Episode 10 – जब रिश्ते इम्तिहान लेने लगते हैं
सुबह का वक़्त था।
घर में वही रोज़मर्रा की आवाज़ें थीं—
बर्तन, पानी, हल्की बातचीत।
लेकिन Priyam के भीतर
कुछ बदला हुआ था।
वह अब भी वही थी,
पर अंदर से थोड़ी मज़बूत।
आज उसने तय कर लिया था
कि चाहे कुछ भी हो,
वह अपनी बात से पीछे नहीं हटेगी।
डाइनिंग टेबल पर सब बैठे थे।
माँ, पापा,
और कुछ रिश्तेदार जो कल ही आए थे।
बात वही घूम-फिर कर
एक ही जगह आ रही थी।
“तो आगे क्या सोचा है?”
एक रिश्तेदार ने पूछा।
कमरे में हल्की-सी चुप्पी छा गई।
Priyam ने माँ की तरफ़ देखा।
माँ ने कुछ नहीं कहा,
बस आँखों से इशारा किया—
बोलो।
Priyam ने गहरी साँस ली।
“अभी कोई तारीख़ तय नहीं हुई है,”
उसने शांति से कहा।
“क्यों?”
दूसरी आवाज़ आई।
“लड़का तो अच्छा है,
परिवार भी ठीक है।”
Priyam ने सिर झुकाया नहीं।
“इसलिए क्योंकि
मुझे थोड़ा समय चाहिए।”
एक रिश्तेदार ने हल्की हँसी के साथ कहा—
“आजकल की लड़कियों को
हर चीज़ में time चाहिए।”
ये बात सीधी दिल पर लगी।
लेकिन Priyam चुप नहीं रही।
“Time माँगना
ना कहना नहीं होता,”
उसने साफ़ कहा।
“ये खुद को समझने का हक़ होता है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
शाम तक ये बात
दोनों परिवारों तक पहुँच गई।
Yaman के घर में भी
चर्चा शुरू हो गई।
उसकी मौसी ने कहा—
“लड़की ज़्यादा सोच रही है।
इतना सोचने से रिश्ते बिगड़ते हैं।”
माँ ने Yaman की तरफ़ देखा।
“तुम क्या सोचते हो?”
Yaman ने शांत स्वर में कहा—
“वह सोच रही है
क्योंकि वह गंभीर है।”
सब उसकी तरफ़ देखने लगे।
“अगर उसे फर्क नहीं पड़ता,
तो वह चुप रह जाती,”
उसने आगे कहा।
“वह बोल रही है,
मतलब वह ईमानदार है।”
मौसी कुछ कहने वाली थीं,
पर माँ ने हाथ उठाकर रोक दिया।
उधर Priyam अपने कमरे में थी।
फोन हाथ में था,
पर दिल भारी।
उसे पता था—
समाज की बातें
धीरे-धीरे दबाव बन जाएँगी।
उसी वक़्त Yaman का मैसेज आया—
“आज जो हो रहा है,
वह आपकी वजह से नहीं है।”
Priyam की आँखें नम हो गईं।
उसने जवाब लिखा—
“मुझे डर है
कि सब आपसे उम्मीद करने लगेंगे।”
कुछ सेकंड बाद जवाब आया—
“उम्मीदें रिश्ते से होनी चाहिए,
आपसे नहीं।”
ये पढ़कर
उसका दिल थोड़ा शांत हुआ।
अगले दिन दोनों परिवारों की
मुलाक़ात तय हुई।
बात साफ़ करनी ज़रूरी थी।
ड्रॉइंग रूम में
सब आमने-सामने बैठे थे।
चाय रखी गई,
पर किसी ने हाथ नहीं लगाया।
Yaman के पापा ने बात शुरू की—
“हम बस ये जानना चाहते हैं
कि देरी किस बात की है।”
Priyam ने खुद बोलने का फैसला किया।
“मैं शादी से डर नहीं रही,”
उसने कहा।
“मैं उस शादी से डर रही हूँ
जिसमें मेरी आवाज़ खो जाए।”
कमरे में सन्नाटा।
उसने आगे कहा—
“मैं Yaman को जानना चाहती हूँ,
पर खुद को भी।”
Yaman ने वहीं कहा—
“और मैं चाहता हूँ
कि वह शादी में आए,
डर के साथ नहीं,
खुद पर भरोसे के साथ।”
सब उसकी तरफ़ देखने लगे।
“अगर इसमें समय लगता है,”
उसने साफ़ कहा,
“तो मैं इंतज़ार कर सकता हूँ।”
ये शब्द
Priyam के लिए नहीं,
परिवार के लिए थे।
थोड़ी देर बहस हुई।
कुछ लोग माने,
कुछ नहीं।
लेकिन आख़िर में
Yaman की माँ बोली—
“अगर रिश्ता निभाना है,
तो शुरुआत समझ से होनी चाहिए।”
ये सुनकर
Priyam की माँ की आँखें भर आईं।
शाम को Priyam और Yaman
छत पर खड़े थे।
हवा ठंडी थी।
Priyam ने धीमे से कहा—
“आप पर दबाव आ रहा है।”
Yaman ने मुस्कुराकर कहा—
“थोड़ा।”
“फिर भी?”
Priyam ने पूछा।
“फिर भी मैं यहीं हूँ,”
उसने जवाब दिया।
Priyam ने पहली बार
हल्की राहत की साँस ली।
“मैं आपको promise नहीं कर सकती
कि सब आसान होगा।”
Yaman ने कहा—
“मैं easy नहीं,
सच्चा रिश्ता चाहता हूँ।”
रात को Priyam ने डायरी में लिखा—
आज लोग बोले,
पर मैं टूटी नहीं।
आज पहली बार
किसी ने मेरा साथ
भीड़ के सामने दिया।
शायद यही शुरुआत है।