जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 7 Priyam Gupta द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 7

Episode 7 – धीरे-धीरे उभरते सवाल 


अगले दिन घर में हल्की-सी हलचल थी।

कोई खुलकर कुछ नहीं कह रहा था,

लेकिन सब कुछ इशारों में चल रहा था।

कभी रसोई में धीमी आवाज़ में बातें होतीं,

कभी माँ किसी रिश्तेदार से फोन पर मुस्कुराकर बात करतीं,

कभी पापा चुपचाप अख़बार पढ़ते हुए

बीच-बीच में Priyam की तरफ देख लेते।

सब सामान्य था।

फिर भी कुछ बदल चुका था।

Priyam को ऐसा लग रहा था जैसे

हर मुस्कान के पीछे कोई उम्मीद छुपी हो,

और हर सवाल के पीछे कोई फैसला।

वह ड्रॉइंग रूम में बैठी थी।

टीवी चल रहा था,

लेकिन उसका ध्यान कहीं और था।

स्क्रीन पर बदलते दृश्य

उसे सिर्फ रंगों की तरह दिख रहे थे।

उसकी नज़र बार-बार दीवार पर लगी घड़ी पर जा रही थी।

“वक़्त इतनी जल्दी क्यों भाग रहा है?”

उसने मन में सोचा।

उसे लग रहा था

जैसे सब लोग उससे आगे निकल चुके हैं,

और वह अभी भी

अपने ही सवालों के बीच खड़ी है।

दोपहर में एक रिश्तेदार मिलने आईं।

घर में चाय रखी गई,

हल्की-हल्की हँसी की आवाज़ें आने लगीं।

Priyam भी वहीं बैठी थी,

लेकिन हमेशा की तरह शांत।

बातों-बातों में रिश्तेदार ने मुस्कुराते हुए कहा—

“अब तो सब तय-सा ही लग रहा है।

लड़का भी अच्छा है, परिवार भी।

किस्मत हो तो ऐसी।”

कमरे में हल्की मुस्कान फैल गई।

Priyam भी मुस्कुरा दी,

लेकिन वह मुस्कान सिर्फ बाहर तक थी।

अंदर…

कुछ और चल रहा था।

“अगर किस्मत इतनी आसान होती,”

उसने मन में कहा,

“तो डर नाम की चीज़ ही नहीं होती।”

उसे खुद समझ नहीं आ रहा था

कि वह किस बात से डर रही है।

Yaman से?

इस रिश्ते से?

या खुद से?

शाम होते-होते

घर थोड़ा शांत हो गया।

Priyam धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़कर

छत पर चली गई।

अब यह उसकी आदत बनती जा रही थी—

जब मन भारी होता,

तो खुले आसमान के नीचे खड़े होना।

ऊपर हवा थोड़ी ठंडी थी।

सूरज ढल चुका था,

और आसमान में हल्का नारंगी रंग बचा हुआ था।

Priyam रेलिंग के पास जाकर खड़ी हो गई।

हवा उसके बालों को छू रही थी,

लेकिन मन के अंदर जो उलझन थी,

उसे हवा भी हल्का नहीं कर पा रही थी।

उसने आँखें बंद कर लीं।

और तभी

कुछ पुरानी यादें

धीरे-धीरे सामने आने लगीं।

वो समय

जब उसने अपनी बात कहने से पहले ही

दूसरों की उम्मीदों को चुन लिया था।

जब उसने “ना” कहना चाहा था,

लेकिन चुप रह गई थी।

जब उसने खुद को समझाने की कोशिश की थी

कि “सब ठीक हो जाएगा”…

और अंत में

सबसे ज़्यादा अकेली वही रह गई थी।

उसने गहरी साँस ली।

“मैं फिर वही गलती नहीं करना चाहती,”

उसने खुद से कहा।

“पर क्या इस डर की वजह से

मैं किसी अच्छे रिश्ते से भी पीछे हट जाऊँ?”

यह सवाल

उसके अंदर लगातार घूम रहा था।

क्योंकि सच यह था—

Yaman ने अब तक उसे

किसी भी चीज़ के लिए मजबूर नहीं किया था।

और शायद यही बात

उसे सबसे ज़्यादा बेचैन कर रही थी।

अगर सामने वाला गलत होता,

तो फैसला आसान होता।

लेकिन जब सामने वाला समझने वाला हो…

तब डर और गहरा हो जाता है।

रात थोड़ी और गहरी हो चुकी थी।

Priyam अपने कमरे में वापस आ गई।

लाइट बंद थी।

बस टेबल लैंप की हल्की रोशनी कमरे में फैल रही थी।

वह बिस्तर पर बैठी थी

जब फोन की स्क्रीन जली।

Yaman:

“आप ठीक हैं?”

बस तीन शब्द थे।

ना कोई लंबा मैसेज,

ना कोई ज़रूरत से ज़्यादा चिंता।

लेकिन Priyam उन तीन शब्दों को

देर तक देखती रही।

उसे लगा

जैसे Yaman ने उसके मन की थकान पढ़ ली हो।

उसने धीरे-धीरे जवाब टाइप किया—

“पता नहीं।”

मैसेज भेजने के बाद

वह फोन को देखती रही।

कुछ सेकंड बाद जवाब आया—

“अगर चाहें, तो हम बस चुप रह सकते हैं।

बात करना ज़रूरी नहीं।”

यह पढ़ते ही

Priyam की आँखें भर आईं।

“कोई इतना space कैसे दे सकता है?”

उसने सोचा।

उसे पहली बार लगा

कि शायद हर रिश्ता

सवालों से नहीं चलता।

कुछ रिश्ते

सिर्फ मौजूदगी से भी चल जाते हैं।

उसने फोन साइड में रख दिया।

और पहली बार

बिना किसी guilt के

खुद को रोने दिया।

ना खुद को समझाया,

ना रोने से रोका।

बस आँसू बहते रहे…

धीरे-धीरे।

जैसे मन के अंदर जमा हुआ डर

थोड़ा-थोड़ा बाहर निकल रहा हो।

अगली सुबह

वह थोड़ा हल्का महसूस कर रही थी।

जैसे रात

उसके मन का कुछ बोझ अपने साथ ले गई हो।

नाश्ते की मेज़ पर

माँ पहले से बैठी थीं।

उन्होंने Priyam को ध्यान से देखा।

“ठीक हो?”

उन्होंने धीरे से पूछा।

पहले की तरह

सिर्फ सिर हिलाने की जगह

इस बार Priyam ने सच कहा—

“मैं कोशिश कर रही हूँ, माँ।”

माँ कुछ सेकंड उसे देखती रहीं।

फिर बिना कुछ कहे

उन्होंने उसका हाथ हल्के से दबा दिया।

उस छोटे-से स्पर्श में

बहुत सुकून था।

दोपहर में Yaman घर आया।

कोई खास वजह नहीं बताई गई—

बस यूँ ही।

घर में सामान्य बातचीत चल रही थी,

लेकिन Priyam को महसूस हो रहा था

कि उसकी धड़कनें पहले से शांत हैं।

उसने Yaman को देखा।

आज पहली बार

उसे देखकर घबराहट नहीं हुई।

ना ही वह नज़रें चुराना चाहती थी।

कुछ देर बाद

दोनों बालकनी में खड़े थे।

बीच में थोड़ी दूरी थी,

लेकिन असहजता नहीं।

नीचे सड़क पर लोग आ-जा रहे थे।

ऊपर आसमान शांत था।

Yaman ने धीरे से कहा—

“आप पर कोई फैसला थोपना मेरा मकसद नहीं है।”

Priyam ने उसकी तरफ देखा।

“मुझे पता है।”

Yaman कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

“फिर भी…

अगर कभी आपको लगे

कि सब बहुत ज़्यादा हो रहा है,

तो पीछे हटना भी एक सही कदम हो सकता है।”

Priyam ने उसकी बात ध्यान से सुनी।

उसने महसूस किया

कि Yaman उसे रोकने की कोशिश नहीं कर रहा था।

वह उसे चुनने की आज़ादी दे रहा था।

और यही बात

उसके दिल को सबसे ज़्यादा छू रही थी।

कुछ पल बाद

वह धीरे से बोली—

“और अगर पीछे हटते-हटते

हम एक-दूसरे से दूर हो गए तो?”

Yaman ने बिना सोचे जवाब दिया—

“तो शायद वो दूरी ज़रूरी थी।”

उस जवाब में

कोई डर नहीं था।

कोई possessiveness नहीं।

बस सच्चाई थी।

और शायद पहली बार

Priyam को समझ आया—

यह रिश्ता

उसे बाँध नहीं रहा था,

बल्कि उसे सोचने की आज़ादी दे रहा था।

और यही आज़ादी

उसे सबसे ज़्यादा डरा भी रही थी।

क्योंकि अब फैसला

सिर्फ परिवार का नहीं था।

उसका अपना भी था।

हवा थोड़ी और ठंडी हो गई थी।

दोनों कुछ देर

चुपचाप वहीं खड़े रहे।

कोई जल्दबाज़ी नहीं थी।

कोई जवाब माँगा नहीं जा रहा था।

लेकिन उन खामोश पलों में भी

कुछ धीरे-धीरे बदल रहा था।

शायद भरोसा।

शायद अपनापन।

या शायद…

प्यार की शुरुआत।

🌙 Episode 7 यहीं समाप्त होता है.....

ना किसी “हाँ” के साथ,

ना किसी “ना” के साथ—

बस एक सवाल के साथ—

“क्या डर के बावजूद आगे बढ़ना

ही असली हिम्मत होती है?”