Mr. Ms. Fake - एपिसोड 27 kajal jha द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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Mr. Ms. Fake - एपिसोड 27

Mr. & Ms. Fake
Episode 27 – The Truth About Saanvi
समर के मुँह से निकले आखिरी शब्दों के बाद कमरे में ऐसा सन्नाटा छा गया, जैसे अचानक सारी आवाज़ें कहीं खो गई हों।
"तुम्हारी माँ का..."
सान्वी बस उसे देखती रह गई।
उसके चेहरे पर सवाल थे।
"आप... मेरी माँ को जानते थे?"
समर ने कोई जवाब नहीं दिया।
आर्यवीर तुरंत सान्वी के आगे आकर खड़ा हो गया।
"जो कहना है, मुझसे कहो।"
समर हल्का-सा मुस्कुराया।
"तुम्हें हमेशा दूसरों की रक्षा करने की आदत है, आर्यवीर।"
"बचपन से।"
"लेकिन इस बार..."
उसकी नजर सान्वी पर गई।
"...तुम्हें खुद भी नहीं पता कि तुम किससे बचा रहे हो।"
सान्वी ने आगे बढ़कर कहा—
"मुझे पहेलियाँ पसंद नहीं हैं।"
"अगर आप मेरी माँ को जानते थे तो सीधे बताइए।"
समर कुछ पल उसे देखता रहा।
फिर बोला—
"तुम्हारी माँ का नाम माधवी था।"
सान्वी की साँस अटक गई।
यह नाम उसने बचपन की अपनी कुछ धुंधली यादों में सुना था।
एक माँ की आवाज़...
एक गर्म हथेली...
एक खुशबू...
और फिर...
अंधेरा।
उसे अपनी माँ का चेहरा तक याद नहीं था।
नैना अचानक बोली—
"समर, बस करो।"
समर ने उसकी तरफ देखा।
"तुम इतने साल चुप रहीं..."
"अब मुझे बोलने से रोक रही हो?"
नैना ने गुस्से से कहा—
"तुम्हें सच बताने का कोई हक नहीं है।"
"क्यों?"
"क्योंकि तुमने ही सब बर्बाद किया था।"
समर की मुस्कान गायब हो गई।
"सावधान, नैना।"
आर्यवीर आगे बढ़ा।
"नैना से दूर रहो।"
समर हँस पड़ा।
"तुम्हें लगता है तुम मुझे रोक सकते हो?"
आर्यवीर ने कठोर आवाज़ में कहा—
"कोशिश करके देख लो।"
सान्वी ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"आर्यवीर, नहीं।"
आर्यवीर ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों में गुस्सा था।
लेकिन सान्वी ने सिर हिलाया।
"हमें पहले सच जानना है।"
आर्यवीर शांत हो गया।
समर ने अपनी जेब से एक पुराना कागज़ निकाला।
"ये देखो।"
उसने वह कागज़ सान्वी की तरफ बढ़ाया।
सान्वी ने काँपते हाथों से उसे लिया।
यह एक पुराना अस्पताल रिकॉर्ड था।
ऊपर लिखा था—
Patient: Madhavi Sharma
नीचे...
Child: Female
Date of Birth: —
और सबसे नीचे एक नाम था—
Saanvi Sharma
सान्वी की आँखें फैल गईं।
"ये..."
उसके हाथ काँपने लगे।
"ये मेरा नाम है।"
समर बोला—
"हाँ।"
"तुम्हारी माँ ने तुम्हें जन्म दिया था..."
"...लेकिन तुम्हारे जन्म के कुछ समय बाद वह गायब हो गई।"
सान्वी ने धीमे से पूछा—
"गायब?"
"कहाँ गईं मेरी माँ?"
समर चुप रहा।
नैना ने नजरें झुका लीं।
सान्वी ने उसे देखा।
"आप जानती हैं?"
नैना की आँखों में आँसू आ गए।
"हाँ।"
"तो मुझे बताइए।"
नैना कुछ बोल नहीं पाई।
सान्वी की आवाज़ भर्रा गई।
"आप सबको मेरे बारे में इतना कुछ पता था..."
"फिर मुझे किसी ने कुछ क्यों नहीं बताया?"
आर्यवीर ने सान्वी का हाथ पकड़ लिया।
"तुम अकेली नहीं हो।"
सान्वी ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
"आर्यवीर..."
"मेरी माँ कौन थी, मुझे क्यों नहीं पता?"
आर्यवीर ने उसे अपने पास खींच लिया।
"हम पता लगाएंगे।"
समर ने ताना मारा—
"बहुत भरोसा है अपने प्यार पर।"
आर्यवीर ने उसकी तरफ देखा।
"हाँ।"
"क्योंकि ये नकली नहीं है।"
सान्वी की आँखें फिर भर आईं।
समर कुछ बोलता, उससे पहले बाहर से पुलिस की गाड़ियों की आवाज़ सुनाई दी।
सायरन की आवाज़ रिसॉर्ट में गूँजने लगी।
समर के चेहरे पर पहली बार बेचैनी दिखाई दी।
"पुलिस?"
आर्यवीर मुस्कुराया।
"तुम्हें लगा हम बिना तैयारी के यहाँ आए हैं?"
समर ने पीछे हटते हुए कहा—
"ये खत्म नहीं हुआ।"
नैना ने राहत की साँस ली।
लेकिन समर अचानक रुका।
उसने सान्वी की तरफ देखा।
"एक बात याद रखना..."
"तुम्हारी माँ की मौत का सच..."
"...तुम्हें जितना खुश करेगा, उससे कहीं ज्यादा तोड़ देगा।"
और वह पीछे के दरवाज़े से निकल गया।
आर्यवीर उसके पीछे जाने लगा।
लेकिन नैना ने उसे रोक दिया।
"उसे जाने दो।"
"क्यों?"
"क्योंकि अभी हमारे पास उससे ज्यादा जरूरी काम है।"
आर्यवीर ने पूछा—
"क्या?"
नैना ने सान्वी की तरफ देखा।
"उसे उसकी माँ का सच बताना।"
कुछ देर बाद...
सभी सिंह हाउस लौट आए।
दादी पहले से चिंतित होकर उनका इंतज़ार कर रही थीं।
जैसे ही उन्होंने सान्वी को देखा, उन्हें समझ आ गया कि कुछ बहुत बड़ा हुआ है।
"क्या हुआ?"
सान्वी उनके सामने खड़ी हो गई।
"दादी..."
"मुझे अपनी माँ के बारे में कुछ पता चला है।"
दादी का चेहरा बदल गया।
"तुम्हारी माँ?"
सान्वी ने उनकी आँखों में देखा।
"आप उन्हें जानती थीं?"
दादी चुप रहीं।
सान्वी की आँखों में आँसू आ गए।
"प्लीज़..."
"आज कोई झूठ मत बोलिए।"
"मुझे सिर्फ़ सच चाहिए।"
दादी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
उन्होंने धीरे से कहा—
"हाँ..."
"मैं तुम्हारी माँ को जानती थी।"
सान्वी स्तब्ध रह गई।
"कैसे?"
दादी ने कुर्सी पर बैठते हुए कहा—
"क्योंकि माधवी..."
"मेरे बेटे की सबसे करीबी दोस्त थी।"
आर्यवीर ने पूछा—
"पापा की?"
दादी ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
फिर उन्होंने सान्वी की तरफ देखा।
"और तुम्हारे जन्म से पहले..."
"तुम्हारी माँ ने मुझे एक जिम्मेदारी दी थी।"
सान्वी ने पूछा—
"कौन-सी जिम्मेदारी?"
दादी ने काँपती आवाज़ में कहा—
"तुम्हें बचाने की।"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
सान्वी को जैसे कुछ समझ ही नहीं आया।
"मुझसे बचाने की?"
दादी ने सिर हिलाया।
"नहीं..."
"तुम्हें किसी से बचाने की।"
"किससे?"
दादी ने जवाब देने से पहले आर्यवीर की तरफ देखा।
फिर बोलीं—
"समर से।"
आर्यवीर के चेहरे पर गुस्सा आ गया।
"लेकिन क्यों?"
दादी की आवाज़ धीमी थी।
"क्योंकि समर सिर्फ तुम्हारे पिता का दुश्मन नहीं था..."
"...वो माधवी के पीछे भी पड़ा था।"
सान्वी ने काँपते हुए पूछा—
"मेरी माँ के साथ क्या हुआ था?"
दादी ने आँखें बंद कर लीं।
"तुम्हारी माँ ने तुम्हें जन्म देने के बाद..."
"तुम्हें मेरे पास भेज दिया।"
"उसने कहा था कि अगर उसे कुछ हो जाए..."
"...तो मैं तुम्हें किसी सुरक्षित जगह पहुँचा दूँ।"
सान्वी के चेहरे पर सदमा था।
"तो मैं..."
"मैं अनाथ नहीं थी?"
दादी ने उसकी तरफ देखा।
"नहीं बेटा।"
"तुम्हारी माँ जिंदा थी..."
कुछ पल की खामोशी।
फिर दादी ने बहुत धीमी आवाज़ में कहा—
"कम से कम आखिरी बार जब मैंने उसे देखा था, तब वह जिंदा थी।"
सान्वी के पैर काँपने लगे।
आर्यवीर ने तुरंत उसे संभाल लिया।
"सान्वी..."
उसने आर्यवीर का हाथ कसकर पकड़ लिया।
"मुझे मेरी माँ चाहिए..."
"मुझे उनका सच चाहिए।"
आर्यवीर ने उसके सिर पर हाथ रखा।
"हम उन्हें ढूँढ़ेंगे।"
उसी रात...
रिया अपने कमरे में बैठी थी।
उसके सामने समर का फोन आया।
"क्या हुआ?"
समर ने कहा—
"अब सब बदल गया है।"
रिया घबरा गई।
"क्या मतलब?"
"सान्वी को उसके अतीत का पता चल गया है।"
रिया कुछ पल चुप रही।
फिर बोली—
"तो अब क्या होगा?"
समर ने ठंडी आवाज़ में कहा—
"अब आर्यवीर और सान्वी को अलग करना मुश्किल होगा।"
"लेकिन..."
वह रुका।
"अगर हमें उन्हें अलग करना है..."
"तो हमें सान्वी की माँ को ढूँढ़ना होगा।"
रिया ने पूछा—
"वो जिंदा है?"
समर कुछ सेकंड चुप रहा।
फिर बोला—
"यही तो सबसे बड़ा राज़ है।"
कॉल कट गया।
रिया ने फोन नीचे रखा।
और पहली बार उसके मन में आर्यवीर को पाने से ज्यादा...
इस रहस्य को जानने की इच्छा पैदा हुई।
दूसरी तरफ...
सान्वी बालकनी में खड़ी थी।
आर्यवीर उसके पास आया।
उसने बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया।
सान्वी ने धीमे से पूछा—
"अगर मेरी माँ जिंदा हुईं तो?"
"तो हम उन्हें ढूँढ़ेंगे।"
"और अगर नहीं हुईं?"
आर्यवीर ने उसकी आँखों में देखा।
"तो तुम्हारे पास मैं हूँ।"
सान्वी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
वह पहली बार खुद आगे बढ़ी...
और आर्यवीर को गले लगा लिया।
आर्यवीर कुछ पल शांत रहा।
फिर उसने भी उसे अपनी बाँहों में समेट लिया।
दोनों के बीच अब कोई कॉन्ट्रैक्ट नहीं था।
कोई झूठ नहीं था।
सिर्फ़ एक रिश्ता था...
जो धीरे-धीरे नकली से सच्चा प्यार बन चुका था।
लेकिन उसी समय...
सान्वी के फोन पर एक मैसेज आया।
Unknown Number:
"अगर अपनी माँ को देखना चाहती हो..."
"तो कल शाम 5 बजे अकेली पुरानी हवेली में आना।"
नीचे एक तस्वीर थी।
एक महिला की...
जिसके चेहरे पर उम्र की कुछ लकीरें थीं।
लेकिन आँखें...
बिल्कुल सान्वी जैसी थीं।
सान्वी ने तस्वीर देखते ही फुसफुसाया—
"माँ..."
और उसके पीछे खड़ा आर्यवीर यह तस्वीर देखकर समझ गया—
उनकी सबसे बड़ी तलाश अब शुरू हो चुकी थी।
क्रमशः...