जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 11 Priyam Gupta द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 11

Episode 11 – जब दूरी आईने की तरह होती है





समय अजीब चीज़ है।
कभी रुक जाता है,
कभी बिना बताए आगे निकल जाता है।
Priyam को लगे अभी कल ही
सब लोग आमने-सामने बैठे थे,
बातें हो रही थीं,
और आज…
सब कुछ थोड़ा शांत है।
बहुत शांत।
पिछले कुछ दिनों से
Yaman और Priyam की बात कम हो गई थी।
ना किसी नाराज़गी की वजह से,
ना किसी झगड़े के कारण।
बस इसलिए क्योंकि
दोनों ने खुद को
थोड़ा समझने का फैसला किया था।
पर दूरी,
चाहे समझदारी से ली जाए,
दिल पर असर छोड़ ही देती है।
Priyam अपने कमरे में बैठी थी।
टेबल पर किताबें खुली थीं,
लेकिन मन पढ़ाई में नहीं लग रहा था।
वह बार-बार फोन उठाती,
फिर रख देती।
“क्या मैं ही ज़्यादा सोच रही हूँ?”
उसने खुद से पूछा।
उसे याद आया
Yaman का शांत चेहरा,
उसकी बातें,
और वो भरोसा
जो उसने बिना शोर दिए दिखाया था।
“अगर वह सच में इंतज़ार कर रहा है,”
उसने सोचा,
“तो मुझे भी इस वक़्त का सम्मान करना चाहिए।”
लेकिन दिल
हमेशा दिमाग़ की बात नहीं मानता।
उधर Yaman की हालत भी कुछ अलग नहीं थी।
ऑफिस में बैठा था,
काम चल रहा था,
मीटिंग्स हो रही थीं।
पर बीच-बीच में
उसकी नज़र
फोन की स्क्रीन पर चली जाती।
उसने जानबूझकर
खुद को रोका हुआ था।
“अगर मैं बार-बार बात करूँ,”
उसने सोचा,
“तो शायद उसे लगे
कि मैं भी दबाव बना रहा हूँ।”
और वह ऐसा बिल्कुल नहीं चाहता था।
शाम को Priyam की एक सहेली उससे मिलने आई।
सामान्य बातचीत के बाद
उसने अचानक पूछा—
“तू खुश है?”
Priyam थोड़ी देर चुप रही।
“पता नहीं,”
उसने ईमानदारी से कहा।
“शांत हूँ…
पर खुश का मतलब अभी समझ नहीं आ रहा।”
सहेली ने मुस्कुराकर कहा—
“कभी-कभी जब इंसान
खुद को चुनता है,
तो अकेलापन साथ आ ही जाता है।”
Priyam ने सिर हिलाया।
“पर इस बार
ये अकेलापन
डरा नहीं रहा,”
उसने कहा।
“बस सोचने पर मजबूर कर रहा है।”
उस रात
Priyam ने पहली बार
Yaman को मिस किया।
बिना किसी वजह के।
बिना किसी मजबूरी के।
सिर्फ़ इसलिए
क्योंकि उसकी मौजूदगी
अब आदत बनती जा रही थी।
उसने फोन उठाया।
कुछ पल सोचा।
फिर सिर्फ़ एक लाइन लिखी—
“उम्मीद है आप ठीक होंगे।”
बस।
कोई सवाल नहीं,
कोई उम्मीद नहीं।
Yaman ने मैसेज देखा
तो हल्की मुस्कान आ गई।
उसने तुरंत जवाब नहीं दिया।
कुछ मिनट बाद लिखा—
“हाँ।
और उम्मीद है
आप भी खुद के साथ ठीक होंगी।”
Priyam ने वो मैसेज
कई बार पढ़ा।
उसमें चिंता भी थी,
और आज़ादी भी।
अगले दिन
Yaman की माँ ने उससे पूछा—
“क्या तुम खुश हो?”
Yaman ने बिना सोचे कहा—
“मैं सही हूँ।”
“और Priyam?”
माँ ने पूछा।
वह थोड़ा रुका।
“वह भी सही होनी चाहिए,”
उसने कहा।
“मेरे साथ या मेरे बिना।”
माँ ने उसे ध्यान से देखा।
“तुम उससे प्यार करने लगे हो,”
उन्होंने कहा।
Yaman ने कोई जवाब नहीं दिया।
पर चुप्पी
कभी-कभी
सबसे साफ़ जवाब होती है।
इधर Priyam के घर
एक नई बात उठी।
एक दूर का रिश्ता आया था।
बस पूछताछ।
माँ ने बात आगे नहीं बढ़ाई,
पर Priyam को बताया।
उसका दिल
एक पल के लिए रुक सा गया।
“मैं अभी किसी और के बारे में
सोच भी नहीं सकती,”
उसने मन ही मन कहा।
उस शाम
वह बहुत देर तक
छत पर टहलती रही।
उसे एहसास हुआ—
दूरी ने उसे साफ़ बता दिया है
कि वह क्या नहीं चाहती।
उसने खुद से सवाल किया—
“अगर Yaman आज मना कर दे,
तो क्या मुझे फर्क पड़ेगा?”
जवाब तुरंत आ गया।
हाँ।
और यही जवाब
सबसे ज़्यादा डराने वाला था।
रात को उसने डायरी खोली
और लिखा—
दूरी ने मुझे सिखाया
कि कुछ लोग
पास हों या दूर,
दिल में जगह बना ही लेते हैं।
और शायद
यही प्यार की शुरुआत होती है।
उधर Yaman ने भी
अपने कमरे में बैठकर
खुद से पहली बार माना—
“मैं उसका इंतज़ार
सिर्फ़ समझदारी से नहीं,
दिल से भी कर रहा हूँ।”