मेरी डिग्री बेकार नहीं है Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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मेरी डिग्री बेकार नहीं है





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*मेरी डिग्री बेकार नहीं है 
*लेखिका: डॉ वंदना शर्मा*

वो एक गुनगुनी धूप से सजी सुबह थी। फरवरी माह की महकती सुबह। ठंडी हवाएं शरीर को छूती हुई अच्छी लग रही थीं। धूप अभी इतनी तेज नहीं थी। पक्षी कोई अनोखे स्वर गा रहे थे। सुहानी एक कप कॉफी लेकर अपनी बालकनी में बैठी अपने पौधों को निहार रही थी। गेंदा-गुलाब के फूल महक रहे थे। तुलसी के पौधे से पावन सुगंध आ रही थी। प्रकृति की सुंदरता में खोई सुहानी अपनी अतीत की यादों में चली जाती है।

सुहानी की शादी फरवरी माह में हुई थी। बड़ा उमंग और उल्लास का मौसम होता है। शादी के बाद जब पहली बार ससुराल पहुँची तो दंग रह गई। ना किसी ने आरती उतारी, ना कलश। ना ही दरवाज़े पर कोई स्वागत। सुहानी भोली थी, फिल्मी थी, वो सोच रही थी जैसा फिल्मों में होता है वैसा ही होगा। सुहानी को बड़ा झटका लगा। कैसे लोग हैं ये! जेठानी आई, थोड़ी देर में कार से उतारकर कमरे में ले गई, जहाँ उसकी सास, चाची सास पूजा का सामान तैयार कर रही थीं। सुहानी से दो-चार घंटे पता नहीं कौन सी पूजा करवाई गई। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। इतने भारी दुल्हन के कपड़े उस पर थे। दिन के बारह बज गए थे। किसी ने एक गिलास पानी तक नहीं पूछा। और दूल्हा तो ऐसे गायब था जैसे शादी के सिर से बोझ उतरा हो। दूल्हा अपने रिश्तेदारों की आवभगत में व्यस्त था। दूल्हा तो बस अपने यार-दोस्तों को खुश करने में ही लगा था। लगता है उसके घर वाले उसे प्यार नहीं करते। वो झूठे प्यार की आस में उन लोगों की कठपुतली बन रहता।

पूरा दिन ऐसे ही बीत गया। किसी ने सुहानी से पानी तक नहीं पूछा। सुहानी को रोना आ रहा था। शाम को सात बजे ससुराल वाले उसे पगफेरे की रस्म के लिए मायके ले गए। सास का हुक्म था - एक घंटे से ज्यादा मत रुकना। बस खाना खाकर आ जाना। सुहानी ने खाना भी अपने घर जाकर ही खाया। सुहानी को सही से बात ही नहीं करने दी अपने घरवालों से। खाना खाते ही वापिस ले आए।

अगली सुबह जेठानी ने जल्दी ही उठा दिया और पहली रसोई की रस्म निभाने सुहानी को अकेला छोड़ दिया। पहले दिन से ही सुहानी का शोषण होने लगा। सताने में सबसे आगे उसका पति ही रहता। जैसे ही सुहानी नहाकर निकली थी, उसके पति ने सारे घर के कपड़े लाकर उसके सामने डाल दिए धोने के लिए। जेठानी की चापलूसी करते हुए बोला - आज से सारे कपड़े सुहानी धोएगी, आप आराम करो। 15 लोगों का खानदान था। सबके बर्तन, चौका-बर्तन होते-होते सुहानी रोने लगी। अपने मायके की याद आने लगी। उसे लग रहा था उसके पति ने शादी सिर्फ घरवालों के लिए नौकरानी लाने के लिए की है।

शाम को उसका पति जेठानी और उसके दोनों बेटों को सुहानी के दहेज की गाड़ी में घुमाने ले गया और सुहानी को बर्तन मांजने के लिए छोड़ गया। सुहानी रोती रही। जब उसका पति ही उसका मान नहीं कर रहा तो उसके घरवाले कैसे करेंगे? उन्हें तो फ्री की नौकरानी मिल चुकी थी।

दिन भर सुहानी घर का सारा काम करती। और सोचती रहती, "ईश्वर मेरे साथ ऐसा क्यूँ हुआ? मैं तो बचपन से आपकी भक्त हूँ, कभी किसी का बुरा नहीं किया। सबकी सहायता की, फिर मेरे साथ ऐसा क्यूँ?" और काम करते-करते ईश्वर का नाम लेती रहती।

एक दिन सुहानी की सास को कहीं जाना था, वो सुहानी से उसके गहने पहनने के लिए माँगने लगी। सुहानी ने देने से मना कर दिया तो उसके पति ने उसे खूब मारा।

सुहानी छोटी बहू थी तो उसे सबसे बाद में खाना मिलता। सुबह से दोपहर हो जाती और वो भूखी-प्यासी काम में लगी रहती। लगभग तीन बजे उसे नाश्ता करने का समय मिलता तो बचा-खुचा ही खाकर फिर काम में लग जाती।

सुहानी की आँख में आँसू आ गए ये सब याद कर। वो अपने बेडरूम में जाकर पेंटिंग बनाने लगी। सोचती है शादी से पहले तो वो ऐसी नहीं थी। अन्याय का विरोध करती थी। अब समझ में आने लगा था कि आज भी भारतीय महिलाएँ घरेलू हिंसा व मानसिक शोषण क्यूँ सहती रहती हैं। कुछ बच्चे के लिए मौन हो जाती हैं, कि बच्चे के सिर पर पापा का साया बना रहे। बच्चे के पूर्ण मानसिक विकास के लिए माँ-बाप दोनों के प्यार की जरूरत होती है।

कुछ महिलाएँ मायके से निराश हो अपनी जिंदगी से समझौता कर लेती हैं।

सुहानी के भी एक बेटा था। वो भी उसकी खातिर चुप रहती और ईश्वर का नाम लेती रहती। उसे विश्वास था एक दिन उसका आयेगा जब उसे उसका सम्मान मिलेगा।

धीरे-धीरे सुहानी अपने बेटे को पालने में व्यस्त रहने लगी। वो कुछ कविताएँ, कहानी लिखने लगी। जब उसकी पहली कहानी अखबार में छपी तो बहुत खुश हुई। उसने अपने पति को बताया तो उसने कहा - "कविता लिखने से पेट नहीं भरता। पेट पैसों से भरता है। इतनी डिग्री लेकर तुमने क्या किया। नौकरी करो, पैसे कमाओ। घर पर बेकार पड़ी रहती हो।"

उस रात सुहानी बहुत रोई, रोते-रोते थककर सो गई। अगली सुबह उसने प्रण किया - मैं हार नहीं मानूँगी। मैं कुछ करके दिखाऊँगी। मेरी डिग्री बेकार नहीं है।

सुहानी ने समय निकालकर ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे बच्चे आने लगे और उसने अपना कोचिंग सेंटर खोल लिया। कुछ पैसे बचाकर उसने अपनी एक किताब भी प्रकाशित करा ली। अब उसका बेटा भी बड़ा हो गया। उसका एक सपना था अपने बेटे के साथ पूरे भारत की तीर्थयात्रा करना। सुहानी ने कोचिंग सेंटर पर एक टयूटर राखा और अपने बेटे के साथ तीर्थयात्रा के लिए निकल गई।

——— समाप्त ———

---dr वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi