Muhabbat Ek Sabaq - 12 Afariya Faruqui द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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Muhabbat Ek Sabaq - 12

सोकर उठने के बाद वह नीचे लाउंज में आई तो अनस नाशते की टेबल पर चची से नखरे उठवाने में मसरूफ था आज कल रज़ा की स्कूल की छुट्टियां थीं तो दादु के कहने पर वह लोग यही रह रहे थे 
"चची जान आज नाशते में अंडो का हलवा खाना है मुझे"

शिफ़ा को देखते ही उसे जान बूझ कर फरमाइश की थी 

"अरे यह भी कोई बात हुई भला , अभी बनवा देती हूं रूको"

वह कह कर शिफ़ा की तरफ पलटी थीं 

"जाओ बेटे बना कर ले आओ जल्दी से अंडों का हलवा शाबाश"
"मुझसे नही बनाए जाते अंडे"

 वह मिनमिनाई। 
"क्यों नही बनाए जाते काटते हैं वह तुम्हारे हाथों में" ?? 

अम्मी अनस का लिहाज़ किये बग़ैर वहीं शुरू हो चुकी थीं। 

"काटते नहीं हैं। बस नही बनाने मुझे , आप जानती हैं ना मुझसे ना बनाए जाते हैं ना खाए जाते हैं"

"यही आदते तो दूसरे घर जा कर नुक़सान देती हैं यहां तो चल जाएंगा यह सब वहां बताना क्या कहोगी जा कर" ? ?? 

अम्मी हाईपर थीं    

 उसने तिरछी नज़रों से अनस को देखा जो अब बैठा क्लोज़ अप का एड कर रहा था उसकी बेइज़्ज़ती पर। 

"जी बिल्कुल , दूसरे घर जा कर घर में घुसते ही सबसे पहले वह मुझसे अंडो का हलवा ही तो बनवाएंगे" !! 

उसने जल कर कहा तो अनस का बेसाख्ता कहकहा फूटा था जिस पर उसका दो किलो खून खुश्क हो गया।

"तौबा है शिफ़ा बड़ो से ऐसे कौन बात करता है"

अनस ने मज़ीद तीली लगाई। 

"इसको तो बेटा ज़िंदगी भर तमीज़ नही आएगी देख लेना अगले घर जा कर भी यह यूं ही हमारा नाम रौशन कराएगी"

अम्मी क़हर भरी नज़रों से उसे घूरती हुई चली गईं 

"तुम्हें खुद को तो बहुत तमीज़ है"

उनके जाने के बाद उसने उस को कच्चा चबा जाने वाली नज़रों से घूरा था 
"तुम्से तो ज़्यादा ही है खैर"

अनस ने सामने रखा जूस का ग्लास उठा कर मुंह से लगा लिया। 
"बकरे की तरह चरने की तमीज़ है तुम्हे बस ,और यह अंडे इतने मत खाया करो पहले ही दिमाग़ खराब है तुम्हारा जो कसर रह गई है वह भी पूरी हो जाएगी"

उसने साथ के साथ बदला लिया
"सुनो कनीज़ जाओ और जा कर हलवा बना कर लाओ हमारे लिये"

उसने उसके तंज़ को अनसुना करके शाही अंदाज़ से फरमान जारी किया तो शिफ़ा के सर से लगी और पांव में बुझी थी 

"यह कनीज़ ना आपके मुंह के इतने टुकड़े करेगी बादशाह सलामत की प्लास्टिक सर्जरी से भी नही जुड़वा पाएंगे आप"

उसने दांत पीस कर जवाब दिया। 

"अच्छा ठीक है कर लेना अपना यह शौक़ भी पूरा , पहले हलवा बना कर तो ले आओ"

वह ढीट पन से बोला 
"अच्छा क्या तुम टाइम निकाल सकते हो थोड़ा सा "????

वह जवाब देने के बजाए पूछने लगी 

"हां बिल्कुल , मगर किस काम के लिए" .??? 

"मरने के लिये " 

वह गुस्से से उसे घूरती हुई कह कर पलट गई 

"अभी नही मर रहा हूं मैं बेफिक्र रहो , तुमसे शादी किये बग़ैर नही कही जाने वाला हूं"
उसने जाती जाती शिफ़ा को सुनाने के लिये बुलंद आवाज़ से कहा था। 
वह सुनी अनसुनी करती निकल गई। 
************

"भई यह अनस कहां है" ????

डिनर के वक़्त टेबल पर सब के बीच अनस को मौजूद ना पाकर असद साहब पूछने लगे

"अपने कमरे में है कोई काम कर रहा है शायद"

कौसर बेगम उनके लिये प्लेट मे खाना उतारती हुई बोलीं। 

"बुलाओ उसे , कौन सा ऐसा ज़रूरी काम है जो खाने के बाद नही हो सकता"

"ठीक है आप खाना खाऐं मैं देखती हूं कहां रह गया यह"

बेगम असद ने उठते हुए कहा। 

"बड़ी अम्मी आप रूकें , मैं देखती हूं"

उसने जान बूझ कर उनहें रूकाया था , सुबह वाली इंस्लट का बदला भी तो लेना था उस से। 

"टेबल पर बुला रहे हैं सब तुम्हें " !!! 

दरवाज़ा खोल कर अपनी ही धुन में कहती वह अंदर दाखिल हुई तो सामने कोई नही था उसने चारों तरफ नज़रें दौड़ाई कमरा खाली था। 

"अच्छा तो यहां है यह" !!! 

वाशरूम से आती पानी गिरने की आवाज़ पर उसके ज़हन मे फौरन शैतानी ख्याल आया जिस पर अम्ल करने में उसने देर नही लगाई थी

"सैकेंड के हज़ारवे हिस्से में वह वाशरूम के बाहर लगे स्विच बोर्ड के पास पहुंची और वाशरूम की लाइट बंद कर दी"

"अब आएगा मज़ा" !!! 

इस्से पहले कि कोई देख लेता सोचती हुई वह फटाफट वहां से खिस्क ली 

पीछे से उसने वाशरूम का दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ सुनी थी लेकिन अनसुनी करते हुए ऐक फातिहाना मुस्कुराहट के साथ वह बाहर निकल आई। 

 "बड़ी अम्मी वह नहा कर आ रहा है" !!! 

वह इतमीनान से कहती हुई अपनी कुर्सी खींच कर बैठ गई। 

"क्या बना है अम्मी ,खुशबू तो बहुत अच्छी आ रही है"????

अनस की आवाज़ पर उसे एक ज़ोरदार हैरत का झटका लगा था

"तुम तो नहा रहे थे ना , इतनी जल्दी कैसे आ गए "?????

बेगम असद ने हैरानी से उसकी शकल देखी। 

"नहीं मैं तो बाहर लॉन में था, किसने कहा मैं नहा रहा हूं" ????

वह असद साहब के बराबर बैठते हुए पूछने लगा

"शिफ़ा गई थी तुम्हें बुलाने अभी खाने के लिये तो इसने बताया तुम नहा रहे हो"

"अरे वह तो शहरयार नहा रहा है मेरे कमरे में उसके वाशरूम में पानी का कुछ ईश्यू है"

अनस ने इतमीनान से बताया तो उसे एक ज़ोर का धंसका लगा था। 

"तुम्हे क्या हुआ" ?? 

आमना बेगम ने जल्दी से पानी का ग्लास पकड़ाते हुए उसकी कमर सहलाई। 

"कुछ नही फुप्पो ,कुछ अटक गया था शायद गले में" !! 

पानी पीकर वह टिशु से हाथ और मुंह साफ करती खड़ी हो गई

"खाना तो खा लो ठीक से, अभी तो कुछ खाया ही नही तुमने" !! 

आमना बेगम उसे यूं खाना बीच में छोड़कर उठते देख कर बोलीं। 

"बस फुप्पो दिल नही चाह रहा है अब"

वह बेदिली से कह कर वहां से चली आई

************

"जी कौन हैं आप "???

वह फोन उठा कर बोली

उसके हैदराबाद से आने के बाद यह नादिया का पहला कॉल था

“मैं वही हूं जिसके साथ आप यूनिवर्सिटी में बेताल की तरह चिपकी रहती हैं”

नादिया उसकी नाराज़गी को अच्छे तरीक़े से जानती थी दो मिन्ट में वह नाराज़ होती और अगले ही सैकेंड मान भी जाया करती थी

"कोई ज़रूरत नही है मुझसे बात करने की , तुम्हें अब याद आ रही है मेरी" ????

वह बदस्तूर नाराज़ थी

"अरे यार सॉरी ना , मैने तो इसलिये नही किया कॉल कि तुम फंकशन में बिज़ी होंगी"

"ऐक्सक्यूज़मी… घर है यह , बारात घर नही है जो चौबीस घंटे फंकशन चलेंगे यहां"
वह अब भी नाराज़गी से बोली। 

"अच्छा बस ना ,छोड़ो यह नाराज़गी फिर एक गुड न्यूज़ सुनानी है तुम्हे " !!! 

अबकी बार नादिया ने ससपेंस क्रिएट किया

"कैसी गुड न्यूज़ , खुदा नाख्वास्ता मेरे पीछे शादी तो नही कराली तुमने" ????

उसने रिसीवर को ऐसे घूरा जैसे वह नादिया हो। 

"पहली बात तो ऐसा कुछ नही है और दूसरी बात अगर कर भी लूं तो तुम यह ब्वायफ्रेंड की तरह धमकियां क्यों दे रही हो" 

नादिया ने सस्पेंस को और ज़्यादा बढ़ाया। 

"बको मत अच्छा , यह बताओ गुड न्यूज़ क्या है" ??? 

.उससे वैसे भी ससपेंस बर्दाशत नही होता था। 

"हम लोग कल मामू के घर आ रहे हैं " !!! 

उसने ससपेंस आखिर रिवील कर ही दिया

"क्या……सीरियस्ली" ??? 

वह वाक़ई खुश हो गई नादिया के मामू वहीं करीम नगर में रहते थे

"हां और परसो हम लोग तुम्हारी तरफ आऐंगे" !!! 

"वॉव यार अम्मेज़िंग !!!!, आ जाओ तुम, वैसे भी बहुत याद आ रही है तुम्हारी"

"ठीक है फिर, इनशाअल्लाह परसो मिलते हैं अल्लाह हाफिज़"

"ओके अल्लाह हाफिज़ उसने भी कहकर फोन रख दिया"