर की आवाज़ आई—
"देवेंद्र!"
"तुम्हें सच बताने की जरूरत नहीं है।"
देवेंद्र ने आँखें बंद कर लीं।
आर्यवीर ने तुरंत समझ लिया—
"आप यहाँ हमें बचाने आए थे?"
देवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।
"हाँ।"
आर्यवीर कुछ कह पाता, उससे पहले...
समर के आदमियों के कदमों की आवाज़ तेज़ होने लगी।
देवेंद्र ने फुसफुसाकर कहा—
"पीछे वाला रास्ता खुला है।"
"अभी निकलो।"
आर्यवीर ने पूछा—
"और आप?"
"मैं इन्हें रोकूँगा।"
आर्यवीर ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
"इस बार मैं किसी अपने को पीछे छोड़कर नहीं जाऊँगा।"
देवेंद्र की आँखें भर आईं।
"तुम बिल्कुल अपने पिता जैसे हो।"
चारों पीछे की तरफ बढ़ने लगे।
लेकिन तभी...
दरवाज़ा जोर से खुला।
समर के दो आदमी अंदर घुस आए।
देवेंद्र ने तुरंत उन्हें रोक लिया।
"भागो!"
आर्यवीर ने सान्वी और माधवी को लेकर पीछे का दरवाज़ा खोल दिया।
तीनों बाहर निकल गए।
पीछे से आवाज़ें आती रहीं।
लेकिन वे रुके नहीं।
कुछ दूरी पर पहुँचने के बाद...
आर्यवीर ने पीछे देखा।
देवेंद्र भी दौड़ते हुए बाहर आ चुके थे।
"ताऊजी!"
चारों एक पुरानी कार के पास पहुँचे।
देवेंद्र ने कहा—
"बैठो!"
आर्यवीर ने ड्राइविंग सीट संभाली।
कार तेजी से हवेली से दूर निकल गई।
कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
सान्वी अपनी माँ का हाथ पकड़े बैठी थी।
माधवी उसकी उंगलियों को सहला रही थी।
जैसे उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि उसकी बेटी उसके पास बैठी है।
फिर सान्वी ने धीरे से पूछा—
"माँ..."
माधवी ने उसकी तरफ देखा।
"हाँ?"
"आपने मुझे छोड़ा क्यों था?"
माधवी की आँखों में आँसू आ गए।
"मैंने तुम्हें छोड़ा नहीं था।"
"मैंने तुम्हें बचाया था।"
"किससे?"
माधवी ने जवाब दिया—
"तुम्हारे पिता के दुश्मनों से।"
सान्वी ने चौंककर पूछा—
"मेरे पिता कौन थे?"
माधवी कुछ पल चुप रही।
फिर बोली—
"तुम्हारे पिता का नाम अमन शर्मा था।"
सान्वी की आँखों में आँसू आ गए।
"क्या वो भी..."
माधवी ने उसकी बात पूरी की—
"हाँ।"
"वो भी समर के खिलाफ थे।"
"और उसी वजह से..."
उसकी आवाज़ टूट गई।
"मैंने उन्हें खो दिया।"
सान्वी ने माँ को गले लगा लिया।
"मुझे कुछ याद क्यों नहीं?"
माधवी ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"क्योंकि तुम बहुत छोटी थीं।"
"और मैंने जानबूझकर तुम्हारी पुरानी यादों को तुमसे दूर रखा।"
सान्वी पीछे हट गई।
"क्यों?"
माधवी ने कहा—
"क्योंकि अगर तुम्हें सब याद रहता..."
"...तो समर तुम्हें ढूँढ़ लेता।"
आर्यवीर अब तक चुप था।
उसने अचानक पूछा—
"माधवी जी..."
"मेरे पिता की मौत के बारे में आपको क्या पता है?"
माधवी ने उसकी तरफ देखा।
"बहुत कुछ।"
"तो बताइए।"
"उस रात तुम्हारे पिता अमन से मिलने जा रहे थे।"
आर्यवीर चौंक गया।
"मेरे पिता और अमन शर्मा एक-दूसरे को जानते थे?"
"सिर्फ जानते नहीं थे..."
"दोनों मिलकर समर के खिलाफ सबूत जुटा रहे थे।"
आर्यवीर की मुट्ठियाँ भींच गईं।
"तो फिर एक्सीडेंट..."
माधवी ने सिर हिलाया।
"एक्सीडेंट नहीं था।"
"उन्हें रास्ते से हटाया गया था।"
सान्वी ने आर्यवीर की तरफ देखा।
उसकी आँखों में पुराना दर्द लौट आया था।
देवेंद्र अब तक चुप थे।
अचानक उन्होंने कहा—
"एक बात और है।"
आर्यवीर ने रियर-व्यू मिरर से उनकी तरफ देखा।
"क्या?"
देवेंद्र ने धीमे स्वर में कहा—
"तुम्हारे पिता की मौत वाली रात..."
"मैं भी वहाँ था।"
आर्यवीर के हाथ स्टीयरिंग पर जम गए।
"क्या?"
देवेंद्र ने आँखें बंद कर लीं।
"मैंने सब देखा था।"
"तो आपने इतने साल मुझे सच क्यों नहीं बताया?"
देवेंद्र की आवाज़ टूट गई।
"क्योंकि समर ने मुझे धमकी दी थी।"
"अगर मैंने मुँह खोला..."
"तो वह तुम्हें भी मार देता।"
आर्यवीर ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन उसकी आँखों में आँसू आ गए।
देवेंद्र ने आगे कहा—
"लेकिन अब मैं चुप नहीं रहूँगा।"
"मेरे पास उस रात की एक रिकॉर्डिंग है।"
आर्यवीर ने तुरंत पूछा—
"कहाँ?"
"मेरे घर में।"
"अगर वो रिकॉर्डिंग मिल गई..."
देवेंद्र ने कहा—
"तो हम साबित कर सकते हैं कि तुम्हारे पिता की मौत हादसा नहीं थी।"
उधर...
रिया अपने कमरे में बेचैनी से टहल रही थी।
तभी उसके फोन पर समर का मैसेज आया—
"देवेंद्र ने उन्हें बचा लिया।"
रिया के चेहरे पर चिंता छा गई।
उसने तुरंत जवाब दिया—
"अब?"
समर का जवाब आया—
"अब तुम्हें वो काम करना होगा जो मैं नहीं कर सकता।"
रिया ने पूछा—
"क्या?"
कुछ सेकंड बाद जवाब आया—
"सान्वी का भरोसा तोड़ो।"
रिया ने स्क्रीन को देखा।
फिर उसके चेहरे पर धीरे-धीरे एक मुस्कान आई।
"अगर सान्वी को आर्यवीर से ही शक होने लगे..."
"तो किसी समर की जरूरत नहीं पड़ेगी।"
रात...
सिंह हाउस में सभी वापस आ चुके थे।
माधवी को दादी ने अपने कमरे में रखा।
सान्वी उनके पास बैठी थी।
दोनों पहली बार इतने सालों बाद माँ-बेटी की तरह बातें कर रही थीं।
आर्यवीर बाहर बालकनी में खड़ा था।
देवेंद्र उसके पास आए।
"आर्य..."
आर्यवीर ने उनकी तरफ देखा।
"ताऊजी..."
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर देवेंद्र ने कहा—
"मुझे माफ़ कर देना।"
आर्यवीर की आँखें नम हो गईं।
"आपने मुझे बचाने के लिए इतने साल ये सब सहा..."
"मैं आपको दोष नहीं दे सकता।"
देवेंद्र ने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"तुम्हारे पिता को मैंने आखिरी बार उसी रात देखा था।"
"वो जानते थे कि शायद वो वापस नहीं आएँगे।"
आर्यवीर की आँखें भर आईं।
"उन्होंने कुछ कहा था?"
देवेंद्र ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
"उन्होंने कहा था—"
"अगर मुझे कुछ हो जाए तो आर्य को कहना... डरकर मत जीना।"
आर्यवीर ने आँखें बंद कर लीं।
एक आँसू उसके गाल पर बह गया।
तभी पीछे से सान्वी आई।
उसने आर्यवीर को देखा।
कुछ नहीं पूछा।
बस उसके पास आकर खड़ी हो गई।
आर्यवीर ने उसकी तरफ देखा।
सान्वी ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।
"तुम ठीक हो?"
आर्यवीर ने सिर हिलाया।
"अब हूँ।"
सान्वी मुस्कुराई।
"क्योंकि मैं हूँ?"
आर्यवीर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
"हाँ।"
सान्वी ने धीरे से कहा—
"तो फिर हमेशा रहूँगी।"
दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।
फिर आर्यवीर ने उसका माथा हल्के से छू लिया।
"एक बात कहूँ?"
"हूँ?"
"अगर हमारा रिश्ता पहले नकली था..."
सान्वी मुस्कुराई।
"तो?"
"तो अब मैं इसे जिंदगी भर असली रखना चाहता हूँ।"
सान्वी की आँखों में आँसू और मुस्कान दोनों आ गए।
वह धीरे से उसके कंधे पर सिर रख देती है।
लेकिन...
उन्हें पता नहीं था कि उसी समय...
घर के बाहर एक कार आकर रुकी थी।
कार में बैठा व्यक्ति सिंह हाउस की तरफ देख रहा था।
उसके हाथ में एक पुरानी फाइल थी।
फाइल के ऊपर लिखा था—
"Saanvi Sharma – Birth Records."
और उस फाइल के अंदर...
एक ऐसा दस्तावेज़ था जो साबित कर सकता था कि सान्वी की पहचान...
जिसे वह इतने सालों से सच मानती आई थी, वह पूरी तरह गलत थी।
क्रमशः...