एपिसोड 38— पंद्रह साल पहले क्या हुआ था?
पुराने सेंट मेरीज़ हॉस्पिटल के उस कमरे में अचानक खामोशी छा गई।
अर्जुन की नजर सामने खड़े उस आदमी पर थी।
वही आदमी...
जिसे उसने रिकॉर्ड रूम में देखा था।
वही रहस्यमयी चेहरा, वही आधा चाँद वाला लॉकेट और वही रहस्यमयी मुस्कान।
लेकिन इस बार अर्जुन उसे जाने देने वाला नहीं था।
अर्जुन ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए कहा,
"तुमने कहा कि मेरे परिवार ने आयत को बचाया था... लेकिन उसकी माँ को उससे अलग भी किया था। आखिर पंद्रह साल पहले हुआ क्या था?"
आदमी कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने धीरे से कहा,
"ये कहानी सिर्फ आयत की नहीं है, अर्जुन। इसमें तुम्हारे परिवार के साथ-साथ कई लोगों की जिंदगी दाँव पर लगी थी।"
"मुझे कहानी नहीं चाहिए। मुझे सच चाहिए।"
अर्जुन की आवाज़ सख्त थी।
"आयत की माँ कहाँ है?"
उस आदमी की आँखों में अचानक एक अजीब-सा भाव आया।
"यही तो सबसे बड़ा सवाल है।"
अर्जुन ने उसकी कॉलर पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन वह आदमी पीछे हट गया।
"गुस्से से सच नहीं मिलेगा।"
"तो फिर बोलो!"
आदमी ने टेबल पर पड़ी पुरानी फाइल की तरफ इशारा किया।
"उस फाइल में जो लिखा है, उसे पढ़ो। तुम्हें आधा सच मिल जाएगा। बाकी आधा तुम्हारे घर में बंद है।"
"मेरे घर में?"
"हाँ।"
अर्जुन कुछ समझ पाता, उससे पहले उस आदमी ने कमरे की लाइट बंद कर दी।
पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
अर्जुन ने तुरंत फोन की फ्लैशलाइट ऑन की।
लेकिन सामने कोई नहीं था।
वह खिड़की की तरफ भागा।
नीचे अंधेरे में एक गाड़ी तेज़ी से दूर जा रही थी।
अर्जुन ने गुस्से में मुट्ठी भींच ली।
"भाग गया..."
लेकिन जाते-जाते वह आदमी एक चीज़ छोड़ गया था।
वही आधा चाँद वाला लॉकेट।
अर्जुन ने उसे उठाया।
इस बार उसकी नजर लॉकेट के पीछे गई।
वहाँ बेहद छोटे अक्षरों में कुछ लिखा था—
"N.K."
अर्जुन के दिमाग में एक नाम कौंधा।
नूरजहाँ खान।
आयत को मिला एक अनजान कॉल
उधर हॉस्पिटल में आयत अपने कमरे में थी।
रात काफी हो चुकी थी।
रीवा सो चुकी थी, लेकिन आयत की आँखों में नींद नहीं थी।
उसने अपने फोन में अर्जुन का नंबर देखा।
कई बार मन हुआ कि उसे फोन करे।
लेकिन फिर उसने सोचा—
"शायद वो किसी जरूरी काम में होगा।"
तभी उसका फोन बज उठा।
स्क्रीन पर कोई अनजान नंबर था।
आयत ने कॉल उठाई।
"हैलो?"
कुछ सेकंड तक कोई आवाज़ नहीं आई।
फिर बहुत धीमी आवाज़ आई—
"आयत..."
आयत के शरीर में जैसे सिहरन दौड़ गई।
"कौन?"
"तुम मुझे नहीं पहचानोगी।"
"आप कौन हैं?"
दूसरी तरफ से धीमी साँसों की आवाज़ आई।
फिर वही आवाज़ बोली—
"लेकिन मैं तुम्हें बचपन से जानता हूँ।"
आयत का दिल तेजी से धड़कने लगा।
"आप क्या चाहते हैं?"
"तुम्हें सच बताना चाहता हूँ।"
"किस बारे में?"
कुछ सेकंड की खामोशी।
फिर आवाज़ आई—
"तुम्हारी माँ के बारे में।"
आयत की आँखों में आँसू आ गए।
"मेरी माँ?"
"हाँ।"
"आप उन्हें जानते हैं?"
"बहुत अच्छी तरह।"
आयत ने घबराकर पूछा,
"वो कहाँ हैं?"
लेकिन कॉल कट गई।
"हैलो... हैलो!"
कोई जवाब नहीं आया।
आयत ने तुरंत दोबारा नंबर मिलाया।
नंबर बंद था।
अर्जुन की वापसी
करीब रात के एक बजे अर्जुन हॉस्पिटल वापस आया।
जैसे ही उसने कमरे में प्रवेश किया, उसकी नजर आयत पर पड़ी।
आयत जाग रही थी।
"आप कहाँ गए थे?"
अर्जुन कुछ पल उसे देखता रहा।
"बस... एक काम से गया था।"
आयत उसकी तरफ बढ़ी।
"मुझे अभी किसी का फोन आया था।"
अर्जुन का चेहरा तुरंत गंभीर हो गया।
"किसका?"
"मुझे नहीं पता। उसने कहा कि वो मेरी माँ को जानता है।"
अर्जुन की मुट्ठी कस गई।
"उसने और क्या कहा?"
"बस इतना कि वो मुझे सच बताना चाहता है।"
अर्जुन ने कुछ पल सोचा।
फिर पूछा,
"क्या उसने कोई नाम बताया?"
"नहीं।"
अर्जुन ने राहत की साँस ली।
वह आयत को डराना नहीं चाहता था।
लेकिन उसके दिमाग में एक बात साफ थी—
जो आदमी उसे पुराने हॉस्पिटल में मिला था, शायद वही अब आयत तक पहुँचने की कोशिश कर रहा था।
आयत ने अचानक पूछा,
"आप कहाँ गए थे?"
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखा।
कुछ सेकंड तक चुप रहने के बाद उसने कहा,
"सेंट मेरीज़ हॉस्पिटल।"
आयत का चेहरा बदल गया।
"वही पुराना हॉस्पिटल?"
"हाँ।"
"वहाँ क्यों?"
अर्जुन ने उसे सच बताने का फैसला किया।
"तुम्हारी पुरानी फाइल का सुराग वहाँ मिला था।"
आयत की आँखें नम हो गईं।
"आपको कुछ पता चला?"
अर्जुन ने धीरे से कहा,
"हाँ।"
"क्या?"
"तुम्हारी माँ..."
वह रुक गया।
आयत बेचैनी से बोली,
"क्या हुआ मेरी माँ को?"
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
"मुझे लगता है... तुम्हारी माँ ने तुम्हें छोड़ा नहीं था।"
आयत की आँखों से आँसू निकल पड़े।
"तो फिर?"
अर्जुन ने धीमे स्वर में कहा,
"शायद उन्हें तुमसे दूर किया गया था।"
आयत ने जैसे साँस लेना भूल गई।
"किसने?"
अर्जुन के पास जवाब नहीं था।
लेकिन उसके पास एक सुराग जरूर था।
उसके अपने दादा का।
वशिष्ठ हवेली में छुपी तस्वीर
अगली सुबह अर्जुन सीधे घर पहुँचा।
घर में उसके पिता और बड़े भाई बैठे थे।
अर्जुन ने बिना किसी भूमिका के पूछा,
"मुझे आप लोगों से एक सवाल पूछना है।"
सबने उसकी तरफ देखा।
"पंद्रह साल पहले नूरजहाँ खान के साथ क्या हुआ था?"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
उसके पिता का चेहरा अचानक गंभीर हो गया।
"तुम्हें ये नाम किसने बताया?"
"बस इतना बताइए कि आप उन्हें जानते थे या नहीं।"
कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर अर्जुन के बड़े भाई ने कहा,
"अर्जुन, इस मामले से दूर रहो।"
अर्जुन की आँखों में गुस्सा आ गया।
"क्यों?"
"क्योंकि ये तुम्हारे लिए ठीक नहीं है।"
"मुझे कोई खतरा नहीं चाहिए। मुझे सिर्फ सच चाहिए।"
तभी उसकी माँ कमरे में आईं।
उन्होंने अर्जुन को देखा और कहा,
"तुम्हें सच चाहिए?"
अर्जुन ने तुरंत उनकी तरफ देखा।
"हाँ।"
माँ कुछ देर चुप रहीं।
फिर बोलीं,
"मेरे साथ आओ।"
वह उसे हवेली के पुराने हिस्से में ले गईं।
एक कमरे का दरवाजा खोला।
अंदर पुराने सामान रखे थे।
माँ ने एक लकड़ी का बॉक्स निकाला।
बॉक्स खोलते ही अर्जुन की नजर एक पुरानी तस्वीर पर पड़ी।
उस तस्वीर में...
नूरजहाँ खान खड़ी थीं।
उनके साथ अर्जुन के दादा अविनाश वशिष्ठ थे।
और उनके बीच एक छोटी बच्ची थी।
आयत।
अर्जुन की आँखें भर आईं।
"ये तस्वीर यहाँ कैसे?"
माँ ने धीमे स्वर में कहा,
"तुम्हारे दादा ने इसे हमेशा संभालकर रखा था।"
"लेकिन क्यों?"
माँ ने तस्वीर हाथ में ली।
"क्योंकि नूरजहाँ ने अपनी बेटी की जान बचाने के लिए तुम्हारे दादा से मदद माँगी थी।"
अर्जुन ने पूछा,
"किससे बचाने के लिए?"
माँ की आँखें नम हो गईं।
"एक ऐसे आदमी से... जो उस बच्ची को सिर्फ इसलिए चाहता था क्योंकि उसे लगता था कि आयत के पास एक ऐसी चीज़ है जो उसके परिवार की किस्मत बदल सकती है।"
अर्जुन हैरान रह गया।
"कौन-सी चीज़?"
माँ ने जवाब देने से पहले लंबी साँस ली।
"मुझे नहीं पता।"
"आपको नहीं पता?"
"नूरजहाँ ने तुम्हारे दादा को पूरी बात नहीं बताई थी। उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि अगर बच्ची गलत लोगों के हाथ लग गई, तो उसकी जिंदगी बर्बाद हो जाएगी।"
अर्जुन तस्वीर को देखता रहा।
फिर अचानक उसने पूछा,
"नूरजहाँ अब कहाँ हैं?"
उसकी माँ ने नजरें झुका लीं।
"हमें नहीं पता।"
अर्जुन की आवाज़ भारी हो गई।
"मतलब?"
"पंद्रह साल पहले... नूरजहाँ गायब हो गई थीं।"
अर्जुन की धड़कन रुक गई।
"और आयत को मुंबई भेज दिया गया।"
माँ ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
लेकिन कहानी में एक और मोड़
अर्जुन तस्वीर लेकर अपने कमरे में वापस आया।
उसने तस्वीर को ध्यान से देखा।
तभी उसकी नजर तस्वीर के पीछे पड़ी।
कुछ लिखा हुआ था।
उसने तस्वीर पलटी।
पीछे सिर्फ एक लाइन थी—
"अगर कभी मेरी बेटी को सच पता चले, तो उसे बताना कि उसकी माँ ने उसे छोड़ा नहीं था।"
नीचे एक तारीख लिखी थी।
और उसके ठीक नीचे...
एक पता।
"मुंबई — रहमान हाउस, बांद्रा।"
अर्जुन के चेहरे पर हैरानी छा गई।
"रहमान हाउस..."
तो क्या रहमान खान ही आयत के अतीत की सबसे बड़ी कड़ी था?
लेकिन अगर ऐसा था...
तो वह कौन था जो इतने सालों से आयत की पहचान छिपा रहा था?
अर्जुन ने तुरंत अपना फोन उठाया।
उसे आयत को यह बताना था।
लेकिन जैसे ही उसने फोन खोला, उसके चेहरे के भाव बदल गए।
आयत के नंबर से एक मैसेज आया था—
"अर्जुन, मुझे आपसे बहुत जरूरी बात करनी है। अभी हॉस्पिटल की छत पर आइए। अकेले।"
अर्जुन तुरंत उठ खड़ा हुआ।
उसे नहीं पता था कि आयत को उसी वक्त एक और मैसेज मिला था।
"अगर तुम अपनी माँ को जिंदा देखना चाहती हो, तो आज रात अकेले पुराने सेंट मेरीज़ हॉस्पिटल आना। अर्जुन को मत बताना।"
आयत की आँखें उस मैसेज पर जम गईं।
उसने काँपते हाथों से फोन बंद किया।
और पहली बार...
उसने अर्जुन से एक बात छिपाने का फैसला किया।
क्रमशः...