सूरज की पहली किरणें खिड़की से भीतर आ रही थीं। हवा में हल्की सी गर्माहट थी।
सिमरन धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलती है। उसके आसपास का कमरा बिल्कुल अनजान था —
सफेद दीवारें, साधारण सा बिस्तर, और एक कोने में बैठा एक अजनबी… करण।)
सिमरन (धीरे से) बोली -
“मैं... कहाँ हूँ? और आप... आप कौन हैं?”
(करण ने एक पल के लिए उसकी ओर देखा।
उसकी आँखों में वही पुराना प्यार था, लेकिन चेहरा शांत रखा।)
करण (धीरे से मुस्कुराते हुए) बोला -
“तुम यहाँ सुरक्षित हो। कल रात तुम रास्ते में बेहोश हो गई थीं… मैंने ही तुम्हें यहाँ लाकर रखा।”
सिमरन बोली -
“ओह… धन्यवाद… पर मेरा नाम क्या है? मुझे कुछ याद नहीं आ रहा।”
(करण का गला भर आता है। वह पलभर को नजरें झुका लेता है।)
करण (धीरे स्वर में) बोला -
“नाम… तुम्हारा नाम सिया है।”
(सिमरन के चेहरे पर हल्की मुस्कान आती है, जैसे किसी अनजाने नाम में भी उसे सुकून मिला हो।)
सिमरन बोली -
“सिया… अच्छा नाम है। धन्यवाद… आपने मेरी जान बचाई।”
(करण उसकी बात सुनकर हल्के से मुस्कुराता है, लेकिन उसके अंदर तूफ़ान मच चुका था।
वो जानता था — यही वही सिमरन है, उसकी ज़िंदगी, उसकी मोहब्बत…
पर अब वो उसे “करण” नाम तक नहीं बता सकता।)
(थोड़ी देर बाद सिमरन उठती है, और खिड़की से बाहर देखती है। बाहर नीले आसमान में पक्षी उड़ रहे थे।)
सिमरन (धीरे से) बोली -
“पता नहीं, पर ऐसा लगता है जैसे मैं किसी का इंतज़ार कर रही हूँ…
किसी की आँखें, किसी की आवाज़… याद तो नहीं, पर एहसास है…”
(करण अंदर ही अंदर टूट जाता है। वो बस इतना कह पाता है —)
करण (धीरे स्वर में) बोला -
“शायद वो एहसास तुम्हारा सबसे बड़ा सच है।”
(सिमरन उसकी ओर देखती है, पर कुछ नहीं समझ पाती।
वो फिर से खिड़की की ओर देखती है — वहीं दूर, पहाड़ों की तरफ,
करण की आँखों में वही दिशा थी — जैसे वो जानता हो कि अब
उसकी दुनिया वहीं खत्म हो रही है।)
करण (वॉयसओवर) -
“वो अब सिया बन चुकी है… मेरी सिमरन मर चुकी है…
पर अगर वो मुस्कुरा सकती है, तो शायद मैं हारकर भी जीत गया।”
(एक तरफ सिमरन की नई शुरुआत…
दूसरी तरफ करण की तन्हाई।
दोनों एक ही आसमान के नीचे, पर दो अलग दुनियाओं में।)
(सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैल चुकी थी। खिड़की से आती हवा सिमरन—या अब जिसे सब “सिया” कहते हैं—के बालों को हल्के से हिला रही थी।
करण कोने में बैठा, उसके लिए दवा और पानी लेकर आया था।)
सिया (धीरे से मुस्कुराते हुए) बोली -
“आप फिर से आ गए… आप बहुत अच्छे हैं। हर बार मेरी मदद कर देते हैं। पर…”
(वो थोड़ा रुकती है, उसकी आँखों में सवाल हैं।)
सिया बोली -
“आपका नाम क्या है? मैं तो हर दिन पूछने वाली थी, पर हिम्मत नहीं हुई।”
(करण कुछ पल के लिए ठहरता है। उसका दिल धड़क उठता है।
वो जानता था, अगर उसने अपना असली नाम “करण” बताया…
तो शायद सिमरन के अंदर कुछ जाग जाएगा — और वो सब यादें लौट आएंगी…
वो दर्द, वो खून, वो श्राप… सब कुछ।)
(वो गहरी सांस लेता है, चेहरा नीचे करता है, और हल्की मुस्कान बनाता है।)
करण (धीरे स्वर में) बोला -
“मेरा नाम… कबीर है।”
(सिया के चेहरे पर एक पल को सुकून उतर आता है।)
सिया बोली -
“कबीर… अच्छा नाम है। एकदम शांत… जैसे सुनते ही मन को सुकून मिले।”
(करण के होंठों पर दर्द भरी मुस्कान आती है।)
करण (मन में सोचते हुए) बोला -
“काश ये सुकून मैं उसे पहले दे पाता…
ना जाने कितनी बार मेरा नाम सुनकर वो काँप जाती थी…
आज वही मेरी पहचान नहीं पहचानती।”
(सिया धीरे-धीरे पानी पीती है और खिड़की के बाहर देखती है।)
सिया बोली -
“कबीर जी… अगर मैं सच में किसी और की ज़िंदगी से आई हूँ,
तो क्या आपको लगता है कि वो मुझे ढूंढेगा?”
(करण कुछ पल उसे देखता है, उसकी आँखों में उदासी है।)
करण (धीरे से) बोला -
“हो सकता है… या शायद वो चाहता हो कि तुम नई ज़िंदगी शुरू करो।
कभी-कभी भूल जाना ही सबसे बड़ा वरदान होता है।”
(सिया उसकी ओर देखती है, जैसे पहली बार उसे गहराई से समझने की कोशिश कर रही हो।)
सिया (धीरे से) बोली -
“आप बहुत अजीब हो कबीर जी… जैसे आपके अंदर बहुत कुछ छुपा है…
पर फिर भी आप मुस्कुराते हो।”
(करण मुस्कुराता है, उसकी आँखों में हल्की नमी।)
करण बोला -
“कभी-कभी मुस्कुराना भी एक ज़रूरत बन जाता है, सिया।”
(सिया की आँखों में सुकून है, और करण की आँखों में अधूरी मोहब्बत।
एक ने अपनी पहचान खो दी…
दूसरे ने अपनी पहचान छुपा ली…)
“वो अब सिया थी…
और वो अब कबीर।
नाम बदल गए थे, मगर रूहें वही थीं…
बस फ़र्क इतना था — अब मोहब्बत यादों से नहीं, किस्मत से टकरा रही थी।”
(सुबह की ठंडी हवा में मंदिर की घंटियों की मधुर आवाज़ गूंज रही थी।
सिया (जो असल में सिमरन थी) शीशे के सामने खड़ी थी।
उसके बाल खुले थे, चेहरा शांत पर आँखों में हल्की खोई हुई सी झलक।)
(वो अपने छोटे से पाउडर बॉक्स से सिंदूर निकालती है — और बिना सोचे समझे अपने मांग में भर लेती है।
हर दिन की तरह, जैसे कोई रोज़ की रीत हो…)
सिया (धीरे से खुद से) बोली -
“पता नहीं क्यों… मैं ये रोज़ करती हूँ…
जैसे कोई अंदर से कहता है कि ये ज़रूरी है… पर किसके लिए?
जब मैं जागी थी तो भी सिंदूर मेरी मांग में था।
कौन है वो जिसके नाम का मैं सिंदूर लगाती हूं।”
(वो शीशे में खुद को देखती है — माथे पर सिंदूर, गले में मंगलसुत्र , आँखों में सवाल।
एक पल को उसके दिमाग में कुछ झलकता है —
सिंदूर लगाते वक्त किसी की आँखें… लाल आँखें… और एक मुस्कान।
वो झटका खाकर पीछे हटती है।)
सिया (घबराई हुई) बोली -
“वो कौन था?... ये चेहरा… क्यों याद नहीं आ रहा है मुझे?...”
(उसी वक्त दरवाज़े पर कबीर (करण) आता है।
वो सिया को सिंदूर लगाते देख कुछ पल के लिए ठहर जाता है।
उसकी आँखों में हैरानी और दर्द दोनों हैं।)
कबीर (धीरे से) बोला -
“सिया… तुम रोज़ ये सिंदूर लगाती हो?”
सिया (हल्की मुस्कान के साथ) बोली -
“हाँ… आदत सी है…
जब से होश आया, बस करती आ रही हूँ… पता नहीं क्यों।
शायद अच्छा लगता है माथे पर रंग का होना…”
(करण की आँखों में नमी उतर आती है।
वो जानता था — यही उसकी “पत्नी” की निशानी थी।
वो सिंदूर जो उसने खुद उसके माथे पर भरा था उस रात…
जब उन्होंने अमर और इंसान के बीच प्यार की कसम खाई थी।)
(करण की सांसें भारी हो जाती हैं, पर वो मुस्कुरा कर बोलता है।)
कबीर (धीरे से) बोला -
“कभी-कभी कुछ आदतें… पुराने रिश्तों की याद दिलाती हैं, सिया।”
(सिया उसकी ओर देखती है, हल्के से मुस्कुराती है।)
सिया बोली -
“शायद… पर मुझे किसी रिश्ते की याद नहीं…
बस इतना जानती हूँ कि जब ये सिंदूर लगाती हूँ,
तो अंदर एक अजीब-सी शांति मिलती है… जैसे कोई मेरे पास है।”
(करण की आँखें भर आती हैं।
वो चुपचाप पीछे मुड़ जाता है ताकि सिया उसकी नमी न देख सके।)
“वो सिंदूर अब बस एक आदत थी…
पर उस आदत के पीछे थी एक अधूरी कहानी…
एक ऐसा रिश्ता, जो यादों से मिट चुका था,
पर रूहों में अब भी ज़िंदा था…”
(सिंदूर की लाल रेखा चमकती है —
और अगले ही पल, एक हल्की सी हवा चलती है…
जैसे कोई अदृश्य आत्मा मुस्कुरा रही हो।)
सुबह की हल्की धूप खिड़की से छनकर कमरे में आ रही है।
सिया (जो असल में सिमरन थी) आईने के सामने खड़ी है।
उसके सामने एक सुंदर साड़ी, चूड़ियाँ और पूजा की थाली रखी है।)
(उसकी आँखों में मासूम-सी चमक है, पर दिमाग में हल्का सा
भ्रम —
क्योंकि उसे याद ही नहीं कि वो ये व्रत किसके लिए रख रही है।)
सिया (धीरे से खुद से) बोली -
“सब बोल रहे थे कि आज करवा चौथ है…
पता नहीं क्यों, मुझे लगा… मुझे भी ये व्रत रखना चाहिए…”
(वो मुस्कुरा देती है। उसकी आँखों में अजीब-सी चमक है —
जैसे उसकी रूह कहीं गहराई से इस दिन को पहचानती हो।)
(वो पूजा की थाली सजाने लगती है।
थोड़ी देर बाद, कबीर (जो असल में करण था) कमरे में आता है।
वो सिया को लाल साड़ी में देख ठिठक जाता है।)
कबीर (हैरान होकर) बोला -
“सिया… ये सब क्या है? तुमने कुछ खाया भी नहीं सुबह से?”
सिया (हल्की मुस्कान के साथ) बोली -
“आज करवा चौथ है ना… सब औरतें अपने पति के लिए व्रत रखती हैं…
मुझे नहीं पता मेरा पति कौन है… पर दिल ने कहा,
‘रख ले सिया’ — तो रख लिया।”
(कबीर का चेहरा सख्त हो जाता है,
वो पलटता है ताकि अपनी भीगी आँखें छिपा सके।)
कबीर (धीरे, टूटे स्वर में) बोला -
“तुम्हें नहीं रखना चाहिए था ये व्रत…”
सिया (भोलेपन से) बोली -
“क्यों नहीं रखना चाहिए था?
कहीं ऐसा तो नहीं कि… कि आप मुझसे कुछ छिपा रहे हो?”
(कबीर उसकी ओर देखता है, उसकी आँखों में मासूम सवाल हैं।
वो कुछ नहीं कह पाता, बस मुस्कुरा कर टाल देता है।)
कबीर (धीरे से) बोला -
“नहीं… बस… भूख लगती है ऐसे व्रतों में… तुम थक जाओगी। तबियत खराब हो जाएगी तुम्हारी।”
सिया (मुस्कुराते हुए):
“अगर किसी की लंबी उम्र के लिए भूख सहनी पड़े,
तो वो भी ठीक है…”
(वो हल्के से उसकी ओर देखती है,
जैसे अंदर से कोई रिश्ता फिर से जन्म ले रहा हो।)