यहाँ तक मेरी कहानी सुनकर शायद आपको भी यही लग रहा होगा कि अब तक तो मुझे हिम्मत हार देनी चाहिए थी। लेकिन ज़रा सोचिए... क्या जो मैं चाहता था, वह सचमुच इतना गलत था? अगर नहीं, तो फिर आखिर मेरी किस्मत बार-बार मेरा साथ क्यों छोड़ रही थी?
पहले मीरा... और फिर ठाकुर उदय प्रताप सिंह। ये दोनों मेरी ज़िंदगी में उम्मीद की किरण बनकर आए थे। लगा था कि अब शायद ज़िंदगी की दिशा बदल जाएगी। लेकिन जितनी तेज़ी से वे मेरी ज़िंदगी में आए, उससे भी ज़्यादा तेज़ी से डूबते सूरज की तरह ओझल हो गए और अपने पीछे छोड़ गए सिर्फ़ अँधेरा... गहरा और ख़ामोश अँधेरा।
एक बार फिर मैं उसी मोड़ पर खड़ा था, जहाँ से सफ़र शुरू हुआ था—खाली हाथ, टूटी उम्मीदों के साथ। फ़र्क बस इतना था कि इस बार मेरे पास कॉल सेंटर की नौकरी थी। वही नौकरी, जो मेरी ज़िंदगी को कोई नई मंज़िल तो नहीं दे रही थी, लेकिन इतना ज़रूर कर रही थी कि घर का चूल्हा बुझने नहीं दे रही थी। शायद उस वक़्त मेरे लिए यही सबसे बड़ा सुकून था।
अगले ही दिन से मैंने अपनी दिनचर्या फिर से सँभाल ली। सुबह काम पर जाना, देर रात थका-हारा लौटना, और फिर अगले दिन उसी संघर्ष को दोहराना—यही मेरी ज़िंदगी बन चुकी थी। सपने अब भी ज़िंदा थे, लेकिन मैंने उन्हें कुछ समय के लिए दिल के किसी कोने में चुपचाप रख दिया था। फ़िलहाल सबसे ज़रूरी था ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाना... क्योंकि भूख, सपनों से ज़्यादा शोर मचाती है।
करीब एक हफ़्ते बाद अचानक मेरे फ़ोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई कि कॉल ठाकुर उदय प्रताप सिंह की कंपनी से है। उन्होंने बताया कि ठाकुर साहब भारत लौट आए हैं और मुझसे मिलना चाहते हैं।
यह सुनते ही मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। जिस उम्मीद को मैं हमेशा के लिए दफ़ना चुका था, वह अचानक फिर से ज़िंदा हो उठी। शायद जिस दिन मैं उनके दफ़्तर गया था, उसी दिन एंट्री रजिस्टर में मैंने अपने नंबर और बाकी जानकारी लिखी थी। वहीं से मेरा नंबर लेकर मुझे फ़ोन किया गया था।
सच कहूँ तो उस दिन के बाद मैंने ठाकुर साहब का दिया हुआ विज़िटिंग कार्ड भी न जाने घर के किस कोने में फेंक दिया था। मुझे पूरा यक़ीन हो चुका था कि अब उनसे दोबारा कभी मुलाक़ात नहीं होगी। लेकिन आज... आज सब कुछ बदलता हुआ महसूस हो रहा था। दिल में खुशी भी थी और हैरानी भी।
मैंने तुरंत अपने टीम लीडर को संदेश भेज दिया कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए आज मैं काम पर नहीं आ पाऊँगा।
फिर मैंने बड़े ध्यान से तैयार होना शुरू किया। अलमारी में जो सबसे अच्छे कपड़े थे, वही पहने। आख़िर मैं एक बार फिर अपनी किस्मत आज़माने जा रहा था... और इस बार मुलाक़ात एक ऐसी शख़्सियत से थी, जिसके एक फ़ैसले से मेरी पूरी ज़िंदगी बदल सकती थी।
कुछ ही देर बाद मैं ठाकुर साहब के आलीशान दफ़्तर के सामने खड़ा था। वही इमारत, जिसे मैंने एक हफ़्ते पहले देखा था। लेकिन आज न जाने क्यों वह पहले से कहीं ज़्यादा चमकदार, ज़्यादा भव्य और ज़्यादा उम्मीदों से भरी हुई लग रही थी।
ठीक तीन बजे मैं ऑफिस के ग्राउंड हॉल में पहुँच गया। सामने वही रिसेप्शनिस्ट बैठी थी, जिससे मेरी पिछली मुलाक़ात हुई थी। आज उसने काले रंग का प्रोफेशनल बिज़नेस सूट पहन रखा था। चेहरे पर वही आत्मविश्वास भरी मुस्कान थी, जो किसी भी बड़े कॉर्पोरेट ऑफिस की पहचान होती है।
जैसे ही उसकी नज़र मुझ पर पड़ी, वह मुस्कुराकर बोली,
"Hello, Sir... How are you?"
एक पल के लिए मुझे ऐसा लगा जैसे मैं सातवें आसमान पर पहुँच गया हूँ। इतनी गर्मजोशी की मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी।
मैंने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
"Yes, I'm fine. How are you?"
वह हल्के से मुस्कुराई और बोली,
"I'm fine, sir. आप कृपया बैठिए... मैं अभी सर को आपके आने की सूचना देती हूँ।"
यह कहकर वह अंदर की ओर बढ़ गई, और मैं धड़कते दिल के साथ उसकी वापसी का इंतज़ार करने लगा। मुझे महसूस हो रहा था कि अगले कुछ मिनट शायद मेरी ज़िंदगी का सबसे अहम मोड़ साबित होने वाले थे।
मैं वहीं सोफ़े पर बैठ गया। सामने लगी विशाल काँच की दीवार से पूरे शहर का नज़ारा दिखाई दे रहा था। लोग अपनी-अपनी मंज़िलों की ओर भाग रहे थे, लेकिन उस वक़्त मेरी दुनिया सिर्फ़ उसी दरवाज़े तक सिमट गई थी, जिसके पीछे ठाकुर उदय प्रताप सिंह बैठे थे।
हर बीतता सेकंड मेरे दिल की धड़कन और तेज़ कर रहा था। मन में न जाने कितने सवाल उमड़ रहे थे। आख़िर उन्होंने मुझे क्यों बुलाया था? क्या उन्हें मेरी बात याद थी? या फिर यह सिर्फ़ एक औपचारिक मुलाक़ात थी?
करीब पाँच मिनट बाद वही रिसेप्शनिस्ट वापस आई।
"Sir is waiting for you."
उसके ये चार शब्द सुनते ही मेरी धड़कन जैसे एक पल के लिए थम गई। मैंने गहरी साँस ली, अपने कपड़ों को हल्का-सा ठीक किया और उसके पीछे-पीछे चल पड़ा।
हम एक लंबे कॉरिडोर से गुज़रे। दोनों तरफ़ शीशे के केबिन थे, जहाँ लोग पूरी तल्लीनता से अपने काम में लगे हुए थे। हर किसी के चेहरे पर आत्मविश्वास और अनुशासन साफ़ झलक रहा था। यह सिर्फ़ एक ऑफिस नहीं था, बल्कि सपनों को हक़ीक़त में बदलने की एक मशीन थी।
कॉरिडोर के आख़िर में एक बड़ा-सा लकड़ी का दरवाज़ा था, जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा था—
"Chairman & Managing Director"
रिसेप्शनिस्ट ने दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक दी।
"May I come in, sir?"
अंदर से वही दमदार आवाज़ आई—
"Yes... come in."
उसने दरवाज़ा खोला और मेरी तरफ़ मुस्कुराकर इशारा किया।
"Please come."
मैंने एक बार फिर गहरी साँस ली और कमरे के अंदर कदम रखा।
कमरे में दाख़िल होते ही मेरी नज़र सीधे ठाकुर उदय प्रताप सिंह पर पड़ी। हमेशा की तरह सफ़ेद कुर्ता-पायजामा, कंधों पर हल्की-सी शॉल और चेहरे पर वही रौब, जिसमें अपनापन भी शामिल था। उनकी तेज़ निगाहें सीधे मुझ पर आकर ठहर गईं।
मुझे देखते ही उनके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान उभरी।
"आओ बेटा... मैं तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा था।"
उनके मुँह से अपने लिए यह अपनापन सुनते ही मेरे भीतर की सारी घबराहट जैसे पलभर में गायब हो गई। मैंने झुककर आदर से उन्हें प्रणाम किया।
उन्होंने मुस्कुराते हुए सामने रखी कुर्सी की ओर इशारा किया।
"बैठो... आज हमें थोड़ी लंबी बात करनी है।"
उनकी यह बात सुनकर मेरे मन में फिर से उत्सुकता जाग उठी। ऐसा लग रहा था कि आज मेरी ज़िंदगी का एक नया अध्याय शुरू होने वाला है।
मैं धीरे से कुर्सी पर बैठ गया। मेरी नज़रें बार-बार ठाकुर साहब के चेहरे पर टिक जा रही थीं। मैं समझने की कोशिश कर रहा था कि उन्होंने मुझे अचानक क्यों बुलाया है। कमरे में कुछ पल के लिए ख़ामोशी छा गई।
ठाकुर साहब अपनी मेज़ पर रखी एक फ़ाइल के पन्ने पलटते रहे। फिर उन्होंने चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा और मेरी ओर देखते हुए मुस्कुराए।
"कैसे हो, बेटा?"
"जी... आपकी कृपा है, ठीक हूँ।"
"कॉल सेंटर की नौकरी अब भी कर रहे हो?"
"जी, सर। फिलहाल वही कर रहा हूँ।"
उन्होंने हल्का-सा सिर हिलाया, जैसे उन्हें पहले से ही इस जवाब का अंदाज़ा हो।
"उस दिन जब तुम मुझसे मिलने आए थे, उसके बाद मैंने तुम्हारे बारे में थोड़ी जानकारी निकलवाई।"
यह सुनते ही मैं चौंक गया। मेरे मन में कई तरह के सवाल उठने लगे।
उन्होंने आगे कहा,
"मुझे बताया गया कि तुमने ज़िंदगी में जितनी मुश्किलें देखी हैं, उतनी मुश्किलों के बाद ज़्यादातर लोग हार मान लेते हैं। लेकिन तुमने हार नहीं मानी। यही बात मुझे सबसे ज़्यादा पसंद आई।"
मैं चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा। मेरे पास कहने के लिए शब्द ही नहीं थे।
ठाकुर साहब अपनी कुर्सी से उठे और कमरे की बड़ी-सी खिड़की के पास जाकर खड़े हो गए। बाहर दूर-दूर तक फैला शहर दिखाई दे रहा था।
"जानते हो," उन्होंने बाहर देखते हुए कहा, "ज़िंदगी में काबिलियत से भी ज़्यादा ज़रूरी होती है नीयत और हिम्मत। हुनर तो सिखाया जा सकता है... लेकिन संघर्ष करने का जज़्बा हर किसी में नहीं होता।"
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ मुड़कर पूछा,
"अगर मैं तुम्हें एक मौका दूँ... ऐसा मौका जो तुम्हारी पूरी ज़िंदगी बदल सकता है... तो क्या तुम उसके लिए तैयार हो?"
मेरे दिल की धड़कन जैसे अचानक तेज़ हो गई।
"जी, सर... मैं पूरी मेहनत करूँगा।"
उन्होंने मुस्कुराकर कहा,
"मेहनत करने की बात तो हर कोई करता है। मैं यह जानना चाहता हूँ कि अगर रास्ता आसान न हुआ... अगर बार-बार गिरना पड़ा... तब भी क्या तुम डटे रहोगे?"