रिया, नीला ड्रम और बेचारे लड़के Dr Sandip Awasthi द्वारा हास्य कथाएं में हिंदी पीडीएफ

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रिया, नीला ड्रम और बेचारे लड़के

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हर लड़का,जो पहले लड़कियों पर अपना प्रभाव जमाना जन्मसिद्ध अधिकार समझता था, भयभीत भीगे चूहे सा घूम रहा है,बोराया सा। अपनी मित्र/गर्लफ्रेंड/संभावित पत्नी तक को शक की निगाह से देख रहा। क्या पता इसके अंदर भी सिया, विया छुपी हुई हो? लड़कों का डरना देखना ऐसा ही है मानो लंकेश को श्री राम, श्री राम कहते सुनना।

इन दिनों अखबार,सोशल मीडिया, न्यूज चैनल भरे पड़े हैं इन घटनाओं से। बात होनी भी लाजमी है। क्योंकि बेचारा, निर्दोष पुरुष मार डाला गया वह भी अबला के हाथों।

कहते थे औरत औरत की दुश्मन होती थी अब कह सकते हैं तीनो में पुरुष ने महिला की मदद की पुरुष को मारने में।

क्या कलियुग आ गया है? किसी पर भरोसा ही नहीं? जिसे कोमलांगी मानकर सदियों तक अंदर ही रखा,कभी उसकी पसंद,नापसंद की परवाह नहीं की,जिस खूंटी से चाहा बाँध दिया। फिर जमाना बदला,नई सदी,नौकरी,आजादी तो फिर और अधिक शोषण किया इन लड़कियों का हमने तो। ज्यादा किसी ने चू चपड़ की तो दे तेजाब की धार ....कितनी घूम रही हैं अभी भी अपनी किस्मत को रोते।

पर यह क्या? क्या यह करोना इफेक्ट है कि उसके बाद एकदम से साल दर साल यह स्त्री वह कर रही जो इस सनातन देश में कभी नहीं हुआ।

शिकारी खुद शिकार हो रिया?

अरे,बचने का भी मौका नहीं। और कोई बड़ी बात हो तो कहा भी जाए।छोटी सी बात की मुझे यह पुरुष पसंद नहीं। नहीं रहना बाके साथ। अरे तो भाई अलग हो जा।किसने कहा रह? अपनी मर्जी से जब चाहे ,जिसके साथ चाहे रहे ले। पर यह क्या की तुम उस पुरुष का टिकट ही काट दो। 

छी,छी,क्या जमाना आया।कहते हुए दुबे जी ने हमारी ओर देखा। हम जानकार चुप लगा गए।क्योंकि अपुन को अनुभव नहीं इन सबका।

दुबे जी बड़बड़ाने लगे जिसका सार यह था कि उनकी पत्नी के भी लक्षण सही नहीं लगते। न जाने किससे फोन पर बतियाती रहती है और जैसे ही उन्हें देखती है, ",वो आ गए " कहकर फोन रख यूँ मासूम से हुक्म की बेगम जैसा चेहरा बना लेती है। 

"जल्द तहकीकात न की गई चाचा, तो पानी सिर से ऊंचा हो सकता है।"

   दुबे जी ने घूरकर हमें देखा,फिर हँसे ,"बच्चू ब्याह किए चालीस साल हो गए। अब तो मसान में ही अंतिम सांस लेकर जुदा होंगे तेरी चाची से। जैसी भी है बहुत अच्छी है।अच्छे अच्छों से अच्छी है।"

             इन दिनों स्त्रियों में मनमानी करने की ऐसी मस्ती छाई हुई है कि जो काम मात्र कहने या "नो मतलब नो" से हो सकता है,उसमें यह भी कहने का धैर्य नहीं। वह तो मानो धरती से पुरुषों की संख्या कम करने का प्रण लेकर ही धरती पर आई है।   

    ऐसे ही माहौल के बीच मिल गए अपने तेज सिंह, जो नाम से ही नहीं व्यवहार से भी तेज थे। कभी बीवी को पाँव की जूती से कम नहीं समझा। 

" मंदिर के बाहर माथा टेककर आ रहे थे । हाथ में पूजा की थाली,माथे पर चंदन का त्रिपुंड लगाए शक्ल ऐसी हो रही थी मानो शेरनी पीछे पड़ी हो।

हमें देखकर,चुपचाप साइड से निकलने वाले थे,की हमने रोक लिया, "अरे बॉस,यहां कहां? तुम तो कुछ मानते ही नहीं थे ?"

वह थोड़ा झिझका,चुप रहा फिर सीधे हाथ में पूजा की थाली ले बाया हाथ ऊपर कर बोला,"सब ईश्वर की मर्जी।"

तभी पीछे से एक सुंदर पर जागरूक स्त्री आकर तेज सिंह पर ग्रहण की तरह बोली,"चलो,जल्दी करो।मार्केट भी जाना है। " कहकर वह दन से आगे और पीछे पीछे दुम हिलाता हमारा भूतपूर्व अल्फा मर्द, एनिमल,जो सचमुच चूहा बन गया था।

     दुबे जी गए ही थे कि सामने से टुन्नू भैया उर्फ गोलू उर्फ शाश्वत यादव परेशान से आते दिखे।

"प्रणाम चाचा। आज कुछ समझ नहीं आ रहा तो आपके पास आए।"

  "भतीजे क्या हुआ? तुम चिंता न करो हमारे पास हर मर्ज की दवा है।"

"चाचा, हमें शक हो रहा है! हमारे साथ कभी भी कुछ बुरा हो सकता है।"

हे राम,यह होनहार, ददुआ छाप लड़का या कहें दादा घबरा रहा है? जो हर सुंदर लड़की को देखना,छेड़ना अपना धर्म मानता और लड़कियां जिसके भयानक चेहरे को देख सिहर सिहर जाती थीं, वही आज मिमिया रहा ? आँखो में भय दिख रहा?

प्रत्यक्षत हम बोले, "आराम से पहले पानी पी लो। कुछ खा लो फिर बताओ।"

गट गट पानी पी ,गुटखा मुंह में दबा,चबा फिर वह हुआ कुछ बोलने लायक।

"हमारी गर्लफ्रेंड ने हमें कल दोपहर सूने तालाब की पाल पर मिलने बुलाया है।"

"तो? जाओ भइया,तुम्हारी मित्र है,ब्याह करोगे उससे तो मिल आना चाहिए।"

"पर अकेले बुलाया है?अकेले?"

हम खुलकर हंसे ,"अरे तो क्या गर्ल फ्रेंडवा से मिलने दुई लोगन को साथ लेके कोई जाता है?बकलोल हो क्या?"

"अरे ! पर आप समझते नहीं हो। हमें चिंता है..." । कहकर वह चुप लगा गया।

"अरे क्यों चिंता करते हो? राम खिलावन से तुम्हारे ब्याह की बात हम कर लेंगे। वह और हम बचपन के मित्र हैं।भूल गए क्या?"

"अरे नहीं ,चाचा, डर लग रहा है।"वह सिर झुकाए, रुआंसे स्वर में बोला।

अच्छा खासा डीलडोल,अभी तक सभी को डराता,तंग करता आया। लड़कियां इसे दूर से भी देखती तो रास्ता बदल लेती। कितने ही स्कूटी,रिक्शा,बस स्टैंड के पीछे इसे हमने देखा। कट्टर,निर्दयी और साक्षात भय का अवतार रहा व्यक्ति आज खुद डर रहा,भयभीत चिड़िया सा दिख रहा? जरूर कोई बात है।

क्या बात है? क्या हो गया ऐसा कि यह होनहार,संभावित बड़ा राजनीतिक कार्यकर्ता, देश का दादागिरी में भविष्य , एक लड़की से मिलने में इतना घबरा रहा?

"बेखौफ कहो क्या बात है भतीजे? हमरी उम्र नहीं है नहीं तो हम चलते तुम्हारी डेटवा पर।" पान मुंह में रखते हुए बोले।

अंत में बड़ी हिम्मत जुटा बोला,क्योंकि उसकी गुंडई,दादागिरी सब मिट्टी में मिल गई।

"वह सोनम या रिया निकली तो? हम वापस लौट नहीं पाएंगे चाचा। क्या करें? 

   एकदम से झक से सारा मामला साफ हो गया। सारे डरावने,बेदर्दी,अत्याचारी और जिनके मन में चोर था,उन सभी लड़कों,पुरुषों के मन में खौफ बैठ गया है। उनके साथ भी कुछ बुरा,बहुत बुरा हो सकता है। अभी तो एसिड,कार, बाइक दुर्घटना के विकल्प आजमाए ही नहीं हैं। यह भी लड़कों की सताई,परेशान लड़कियां आजमा सकती हैं। फिर तो गली गली ऐसे शोहदे,दादा मिलेंगे जो घायल,पीड़ित और लड़की के सताए हैं।

हर लड़की में उन्हें रिया,सोनम दिखाई देंगी। अंकुश तो लग ही गया है।जो नहीं लगाएंगे तो सोशल मीडिया से लड़कियां शिक्षित हो ही रही। वह अच्छे, भले,निर्दोष के साथ ऐसा कर सकती हैं तो उन्हें गली गली, शहर,दफ्तर,घरों,ट्रेन,बस, चौराहे पर छेड़ने वालों के साथ क्यों नहीं कर सकतीं?

  " आज से अपन भले

संत बनकर सभी लड़कियों से राखी बंधवाएंगे। सभी का सम्मान करेंगे। ... तालाब की पाल पर मिलने नहीं जाएंगे।"

 

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(डॉ संदीप अवस्थी, 

कथाकार,आलोचक