Mr. & Ms. Fake
Episode 17 – A Heart Doesn't Lie
रात के लगभग दस बजे...
सिंह हाउस की छत पर आर्यवीर अकेला खड़ा था।
हाथ में कॉफी का मग...
लेकिन कॉफी कब की ठंडी हो चुकी थी।
उसके दिमाग में बार-बार सिर्फ़ एक ही बात घूम रही थी—
"हमारा रिश्ता तो सिर्फ़ कॉन्ट्रैक्ट था..."
सान्वी के कहे हुए शब्द उसके कानों में गूंज रहे थे।
पहली बार उसे महसूस हुआ...
उसे अनन्या के आने से कोई परेशानी नहीं थी...
उसे परेशानी इस बात से थी कि सान्वी खुद उसे किसी और का होने के लिए कह रही थी।
उधर...
सान्वी अपने कमरे की बालकनी में बैठी थी।
उसके हाथ में वही छोटी-सी चाबी का गुच्छा था, जो कुछ दिन पहले आर्यवीर ने मज़ाक में उसे दिया था।
वह उसे घुमाते हुए खुद से बोली—
"तू पागल है सान्वी..."
"जिस रिश्ते की कोई मंज़िल ही नहीं...
उसके लिए रो रही है?"
तभी रिया उसके कमरे में आई।
"अरे! अभी तक सोई नहीं?"
सान्वी ने जल्दी से अपने आँसू पोंछ लिए।
"बस... नींद नहीं आ रही।"
रिया ने अनजान बनते हुए कहा,
"वैसे... अनन्या बहुत अच्छी लड़की है।"
"आर्यवीर के साथ उसकी जोड़ी भी अच्छी लगेगी।"
सान्वी ने मुस्कुराने की कोशिश की।
"हाँ..."
लेकिन उसकी आवाज़ में छिपा दर्द रिया साफ़ महसूस कर चुकी थी।
रिया कमरे से बाहर निकली और मन ही मन बोली—
"पहला कदम सफल हुआ..."
अगली सुबह...
दादी ने पूरे परिवार को बुलाया।
"सुनो सब लोग..."
"रविवार को मेहता परिवार फिर आ रहा है।"
"इस बार सगाई की तारीख़ की बात होगी।"
आर्यवीर चौंक गया।
"दादी! मैंने अभी तक हाँ नहीं कहा।"
दादी मुस्कुराईं।
"ना भी तो नहीं कहा।"
"पहले मिल लो... बाकी फैसला बाद में करना।"
आर्यवीर कुछ बोल नहीं पाया।
ऑफिस...
कबीर ने देखा कि आर्यवीर लगातार मोबाइल स्क्रीन देख रहा है।
"कॉल कर दे उसे।"
"किसे?"
"सान्वी को।"
"क्या बोलूँगा?"
कबीर हँस पड़ा।
"यही कि... याद आ रही है।"
आर्यवीर ने उसे घूरा।
"फालतू बातें मत कर।"
लेकिन पाँच मिनट बाद...
उसने सचमुच सान्वी का नंबर डायल कर दिया।
फोन नहीं उठा।
दूसरी बार...
फिर भी नहीं।
तीसरी बार...
फिर भी नहीं।
उसके चेहरे पर बेचैनी साफ़ दिखाई देने लगी।
उधर...
सान्वी थिएटर में थी।
उसने मोबाइल साइलेंट पर रखा हुआ था।
डायरेक्टर चिल्ला रहे थे—
"Emotion! Emotion!"
लेकिन आज सान्वी के चेहरे पर असली भाव थे।
हर डायलॉग में उसका दर्द साफ़ दिखाई दे रहा था।
सीन खत्म होते ही डायरेक्टर ने ताली बजाई।
"वाह!"
"आज पहली बार तुम्हारी एक्टिंग दिल से निकली।"
सान्वी हल्का-सा मुस्कुराई।
उसे नहीं पता था...
वह एक्टिंग नहीं कर रही थी।
शाम...
दादी ने अचानक सान्वी को फोन किया।
"बेटा, आज रात का खाना हमारे साथ खाओ।"
सान्वी ने बहाना बनाया।
"दादी... आज थोड़ा काम है।"
"कोई काम-वाम नहीं।"
"मैं इंतज़ार कर रही हूँ।"
दादी की ज़िद के आगे उसे हाँ कहना ही पड़ा।
रात...
सान्वी सिंह हाउस पहुँची।
लेकिन आज वह पहले जैसी चंचल नहीं थी।
वह चुपचाप बैठी रही।
दादी ने गौर किया।
"क्या हुआ बेटा?"
"कुछ नहीं..."
चिंटू बोला,
"भाभी... आज आप मुझे डाँट भी नहीं रही।"
सब हल्का-सा हँस दिए।
लेकिन आर्यवीर की नज़र सिर्फ़ सान्वी पर थी।
उसे महसूस हो रहा था...
वह मुस्कुरा रही है...
लेकिन खुश नहीं है।
खाना खत्म होने के बाद...
दादी ने कहा,
"आर्य... सान्वी को बाहर वाले बगीचे से गुलाब तोड़कर दे आ।"
"क्यों?"
दादी मुस्कुराईं।
"क्योंकि मैंने कहा है।"
दोनों बगीचे में आ गए।
कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
आख़िरकार...
आर्यवीर ने ही चुप्पी तोड़ी।
"तुम मुझसे नाराज़ हो?"
"नहीं।"
"झूठ।"
सान्वी उसकी तरफ देखे बिना बोली,
"मैं कौन होती हूँ नाराज़ होने वाली?"
"हमारे बीच सिर्फ़ एक कॉन्ट्रैक्ट था।"
ये सुनते ही...
आर्यवीर ने पहली बार थोड़ा सख़्त लहज़े में कहा—
"बस करो, सान्वी।"
वह चौंककर उसकी तरफ देखने लगी।
"हर बात में कॉन्ट्रैक्ट..."
"हर बात में दूरी..."
"क्या तुम्हें सच में कुछ भी महसूस नहीं होता?"
सान्वी की साँसें तेज़ हो गईं।
"मैं..."
लेकिन शब्द उसके होंठों तक आकर रुक गए।
उसी समय...
तेज़ हवा चली।
बगीचे की लाइटें कुछ सेकंड के लिए बुझ गईं।
अँधेरे में सान्वी का संतुलन बिगड़ा।
वह फिसलने लगी...
लेकिन आर्यवीर ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
इस बार...
उसने उसका हाथ छोड़ा नहीं।
दोनों एक-दूसरे के बहुत करीब खड़े थे।
बारिश की हल्की बूँदें गिरने लगीं।
आर्यवीर की धीमी आवाज़ गूँजी—
"अगर तुम्हें सच में कोई फर्क नहीं पड़ता..."
"...तो मेरी शादी की बात सुनकर तुम्हारी आँखों में आँसू क्यों थे?"
सान्वी की आँखें भर आईं।
वह अब और झूठ नहीं बोल पाई।
उसने धीरे से कहा—
"क्योंकि..."
"...मुझे डर लग रहा था।"
"किस बात का?"
"तुम्हें खोने का..."
दोनों की नज़रें एक-दूसरे में खो गईं।
ऐसा लगा जैसे पूरी दुनिया थम गई हो।
लेकिन तभी...
"वाह!"
एक ताली की आवाज़ गूँजी।
दोनों ने चौंककर पीछे देखा।
वहाँ...
अनन्या खड़ी थी।
उसने मुस्कुराते हुए कहा—
"लगता है... मैं गलत समय पर आ गई।"
आर्यवीर और सान्वी तुरंत एक-दूसरे से अलग हो गए।
अनन्या ने दोनों को ध्यान से देखा...
और उसकी मुस्कान में नाराज़गी नहीं...
बल्कि एक अनकहा सवाल था।
क्या उसने सब सुन लिया था?
या सिर्फ़ उतना देखा था, जितना गलतफ़हमी पैदा करने के लिए काफ़ी था?
क्रमशः...