नामुमकिन इश्क - एपिसोड 27 kajal jha द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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नामुमकिन इश्क - एपिसोड 27

एपिसोड 27– रहस्यमयी मेहमान


सिटी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल के मुख्य गेट पर रुकी काली लग्ज़री कार ने हर किसी का ध्यान अपनी तरफ़ खींच लिया।


जैसे ही कार का दरवाज़ा खुला, लगभग पचपन-साठ साल के एक प्रभावशाली व्यक्ति बाहर उतरे। सफेद कुर्ता-पायजामा, कंधे पर हल्का-सा शॉल और चेहरे पर ऐसा रौब कि सामने वाला अनायास ही सम्मान से खड़ा हो जाए।


उन्हें देखते ही हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ. राजीव मल्होत्रा और बाकी सीनियर डॉक्टर आगे बढ़ गए।


"नमस्ते, न्यायमूर्ति वशिष्ठ जी।"


आयत ने दूर से यह नाम सुना तो उसकी नज़र भी उसी तरफ़ चली गई।


"वशिष्ठ...?"


उसने धीरे से खुद से कहा।


उधर अर्जुन तुरंत आगे बढ़ा।


वह उस व्यक्ति के सामने पहुँचा और झुककर उनके पैर छू लिए।


"प्रणाम, बड़े पापा।"


आयत यह देखकर चौंक गई।


"अर्जुन... इन्हें बड़े पापा कह रहा है?"


रीवा ने धीरे से कहा,


"तुम्हें नहीं पता? ये हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज हैं। पूरे उत्तर प्रदेश में इनका बहुत सम्मान है। और ये अर्जुन के ताऊजी हैं।"


आयत ने पहली बार महसूस किया कि अर्जुन का परिवार सिर्फ़ प्रभावशाली ही नहीं, बल्कि समाज में बेहद प्रतिष्ठित भी है।


न्यायमूर्ति वशिष्ठ ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखा।


"कैसे हो बेटा?"


"जी, बिल्कुल ठीक हूँ।"


"सुना है... प्रतियोगिता जीत गए।"


अर्जुन हल्का-सा मुस्कुराया।


"जी, टीम की वजह से।"


उन्होंने गर्व से कहा,


"इसीलिए तो तुम पर गर्व होता है।"


इतने में उनकी नज़र अर्जुन के पीछे खड़ी टीम पर गई।


"ये सब तुम्हारे साथी हैं?"


"जी बड़े पापा।"


अर्जुन एक-एक करके सबसे परिचय कराने लगा।


"ये गौरव..."


"ये आरिफ..."


"ये रीवा..."


फिर उसकी नज़र आयत पर गई।


"और ये... आयत खान।"


आयत ने अदब से कहा,


"अस्सलामुअलेकुम... नमस्ते, सर।"


उन्होंने मुस्कुराकर जवाब दिया,


"खुश रहो, बेटी। अर्जुन तुम्हारी बहुत तारीफ़ कर रहा था।"


अर्जुन एक पल के लिए चौंक गया।


"बड़े पापा..."


सबके चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आ गई।


आयत ने भी पहली बार अर्जुन को थोड़ा झेंपते हुए देखा।


उधर दूसरी तरफ़...


रोहन दूर खड़ा यह सब देख रहा था।


उसने धीमे से कहा,


"जहाँ जाता है... वहीं हीरो बन जाता है।"


समर ने उसके कंधे पर हाथ रखा।


"तू जितना अर्जुन से जलता रहेगा, उतना ही पीछे रह जाएगा।"


रोहन ने कोई जवाब नहीं दिया।


लेकिन उसकी आँखें अब भी अर्जुन पर टिकी थीं।


कुछ देर बाद...


न्यायमूर्ति वशिष्ठ हॉस्पिटल का निरीक्षण करने लगे।


उसी दौरान इमरजेंसी वार्ड से अचानक तेज़ आवाज़ आई।


"डॉक्टर... जल्दी आइए!"


एक सड़क दुर्घटना में घायल युवक को स्ट्रेचर पर लाया गया था।


डॉ. कबीर ने तुरंत आवाज़ लगाई,


"अर्जुन... आयत... जल्दी इधर आओ।"


दोनों बिना समय गँवाए दौड़ पड़े।


घायल युवक की हालत गंभीर थी।


डॉ. कबीर ने तेज़ आवाज़ में कहा,


"ब्लड प्रेशर गिर रहा है। जल्दी काम करो।"


अर्जुन ने तुरंत मरीज की जाँच शुरू कर दी।


आयत ने दवाइयाँ और उपकरण तैयार किए।


दोनों बिना बोले एक-दूसरे के इशारे समझ रहे थे।


डॉ. मीरा दूर खड़ी यह सब देख रही थीं।


उन्होंने मुस्कुराकर कहा,


"इन दोनों की समझ बहुत अच्छी होती जा रही है।"


करीब बीस मिनट की मेहनत के बाद मरीज की हालत स्थिर हो गई।


डॉ. कबीर ने राहत की साँस ली।


"वेल डन।"


न्यायमूर्ति वशिष्ठ यह पूरा दृश्य देख रहे थे।


उन्होंने अर्जुन की तरफ़ देखा।


फिर आयत की तरफ़।


उनकी अनुभवी आँखों ने दोनों के बीच की सहज समझ को महसूस कर लिया।


लेकिन उन्होंने कुछ कहा नहीं।


शाम को...


ड्यूटी खत्म होने के बाद सभी हॉस्पिटल के गार्डन में बैठे थे।


हवा हल्की ठंडी थी।


आयत चुपचाप आसमान की तरफ़ देख रही थी।


अर्जुन उसके पास आया।


"आज तुमने बहुत अच्छा काम किया।"


आयत मुस्कुराई।


"आपके साथ काम करते हुए डर कम लगता है।"


अर्जुन हल्का-सा हँसा।


"और मुझे लगता है कि अब तुम बिना डरे भी सब कर सकती हो।"


दोनों की बातों के बीच अचानक रीवा आ गई।


"बस-बस... डॉक्टर साहब, अब आयत को थोड़ा आराम भी करने दीजिए।"


तीनों हँस पड़े।


लेकिन दूर खड़ा एक शख्स यह सब देख रहा था।


वह था...


रोहन।


उसने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और किसी को कॉल लगाया।


"हैलो... मुझे तुम्हारी मदद चाहिए।"


दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई,


"काम क्या है?"


रोहन की आँखों में एक खतरनाक चमक उभर आई।


"अब खेल सिर्फ़ कॉलेज या हॉस्पिटल का नहीं रहेगा... मुझे अर्जुन वशिष्ठ को उसकी सबसे बड़ी ताकत से दूर करना है

।"


फोन कट गया।


रोहन के चेहरे पर एक रहस्यमयी मुस्कान थी।


उसे नहीं पता था...


कि उसकी नई चाल सिर्फ़ अर्जुन को नहीं, बल्कि आयत की ज़िंदगी को भी एक बड़े तूफ़ान में धकेलने वाली है।


क्रमशः...