जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 9 Priyam Gupta द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

जब रिश्ता प्यार बन जाए. - 9

Episode 9 – वो सच जो कहना ज़रूरी था

 


सुबह की रोशनी कमरे में धीरे-धीरे फैल रही थी।
पर Priyam की आँखें रात से ही खुली थीं।
नींद आई ही नहीं थी।
वह बिस्तर पर चुपचाप लेटी थी,
छत को देखती हुई,
और दिमाग़ में एक ही बात घूम रही थी—
“अब और टालना ठीक नहीं।”
कुछ बातें ऐसी होती हैं
जो जितना दबाओ,
उतनी ही भारी होती जाती हैं।
और Priyam उस वक़्त
ठीक वही महसूस कर रही थी।
नीचे किचन में माँ चाय बना रही थीं।
घर में रोज़ जैसा माहौल था,
पर Priyam को सब कुछ बदला-बदला लग रहा था।
वह चुपचाप जाकर माँ के पास खड़ी हो गई।
“कुछ कहना है?”
माँ ने बिना देखे पूछा।
Priyam कुछ पल चुप रही,
फिर बोली—
“माँ… अगर मैं एक बात कहूँ,
तो आप ग़लत नहीं समझोगी न?”
माँ ने चूल्हा बंद किया
और उसकी तरफ़ मुड़कर देखा।
“जब माँ से पूछना पड़े,
तो समझ लो बात ज़रूरी है,”
उन्होंने हल्के से कहा।
Priyam की आँखें भर आईं।
वे दोनों ड्रॉइंग रूम में आकर बैठ गईं।
घर अभी शांत था।
Priyam ने गहरी साँस ली।
“माँ…
मुझे Yaman से कोई शिकायत नहीं है।
वह अच्छा है… बहुत अच्छा।”
माँ ने ध्यान से सुना।
“पर?”
उन्होंने धीरे से पूछा।
Priyam की आवाज़ थोड़ी काँप गई—
“पर मैं डर रही हूँ।”
माँ चुप रहीं।
“डर इस बात का नहीं
कि वह मुझे समझेगा या नहीं…
डर इस बात का है
कि मैं खुद को फिर से खो न दूँ।”
उसने सिर झुका लिया।
“पहले भी…
मैंने सबकी खुशी के लिए
खुद को पीछे रखा था।
और बाद में…
खुद को पहचान ही नहीं पाई।”
माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“इस बार कोई तुम्हें मजबूर नहीं कर रहा,”
उन्होंने शांत स्वर में कहा।
“डर होना ग़लत नहीं है,
पर सच छुपाना ग़लत हो सकता है।”
Priyam ने सिर हिलाया।
“मुझे Yaman को सब बताना है।”
दोपहर तक वह यही सोचती रही
कि कैसे कहे,
कब कहे।
फोन उठाया,
फिर रख दिया।
फिर उठाया।
आख़िरकार उसने मैसेज किया—
“क्या आज शाम थोड़ी देर बात कर सकते हैं?”
जवाब जल्दी आ गया—
“जब भी आप तैयार हों।”
बस यही लाइन
उसके दिल की धड़कन बढ़ाने के लिए काफ़ी थी।
शाम को दोनों घर के पीछे वाले गार्डन में बैठे थे।
आसमान हल्का गुलाबी था।
हवा में सुकून था।
पर Priyam के अंदर
तूफ़ान चल रहा था।
Yaman ने देखा
कि आज वह कुछ ज़्यादा ही चुप है।
“आप परेशान लग रही हैं,”
उसने धीरे से कहा।
Priyam ने सिर झुकाया।
“मैं…
आज कोई आधी बात नहीं करना चाहती।”
Yaman सीधा बैठ गया।
“तो पूरी बात कीजिए,”
उसने बिना दबाव डाले कहा।
Priyam ने अपनी उँगलियाँ आपस में फँसाईं।
“मैं पहले एक रिश्ते में थी,”
उसने सीधा कहा।
Yaman ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।
बस सुना।
“वहाँ मैंने बहुत समझौते किए।
अपनी पसंद,
अपनी बातें,
अपनी आवाज़।”
उसकी आँखें नम हो गईं।
“और एक दिन मुझे एहसास हुआ
कि मैं उस रिश्ते में होते हुए भी
अकेली हूँ।”
कुछ पल की चुप्पी।
“इसलिए अब…”
वह बोली,
“मुझे डर लगता है कि
कहीं फिर वही न हो जाए।”
Yaman ने धीरे से पूछा—
“क्या आपको मुझसे डर लगता है?”
Priyam ने तुरंत सिर हिला दिया।
“नहीं।
आपसे नहीं।”
उसने उसकी तरफ़ देखा।
“डर इस बात का है
कि मैं फिर चुप न हो जाऊँ।”
Yaman ने गहरी साँस ली।
“मैं चाहता हूँ
कि आप बोलें,”
उसने साफ़ कहा।
“अगर कभी मैं कुछ ऐसा करूँ
जो आपको गलत लगे,
तो आप चुप न रहें।”
Priyam की आँखों से आँसू गिर पड़े।
“और अगर बोलने पर
आप दूर हो गए तो?”
Yaman ने उसकी तरफ़ देखा।
“तो वह रिश्ता
कभी सही था ही नहीं।”
उस जवाब में
कोई रोमांस नहीं था,
पर बहुत सच्चाई थी।
Priyam पहली बार खुलकर रोई।
बिना शर्म,
बिना डर।
Yaman वहीं बैठा रहा।
न उसने छुआ,
न टोका।
बस मौजूद रहा।
जब वह थोड़ी शांत हुई
तो बोली—
“मुझे जल्दी शादी नहीं करनी।”
Yaman ने सिर हिलाया।
“ठीक है।”
“मुझे समय चाहिए।”
“ठीक है।”
“मुझे अपने करियर पर ध्यान देना है।”
“ठीक है।”
Priyam ने हैरानी से देखा।
“आप हर बात पर
‘ठीक है’ क्यों कह रहे हैं?”
Yaman हल्का सा मुस्कुराया।
“क्योंकि ये आपकी ज़िंदगी है।”
वह शाम
कोई फैसला लेकर खत्म नहीं हुई।
पर Priyam के दिल से
एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया।
रात को उसने डायरी खोली
और लिखा—
“आज मैंने खुद के लिए आवाज़ उठाई।”
उधर Yaman अपने कमरे में था।
उसने माँ से बस इतना कहा—
“Priyam को समय चाहिए।”
माँ ने पूछा—
“और तुम्हें?”
Yaman ने बिना सोचे कहा—
“मुझे उसे समझना है।”