Mr. & Ms. Fake
Episode 28 – माँ के सामने
अगले दिन सुबह से ही सान्वी के चेहरे पर बेचैनी साफ दिखाई दे रही थी।
उसके हाथ में वही तस्वीर थी जो रात को अनजान नंबर से आई थी।
एक महिला...
चेहरे पर उम्र की हल्की लकीरें...
लेकिन आँखें बिल्कुल सान्वी जैसी।
क्या वह सच में उसकी माँ थी?
सवाल जितना आसान था, जवाब उतना ही मुश्किल।
सान्वी बालकनी में खड़ी तस्वीर को बार-बार देख रही थी।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
"सुबह से इसे कितनी बार देख चुकी हो?"
सान्वी ने पलटकर देखा।
आर्यवीर खड़ा था।
उसके हाथ में दो कप कॉफी थी।
सान्वी ने एक कप ले लिया।
"पता नहीं..."
"मुझे डर लग रहा है।"
आर्यवीर उसके पास आकर खड़ा हो गया।
"डर किस बात का?"
"अगर वो मेरी माँ नहीं हुईं तो?"
"और अगर हुईं तो?"
सान्वी ने उसकी तरफ देखा।
"तो शायद मेरी जिंदगी पूरी तरह बदल जाएगी।"
आर्यवीर मुस्कुराया।
"तुम्हारी जिंदगी पहले ही बदल चुकी है।"
"कैसे?"
"पहले तुम अकेली थीं..."
उसने उसकी तरफ देखते हुए कहा—
"अब मैं हूँ।"
सान्वी के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।
"तुम हर बात को इतना फिल्मी क्यों बना देते हो?"
आर्यवीर ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा—
"क्योंकि तुम मेरी जिंदगी की हीरोइन हो।"
सान्वी हँस पड़ी।
"ओह, मिस्टर फिल्मी!"
"जी, आपकी सेवा में।"
दोनों हँसने लगे।
लेकिन तभी...
सान्वी का फोन बजा।
वही अनजान नंबर।
मैसेज था—
"आज शाम 5 बजे। पुरानी हवेली। अकेली आना। किसी को साथ लाई तो तुम्हें अपनी माँ का चेहरा दोबारा कभी नहीं दिखेगा।"
सान्वी के चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
आर्यवीर ने तुरंत पूछा—
"क्या हुआ?"
सान्वी ने फोन छुपाने की कोशिश की।
लेकिन आर्यवीर ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"सान्वी..."
"मुझसे मत छुपाओ।"
सान्वी ने फोन उसे दे दिया।
मैसेज पढ़ते ही आर्यवीर का चेहरा सख्त हो गया।
"तुम अकेली कहीं नहीं जाओगी।"
"लेकिन उन्होंने साफ लिखा है—"
"मुझे फर्क नहीं पड़ता।"
"अगर ये जाल हुआ तो?"
सान्वी ने उसकी तरफ देखा।
"लेकिन अगर सच में माँ वहाँ हुईं तो?"
आर्यवीर कुछ पल चुप रहा।
वह समझ सकता था कि सान्वी अपनी माँ से मिलने के इस मौके को खोना नहीं चाहती।
उसने आखिरकार कहा—
"ठीक है।"
सान्वी ने राहत की साँस ली।
"सच?"
"हाँ।"
"लेकिन एक शर्त पर।"
"क्या?"
"तुम अकेली जाओगी..."
सान्वी चौंकी।
"...और मैं तुम्हारे पीछे रहूँगा।"
सान्वी मुस्कुरा दी।
"तुम सुधरोगे नहीं।"
"तुम्हें खोने का रिस्क लेकर तो बिल्कुल नहीं।"
शाम 4:50 बजे
पुरानी हवेली शहर से काफी दूर थी।
सालों से बंद पड़ी वह हवेली बाहर से ही डरावनी लग रही थी।
टूटी खिड़कियाँ...
पुरानी दीवारें...
और चारों तरफ उगे पेड़।
सान्वी कार से उतरी।
उसने चारों तरफ देखा।
आर्यवीर कुछ दूरी पर दूसरी कार में था।
उसने ईयरपीस लगाकर कहा—
"मैं यहीं हूँ।"
सान्वी ने धीरे से कहा—
"पता है।"
"डरो मत।"
"मैं नहीं डर रही।"
"झूठ।"
सान्वी हल्का-सा मुस्कुराई।
"ठीक है... थोड़ा।"
आर्यवीर की आवाज़ आई—
"बस कुछ भी अजीब लगे तो वापस आ जाना।"
"ओके।"
सान्वी हवेली के अंदर चली गई।
अंदर अंधेरा था।
उसके कदमों की आवाज़ पूरे हॉल में गूँज रही थी।
"कोई है?"
कोई जवाब नहीं।
सान्वी ने आगे कदम बढ़ाया।
तभी...
ऊपर की मंज़िल से एक महिला की आवाज़ आई—
"सान्वी..."
सान्वी जम गई।
उसकी आँखें फैल गईं।
"माँ?"
वह सीढ़ियों की तरफ दौड़ी।
ऊपर एक कमरे का दरवाज़ा खुला था।
दरवाज़े के पास वही महिला खड़ी थी।
सान्वी की साँसें रुक गईं।
वही आँखें।
वही चेहरा।
उसके हाथ काँपने लगे।
"आप..."
महिला की आँखों से आँसू बहने लगे।
"सान्वी..."
बस एक शब्द।
और सान्वी का पूरा बचपन जैसे उसकी आँखों के सामने घूम गया।
एक धुंधली याद...
कोई उसे गोद में लेकर लोरी गा रहा था।
कोई उसके माथे को चूम रहा था।
कोई कह रहा था—
"मेरी बच्ची..."
सान्वी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
"माँ?"
महिला ने अपने दोनों हाथ आगे बढ़ाए।
सान्वी दौड़कर उनसे लिपट गई।
दोनों माँ-बेटी फूट-फूटकर रोने लगीं।
"मुझे लगा था आप मर गईं..."
माधवी ने उसके बालों को सहलाया।
"मैं हर दिन तुम्हारे पास लौटना चाहती थी।"
"फिर क्यों नहीं आईं?"
माधवी की आँखों में दर्द उतर आया।
"क्योंकि मुझे डर था..."
"किससे?"
"समर से।"
सान्वी पीछे हट गई।
"आप उससे क्यों डरती थीं?"
माधवी ने उसकी तरफ देखा।
"क्योंकि वो सिर्फ तुम्हारे परिवार का दुश्मन नहीं था।"
"वो तुम्हें भी खत्म करना चाहता था।"
सान्वी स्तब्ध रह गई।
उसी समय...
आर्यवीर ने ईयरपीस में आवाज़ सुनी।
कुछ हलचल थी।
"सान्वी?"
कोई जवाब नहीं।
"सान्वी!"
अब भी कोई जवाब नहीं।
आर्यवीर तुरंत कार से बाहर निकला।
वह हवेली की तरफ दौड़ा।
माधवी ने सान्वी का चेहरा अपने हाथों में लिया।
"तुम्हें मुझसे एक बात का वादा करना होगा।"
"क्या?"
"आर्यवीर पर भरोसा रखना।"
सान्वी चौंक गई।
"आप आर्यवीर को जानती हैं?"
माधवी ने हल्की मुस्कान दी।
"मैं उसके पिता को जानती थी।"
"और तुम्हारे जन्म से पहले..."
"तुम्हारे पिता और आर्यवीर के पिता एक-दूसरे के बहुत करीबी दोस्त थे।"
सान्वी की आँखें फैल गईं।
"मेरे पिता?"
माधवी ने सिर झुका लिया।
"हाँ।"
"लेकिन मुझे अपने पिता के बारे में कुछ नहीं पता।"
माधवी कुछ बोलती...
उससे पहले कमरे का दरवाज़ा जोर से खुला।
आर्यवीर अंदर आ गया।
"सान्वी!"
सान्वी ने पलटकर देखा।
"आर्यवीर..."
आर्यवीर की नजर माधवी पर पड़ी।
वह भी कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गया।
फिर बोला—
"आप..."
माधवी ने उसे देखा।
"तुम बिल्कुल अपने पिता जैसे दिखते हो।"
आर्यवीर की आँखें भर आईं।
"आप मेरे पिता को जानती थीं?"
माधवी ने धीरे से कहा—
"बहुत अच्छी तरह।"
तभी...
नीचे से गाड़ियों की आवाज़ आई।
माधवी का चेहरा अचानक डर से भर गया।
"नहीं..."
आर्यवीर ने पूछा—
"क्या हुआ?"
माधवी ने खिड़की से बाहर देखा।
तीन काली गाड़ियाँ हवेली के बाहर रुक चुकी थीं।
"समर..."
सान्वी ने माँ का हाथ पकड़ लिया।
"अब क्या होगा?"
माधवी ने तुरंत कहा—
"तुम दोनों को यहाँ से जाना होगा।"
आर्यवीर ने कहा—
"और आप?"
"मैं यहीं रहूँगी।"
"नहीं!"
माधवी ने दृढ़ता से कहा—
"अगर मैं तुम्हारे साथ गई तो वो तुम्हारा पीछा करेगा।"
आर्यवीर ने सान्वी की तरफ देखा।
"हम आपको छोड़कर नहीं जाएँगे।"
तभी नीचे से आवाज़ आई—
"माधवी!"
समर की आवाज़।
"बहुत साल छुपती रहीं।"
"अब बाहर आ जाओ।"
माधवी ने सान्वी को पीछे कर दिया।
"तुम दोनों पीछे के रास्ते से जाओ।"
सान्वी ने सिर हिला दिया।
"नहीं।"
"मैं आपको फिर से नहीं खोऊँगी।"
माधवी की आँखों में आँसू आ गए।
"तुम मेरी बेटी हो..."
"तुम्हें मेरी बात माननी होगी।"
अचानक...
नीचे काँच टूटने की आवाज़ आई।
समर के आदमी ऊपर आने लगे।
आर्यवीर ने सान्वी का हाथ पकड़ लिया।
"चलो!"
तीनों पीछे के रास्ते की तरफ बढ़े।
लेकिन तभी...
एक आदमी सामने आ गया।
आर्यवीर ने उसे रोकने की कोशिश की।
कुछ देर धक्का-मुक्की हुई।
सान्वी ने माधवी को पीछे किया।
तभी...
एक गोली चलने की आवाज़ आई।
धाँय!
तीनों जम गए।
गोली दीवार में लगी थी।
समर नीचे से चिल्लाया—
"अगली गोली दीवार में नहीं जाएगी!"
आर्यवीर ने सान्वी को अपने पीछे कर लिया।
"सब नीचे रहो।"
माधवी ने अचानक आर्यवीर का हाथ पकड़ा।
"एक बात..."
"क्या?"
"तुम्हारे पिता की मौत..."
"उसके पीछे समर अकेला नहीं था।"
आर्यवीर की आँखें फैल गईं।
"क्या मतलब?"
माधवी ने कहा—
"तुम्हारे परिवार का कोई अपना भी उसके साथ मिला हुआ था।"
आर्यवीर स्तब्ध रह गया।
"कौन?"
माधवी ने जवाब देने के लिए जैसे ही मुँह खोला...
पीछे से किसी ने उसका नाम पुकारा—
"माधवी!"
माधवी का चेहरा अचानक सफेद पड़ गया।
सान्वी ने पूछा—
"माँ?"
माधवी ने धीरे से पीछे देखा।
दरवाज़े पर...
एक ऐसा चेहरा खड़ा था जिसे देखकर आर्यवीर और माधवी दोनों के होश उड़ गए।
वह व्यक्ति...
सिंह परिवार का ही था।
और उसके हाथ में बंदूक थी।
क्रमशः...