नामुमकिन इश्क - एपिसोड 28 kajal jha द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

नामुमकिन इश्क - एपिसोड 28

एपिसोड 28 – दिल की बेचैनी

अगली सुबह सिटी हॉस्पिटल में बाकी दिनों की तरह ही हलचल थी, लेकिन आज अर्जुन कुछ बदला-बदला सा लग रहा था।

वह इमरजेंसी यूनिट में खड़ा मरीज की फाइल देख रहा था, मगर बार-बार उसकी नज़र दरवाज़े की तरफ़ चली जाती।

गौरव ने आखिरकार पूछ ही लिया,

"क्या हुआ भाई? सुबह से दरवाज़े को ऐसे देख रहा है जैसे कोई VIP आने वाला हो।"

अर्जुन ने फाइल बंद करते हुए कहा,

"कुछ नहीं।"

गौरव हँस पड़ा।

"कुछ नहीं? कल से कम से कम दस बार पूछ चुका हूँ कि आयत आई या नहीं।"

अर्जुन ने उसे घूरकर देखा।

"अपना काम कर।"

"अच्छा! समझ गया।"

गौरव मुस्कुराते हुए वहाँ से चला गया।

अर्जुन ने मन ही मन सोचा,

"मैं सच में इतना क्यों सोचने लगा हूँ उसके बारे में?"

उसे खुद अपने सवाल का जवाब नहीं मिल रहा था।

कुछ देर बाद हॉस्पिटल के कॉरिडोर में आयत दिखाई दी।

सफेद कोट, खुले बाल और हाथ में फाइल लिए वह तेज़ी से इमरजेंसी की तरफ़ आ रही थी।

अर्जुन की नज़र जैसे ही उस पर पड़ी, उसके चेहरे पर अनजाने में मुस्कान आ गई।

आयत ने भी उसे देख लिया।

"गुड मॉर्निंग।"

"गुड मॉर्निंग।"

दोनों कुछ पल एक-दूसरे को देखते रहे।

फिर आयत ने पूछा,

"आज आप इतने चुप क्यों हैं?"

अर्जुन ने तुरंत कहा,

"मैं तो रोज़ चुप रहता हूँ।"

आयत हँस दी।

"नहीं... आज कुछ ज्यादा।"

अर्जुन ने उसकी तरफ़ देखते हुए कहा,

"शायद नींद पूरी नहीं हुई।"

आयत ने मज़ाक में कहा,

"तो डॉक्टर साहब को आराम करना चाहिए।"

"और अगर आराम करने का मन न हो?"

आयत ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा,

"तो?"

अर्जुन कुछ बोल पाता, उससे पहले डॉ. कबीर की आवाज़ आई,

"अर्जुन! आयत! इधर आओ।"

दोनों तुरंत अपने काम में लग गए।

अचानक आई परेशानी

दोपहर के करीब एक बुज़ुर्ग मरीज को इमरजेंसी में लाया गया।

उनकी हालत गंभीर थी।

डॉ. कबीर ने अर्जुन की तरफ़ देखा।

"तुम दोनों इस केस को संभालो।"

अर्जुन ने तुरंत काम शुरू किया।

आयत रिपोर्ट देख रही थी।

"अर्जुन... मरीज को पहले से शुगर की समस्या है।"

"हूँ।"

"लेकिन ये दवा शायद इनके लिए सही नहीं होगी।"

अर्जुन ने रिपोर्ट देखी और कहा,

"तुम सही कह रही हो। डॉक्टर कबीर को बताओ।"

आयत तुरंत गई।

कुछ देर बाद डॉक्टर ने कहा,

"गुड कैच, आयत।"

अर्जुन ने मुस्कुराकर उसकी तरफ़ देखा।

"देखा? अब तुम खुद फैसले लेने लगी हो।"

आयत ने कहा,

"क्योंकि आपने सिखाया है।"

एक पल के लिए दोनों के बीच फिर वही खामोशी छा गई।

ऐसी खामोशी जिसमें शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।

दूसरी तरफ़...

हॉस्पिटल के कैफेटेरिया में रोहन अपने मोबाइल पर किसी से बात कर रहा था।

"काम हो गया?"

दूसरी तरफ़ से जवाब आया,

"हाँ। लेकिन एक बात है... ये आसान नहीं होगा।"

रोहन ने ठंडी आवाज़ में कहा,

"पैसे की चिंता मत करो। बस इतना ध्यान रखना कि किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि इसके पीछे मैं हूँ।"

"समझ गया।"

फोन कट गया।

समर वहीं खड़ा था।

उसने पूछा,

"किससे बात कर रहा था?"

रोहन ने तुरंत मोबाइल जेब में रख लिया।

"किसी से नहीं।"

समर ने उसकी तरफ़ कुछ पल देखा।

"रोहन, तू कुछ ऐसा मत कर बैठना जिससे हम सब फँस जाएँ।"

रोहन मुस्कुराया।

"तुम मुझे इतना भी बुरा मत समझो।"

लेकिन समर उसके चेहरे की मुस्कान में छिपी बेचैनी समझ चुका था।

करण और सनाया

पीडियाट्रिक वार्ड में करण एक बच्चे की फाइल पढ़ रहा था।

सनाया पास आई।

"तुम्हें एक बात बताऊँ?"

करण ने बिना ऊपर देखे कहा,

"अगर फिर से मेरी तारीफ़ करनी है तो बाद में करना।"

सनाया ने आँखें घुमाईं।

"तुम्हें किसने बताया कि मैं तुम्हारी तारीफ़ करने वाली हूँ?"

करण मुस्कुराया।

"तुम्हारे चेहरे ने।"

सनाया हँस पड़ी।

"तुम बहुत ज़्यादा कॉन्फिडेंट हो।"

"और तुम बहुत ज़्यादा घमंडी।"

"मैं घमंडी?"

"हाँ।"

सनाया ने फाइल उसके हाथ से लेकर कहा,

"तो फिर आज से मेरी फाइल तुम नहीं देखोगे।"

करण ने तुरंत कहा,

"अरे... मज़ाक कर रहा था।"

सनाया मुस्कुराई।

"अब समझ आया?"

दोनों एक-दूसरे को देखकर हँस पड़े।

लेकिन उन्हें खुद नहीं पता था कि उनकी छोटी-छोटी नोकझोंक अब धीरे-धीरे एक खूबसूरत रिश्ते की शुरुआत बन रही थी।

शाम का वक्त

ड्यूटी खत्म होने के बाद आयत हॉस्पिटल की छत पर चली गई।

नीचे शहर की रोशनी चमक रही थी।

वह रेलिंग के पास खड़ी होकर अपने घर फोन कर रही थी।

"अब्बू, मैं ठीक हूँ। हॉस्पिटल की ट्रेनिंग थोड़ी मुश्किल है, लेकिन अच्छी लग रही है।"

फोन रखने के बाद उसने लंबी साँस ली।

तभी पीछे से आवाज़ आई।

"घर की याद आ रही है?"

आयत ने पलटकर देखा।

अर्जुन।

"थोड़ी।"

अर्जुन उसके पास आकर खड़ा हो गया।

"लखनऊ में रहना कैसा लग रहा है?"

आयत ने मुस्कुराकर कहा,

"पहले लगा था बहुत मुश्किल होगा। लेकिन अब..."

वह रुक गई।

अर्जुन ने पूछा,

"अब?"

आयत ने उसकी तरफ़ देखा।

"अब इतना मुश्किल नहीं लगता।"

अर्जुन ने हल्की मुस्कान के साथ पूछा,

"क्यों?"

आयत कुछ बोल नहीं पाई।

उसकी नज़रें झुक गईं।

अर्जुन भी कुछ कहने ही वाला था कि नीचे से रीवा की आवाज़ आई,

"आयत! तुम यहाँ हो?"

आयत ने जल्दी से कहा,

"मुझे जाना चाहिए।"

वह जाने लगी।

फिर अचानक रुककर पीछे मुड़ी।

"गुड नाइट, अर्जुन।"

"गुड नाइट।"

आयत चली गई।

अर्जुन उसे जाते हुए देखता रहा।

उसके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान थी।

लेकिन उसी समय उसका मोबाइल बजा।

स्क्रीन पर एक अनजान नंबर था।

अर्जुन ने फोन उठाया।

"हैलो?"

दूसरी तरफ़ कुछ सेकंड खामोशी रही।

फिर एक आवाज़ आई—

"अर्जुन वशिष्ठ... अगर अपनी ज़िंदगी में शांति चाहते हो, तो आयत खान से दूर रहो।"

अर्जुन का चेहरा तुरंत गंभीर हो गया।

"कौन बोल रहा है?"

लेकिन कॉल कट चुकी थी।

अर्जुन कुछ पल तक मोबाइल को देखता रहा।

उसके मन में पहला ख्याल आयत का ही आया।

"किसी ने मुझे आयत से दूर रहने की धमकी क्यों दी?"

दूर कॉरिडोर के दूसरे छोर पर रोहन खड़ा था।

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।

लेकिन अर्जुन को अभी यह नहीं पता था कि...

उसके और आयत के बीच बढ़ती नज़दीकियों को रोकने के लिए किसी ने पहला कदम उठा दिया था।

और आने वाले दिनों में यह धमकी सिर्फ़ एक फोन कॉल बनकर नहीं रहने वाली थी।

क्रमशः...