एपिसोड 37— वो वादा जो पंद्रह साल से छुपा था
रात काफी हो चुकी थी।
वशिष्ठ हवेली के लगभग सारे कमरे अंधेरे में डूबे हुए थे, लेकिन अर्जुन के कमरे की लाइट अभी भी जल रही थी।
उसके सामने उसके दादा अविनाश वशिष्ठ की पुरानी डायरी खुली पड़ी थी।
बार-बार उसकी नजर उसी अधूरी लाइन पर जा रही थी—
"अगर कभी रहमान वापस आया, तो बच्ची को उसके हवाले मत करना। क्योंकि रहमान जिस चीज़ की तलाश में है, वह सिर्फ बच्ची नहीं है..."
इसके आगे का पन्ना फटा हुआ था।
अर्जुन ने डायरी को पलटकर देखा।
"आखिर बाकी हिस्सा कहाँ गया?"
तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।
अर्जुन ने तुरंत डायरी बंद कर दी।
"कौन?"
"मैं हूँ।"
आवाज उसकी माँ की थी।
अर्जुन ने डायरी दराज में रख दी।
"आइए।"
उसकी माँ कमरे में आईं और अर्जुन को देखकर बोलीं,
"इतनी रात तक जाग क्यों रहे हो?"
"बस कुछ काम था।"
माँ ने उसकी तरफ ध्यान से देखा।
"तुम्हारे चेहरे से लग रहा है कि बात कुछ और है।"
अर्जुन कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने अचानक पूछा,
"माँ... क्या आप रहमान खान को जानती हैं?"
उसकी माँ के कदम वहीं रुक गए।
चेहरे पर एक पल के लिए ऐसा भाव आया, जैसे किसी ने अचानक कोई पुराना जख्म छेड़ दिया हो।
"तुमने ये नाम कहाँ सुना?"
अर्जुन ने गौर से उनकी तरफ देखा।
"तो आप जानती हैं उन्हें?"
माँ ने नजरें झुका लीं।
"अर्जुन, कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें जानना तुम्हारे लिए जरूरी नहीं है।"
अर्जुन हल्का-सा हँसा।
"यही बात पिछले कुछ दिनों से हर कोई मुझे कह रहा है।"
माँ चुप रहीं।
अर्जुन ने आगे कहा,
"पहले आयत की पुरानी मेडिकल फाइल मिली। उसमें हमारे परिवार का नाम था। फिर दादा की डायरी में आयत का नाम मिला। अब रहमान खान का नाम सामने आ रहा है।"
माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।
"तुमने... पापा की डायरी पढ़ी?"
"हाँ।"
"अर्जुन, वो डायरी तुम्हें नहीं पढ़नी चाहिए थी।"
"क्यों?"
माँ के पास कोई जवाब नहीं था।
अर्जुन उनके पास गया।
"माँ, सच क्या है?"
कुछ पल की खामोशी के बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा,
"तुम्हारे दादा ने जो किया... वो गलत नहीं था।"
अर्जुन की भौंहें सिकुड़ गईं।
"क्या मतलब?"
"उन्होंने एक बच्ची की जान बचाई थी।"
अर्जुन की धड़कन तेज हो गई।
"आयत की?"
माँ ने उसकी तरफ देखा।
लेकिन जवाब देने के बजाय कमरे से बाहर चली गईं।
अर्जुन वहीं खड़ा रह गया।
अब उसे यकीन हो चुका था—
उसकी माँ सच जानती थीं।
अगली सुबह अस्पताल
अगली सुबह सिटी हॉस्पिटल में ट्रेनिंग हमेशा की तरह शुरू हुई।
आयत वार्ड में मरीजों की फाइलें देख रही थी।
रीवा उसके पास आई।
"क्या हुआ? तुम आज बहुत चुप हो।"
आयत ने हल्की मुस्कान दी।
"कुछ नहीं।"
रीवा ने तुरंत कहा,
"मुझे बेवकूफ मत समझो। जरूर कुछ हुआ है।"
आयत ने धीरे से कहा,
"कल मुझे एक पुराना लॉकेट मिला।"
"कैसा लॉकेट?"
आयत ने उसे दिखाया।
रीवा ने देखते ही कहा,
"ये तो काफी पुराना लगता है।"
"मुझे लगता है ये मेरी माँ का था।"
रीवा चौंक गई।
"तुम्हें कैसे पता?"
"कल इसे हाथ में लेते ही मुझे बचपन का एक दृश्य याद आया। मेरी माँ के गले में ऐसा ही लॉकेट था।"
रीवा ने धीरे से पूछा,
"तुम्हारी माँ के बारे में तुम्हें कितनी बातें याद हैं?"
आयत की मुस्कान गायब हो गई।
"बहुत कम।"
"क्यों?"
"क्योंकि जब मैं छोटी थी, तब..."
आयत रुक गई।
"तब क्या?"
"मुझे अपनी माँ की ज्यादा याद नहीं है।"
रीवा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"जो भी हो, तुम अकेली नहीं हो।"
आयत मुस्कुराई।
लेकिन उसके मन में एक ही सवाल था—
मेरी माँ मुझसे क्यों दूर हुई थीं?
अर्जुन और आयत की मुलाकात
दोपहर में अर्जुन वार्ड में आया।
आयत ने उसे देखते ही समझ लिया कि कुछ बात है।
"आप मुझसे कुछ कहना चाहते हैं?"
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
"हाँ।"
"क्या?"
अर्जुन कुछ पल चुप रहा।
फिर बोला,
"तुम्हारे बारे में जो फाइल मिली थी... उसमें हमारे परिवार का नाम सिर्फ संयोग नहीं है।"
आयत के चेहरे पर हैरानी आ गई।
"क्या मतलब?"
"मेरे दादा तुम्हें जानते थे।"
आयत जैसे कुछ समझ ही नहीं पाई।
"आपके दादा... मुझे?"
"हाँ।"
"लेकिन क्यों?"
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
"यही पता करना है।"
आयत की आवाज़ काँप गई।
"क्या मेरे पापा जानते हैं?"
"शायद।"
"और आपकी माँ?"
अर्जुन कुछ पल चुप रहा।
आयत तुरंत समझ गई।
"आपने उनसे पूछा?"
"हाँ।"
"उन्होंने क्या कहा?"
"कुछ नहीं।"
आयत ने गहरी साँस ली।
"तो दोनों परिवार कुछ छिपा रहे हैं।"
अर्जुन ने धीरे से कहा,
"शायद।"
आयत की आँखें भर आईं।
"मुझे हमेशा लगता था कि मेरी जिंदगी बहुत साधारण है।"
अर्जुन ने कहा,
"तुम्हारी जिंदगी जैसी भी रही हो, अब तुम्हें अकेले उसका सामना नहीं करना पड़ेगा।"
आयत ने उसकी तरफ देखा।
"आप सच में मेरे साथ रहेंगे?"
अर्जुन ने बिना किसी झिझक के कहा,
"हाँ।"
आयत के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई।
लेकिन दोनों को नहीं पता था कि कुछ दूरी पर खड़ा कोई तीसरा व्यक्ति उनकी सारी बातें सुन रहा था।
रोहन।
रोहन की नई चाल
रोहन ने सब सुन लिया था।
उसके चेहरे पर हैरानी थी।
"तो अर्जुन को भी पूरा सच नहीं पता..."
उसने तुरंत अपना फोन निकाला।
एक नंबर डायल किया।
"मुझे आपसे मिलना है।"
दूसरी तरफ से आवाज आई,
"कहाँ?"
"पुराने शहर वाले कैफे में।"
"क्यों?"
रोहन ने कहा,
"मुझे आयत के बारे में सच चाहिए। पूरा सच।"
पुराने कैफे में मुलाकात
कुछ देर बाद रोहन एक पुराने कैफे में पहुँचा।
वहाँ पहले से एक आदमी बैठा था।
उसका चेहरा आधा छाया में था।
रोहन सामने बैठ गया।
"अब बताइए।"
आदमी ने कहा,
"तुम जितना जानते हो, उससे कहीं ज्यादा बड़ा मामला है।"
"मुझे सिर्फ आयत के बारे में जानना है।"
आदमी ने टेबल पर एक पुरानी तस्वीर रखी।
रोहन ने तस्वीर उठाई।
उसमें एक जवान महिला थी।
उसकी गोद में एक छोटी बच्ची थी।
रोहन की नजर बच्ची पर गई।
उसके हाथ काँपने लगे।
"ये... आयत है?"
"हाँ।"
"और ये महिला?"
आदमी ने कहा,
"नूरजहाँ।"
रोहन चुप हो गया।
फिर उसने पूछा,
"रहमान खान कहाँ है?"
आदमी ने उसकी तरफ देखा।
"यही तो समस्या है।"
"क्या?"
"रहमान को पंद्रह साल पहले मृत घोषित कर दिया गया था।"
रोहन की आँखें फैल गईं।
"लेकिन पुलिस उसे ढूँढ रही है!"
आदमी ने धीमे स्वर में कहा,
"पुलिस जिस रहमान को ढूँढ रही है... वो शायद रहमान है ही नहीं।"
रोहन कुछ समझ नहीं पाया।
"तो फिर कौन है?"
आदमी ने जवाब दिया—
"वो आदमी जो रहमान के नाम का इस्तेमाल कर रहा है।"
उधर हॉस्पिटल में
अर्जुन को अचानक अपने फोन पर एक अनजान नंबर से मैसेज आया।
"अगर आयत को सच बताना है, तो आज रात 11 बजे पुराने सेंट मेरीज़ हॉस्पिटल में अकेले आना। किसी को साथ लाए तो सच हमेशा के लिए दफन हो जाएगा।"
अर्जुन ने मैसेज पढ़ा।
उसकी नजर स्क्रीन पर जम गई।
सेंट मेरीज़ हॉस्पिटल...
वही जगह जिसका नाम पंद्रह साल पुरानी फाइल में था।
उसने फोन जेब में रख लिया।
लेकिन तभी आयत सामने आ गई।
"किसका मैसेज था?"
अर्जुन ने कहा,
"कुछ नहीं।"
आयत ने उसे ध्यान से देखा।
"फिर वही झूठ?"
अर्जुन हल्का-सा मुस्कुराया।
"इस बार सच में कुछ नहीं।"
आयत चली गई।
अर्जुन उसे जाते हुए देखता रहा।
उसके मन में सवाल था—
क्या उसे वहाँ अकेले जाना चाहिए?
उसे पता था कि यह जाल भी हो सकता है।
लेकिन अगर सच में आयत के अतीत का कोई सुराग वहाँ था...
तो वह पीछे नहीं हट सकता था।
उसी रात...
रात के ग्यारह बजने में कुछ मिनट बाकी थे।
पुराना सेंट मेरीज़ हॉस्पिटल वर्षों से बंद पड़ा था।
अर्जुन अपनी कार से वहाँ पहुँचा।
उसने चारों तरफ देखा।
पूरा इलाका सुनसान था।
वह अंदर जाने लगा।
तभी उसके फोन पर एक और मैसेज आया—
"दूसरी मंजिल। कमरा नंबर 17।"
अर्जुन धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ने लगा।
कमरा नंबर 17 के सामने पहुँचकर उसने दरवाजा खोला।
अंदर अंधेरा था।
उसने लाइट जलाई।
कमरे के बीचोंबीच एक पुरानी कुर्सी रखी थी।
कुर्सी पर एक फाइल पड़ी थी।
अर्जुन ने फाइल उठाई।
पहले पन्ने पर लिखा था—
"आयत खान — असली जन्म रिकॉर्ड।"
उसने पन्ना पलटा।
और अगली लाइन पढ़ते ही उसके चेहरे से जैसे सारी रंगत गायब हो गई।
"जन्म देने वाली माँ — नूरजहाँ खान।"
उसके नीचे दूसरी लाइन थी—
"कानूनी संरक्षक — अविनाश वशिष्ठ।"
अर्जुन की साँस रुक गई।
लेकिन असली झटका अभी बाकी था।
तीसरी लाइन पढ़कर उसके हाथ काँपने लगे—
"बच्ची को बचाने के लिए उसकी असली पहचान बदलना आवश्यक था।"
अर्जुन ने धीरे से फाइल बंद कर दी।
उसी समय कमरे के पीछे से किसी की आवाज आई—
"अब तुम्हें समझ आया कि तुम्हारे दादा ने आयत को तुमसे क्यों छिपाया था?"
अर्जुन तुरंत पलटा।
दरवाजे पर एक परछाईं खड़ी थी।
और फिर उस आदमी ने कमरे की रोशनी में कदम रखा।
अर्जुन की आँखें फैल गईं।
क्योंकि वह चेहरा...
उसने पहले भी देखा था।
वही आदमी जिसे उसने रिकॉर्ड रूम से भागते हुए देखा था।
वह हल्का-सा मुस्कुराया।
"मेरा नाम रहमान नहीं है।"
अर्जुन ने गुस्से से पूछा,
"तो फिर तुम कौन हो?"
उस आदमी ने जवाब दिया—
"मैं वो इंसान हूँ, जिसने पंद्रह साल पहले आयत को उसकी असली जिंदगी से दूर किया था।"
अर्जुन एक कदम आगे बढ़ा।
"और मेरी फैमिली का इसमें क्या हाथ था?"
उस आदमी की मुस्कान गायब हो गई।
"तुम्हारे परिवार ने उसे बचाया था, अर्जुन..."
वह एक पल रुका।
फिर बोला—
"लेकिन तुम्हारे परिवार ने ही उसकी माँ को उससे हमेशा के लिए अलग भी किया था।"
अर्जुन के चेहरे पर अविश्वास छा गया।
और उसी पल बाहर किसी के कदमों की आवाज़ सुनाई दी।
कोई और भी उस पुराने हॉस्पिटल में आ चुका था।
क्रमशः...