===========================
वो बचपन बहुत याद आता है
वो मस्ती भरे दिन
वो पीपल की छाँव
वो सखियों का साथ
लाल-परी-नीली परी
पोशम्पा - भाई - पोशम्पा
बोल मेरी मछली कितना पानी
वो नन्हा-सा राजकुमार
वो परियों की कहानी
वो बचपन आज बहुत याद आया
आज तो कैसा सुनापन है
खाली चौपाल, खाली आँगन है
वो नन्हीं चिड़ियाँ भी आज नहीं आयीं
वो नानी का प्यार, वो दादी का दुलार
फिर से पाने को आँख छलक आयी
एक-दूजे के लिए आज वक्त नहीं है
पर नेटफ्रेंड की कमी नहीं है
इस तकनीकी दुनिया ने सबकुछ छीन लिया
नन्हें-मुन्नों से उनका भोला बचपन
और बड़ों से उनका सुख-चैन लिया
फेसबुक और वीडियो गेम ने
दुनिया को तो जोड़ा पर अपनी ही जड़ों से टूट गए हम। डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
मायके की गलियां
आज बस यूं एक ख्याल आया
मैं हूँ अपनी माँ की परछाई
वो ममता भरा साया
ससुराल हो भले ही कितना प्यारा
अवचेतन मन में महकता हमेशा बचपन प्यारा
वो मायके की गलियां, वो शरारतें
साँझ होते ही लग जाती थीं छत पर बैठक
पापा सुनाते हमें अपने संघर्ष के किस्से
पर नटखट बचपन आया हमारे हिस्से
लड़की चाहे बूढ़िया भी हो जाए
मायके की याद ना दिल से जाए
क्योंकि वहाँ वो पापा की राजकुमारी थी
भाइयों की दुलारी थी, जिद्दी थी
बेफिक्र हँसती थी, नये ख्वाब बुनती थी
ना कोई जिम्मेदारी थी,
बस पढ़ना ही एक लाचारी थी
सभी के लिए मायका होता है सुहाना सपना
चाहे बाद में कोई प्यार न करे अपना
एक उम्र के बाद बस यादें रह जाती हैं
मायका शब्द सुनते ही, अधरों पर
मुस्कान आती है
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
==========..
पिता
धरती सी सहनशील माँ है
पिता आकाश से भी ऊँचे
मन तो पिता का भी करता है
खेलूँ अपने बच्चे के साथ
करूँ कुछ मस्ती ,कुछ पागलपन
सिखाऊं कुछ नया साथ रहकर
मारकर अपने मन को वो भविष्यसृष्टा पिता
जाता है अपने काम पर
खटता है रात -दिन ,सुनता है बॉस की
बीमारी में भी करता काम
कभी बयां न किया अपना दर्द
किसी के आगे ,रहता मजबूत
अपने परिवार के आगे. खटता है रात -दिन ,सुनता है बॉस की
बीमारी में भी करता काम
कभी बयां न किया अपना दर्द
किसी के आगे ,रहता मजबूत
अपने परिवार के आगे
थका -हारा घर जब वो लोटे
देख संतान को सोता चैन से
भूल जाता सारे गम ,सारी चिंता
करने पूर्ण बच्चों के सपने ,इच्छाएं
करता है तमाम कोशिशें
दुनिया ने पत्थर दिल कह तो दिया पिता को
पर सूखे आंसू ,दबे जज्बात ना देखे
पूरी ज़िंदगी संघर्ष में हवन कर दी जिसने
उस पिता को शत -शत प्रणाम डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
मैं ऐसी क्यूँ हूँ
मैं ऐसी क्यूँ हूँ
नहीं पसंद है मॉल मुझे
ना ही ऊँची इमारतें
मुझे पसंद है खुला सा आसमां
फूलों की बगिया, चाँद और तारे
हो नदिया का किनारा,
जहाँ झूमे मन आवारा
मैं ऐसी क्यूँ हूँ,
मैं ऐसी क्यूँ हूं
भीड़ से मुझको डर लगता
अकेलापन अच्छा लगता
कभी चहकती चिड़िया सी
कभी शांत जल नदिया का
ना सजना पसंद ना सँवरना पसंद
मुझे मेरे ख्वाबों में बिखरना पसंद
जैसी भी हूँ, खास हूँ
लाजवाब हूँ, अलग हूँ सबसे
सब मेरे अपने हैं और
मैं तन्हा हूँ अपनों में सबसे
किसी का दुःख भी बहुत रुलाए
कोई मीठी याद भी बहुत हँसाए
खोई रहती हूँ यादों में
सुहाने सपने बुनती हूँ
मैं अलग मेरी दुनिया अलग
क्यूँ ऐसा क्यूँ
मैं ऐसी क्यूँ हूँ
कोई तो बताए, मुझको समझाए
मैं ऐसी क्यूँ हूँ
-dr वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
===========.....
Title*: बालकनी
बालकनी
हर घर में होती है
बालकनी
एक ऐसी जगह
जहाँ से खुलती है विचारों की खिड़की
दिखाई देता है सारा आसमां
मिलते हैं मेरे सपनों को पंख
बीतपाने आती है एक नन्ही चिड़िया
दूर पेड़ पर करतब दिखाती नन्ही गिलहरी
एक ऐसी जगह
जहाँ अक्सर आती हैं महिलाएं
अपने केश संवारने
युवा अपने फ़ोन पर बीतपाने
बुजुर्ग अपनी पोतों के किस्से सुनाने
बच्चे आते हैं नयी दुनिया को समझने
कुछ सामान बाहर फेंकते हैं
कुछ अन्दर तोड़फोड़ करते हैं
बालकनी से झाँक - झाँक कर
राहगीरों को आवाज़ लगाते हैं
कभी बन्दर, कभी चिड़िया
जीत - जीत चिल्लाते हैं
एक ऐसी जगह
जहाँ छिपाते हैं कुछ अपने आंसू
मिटाते हैं कुछ अपनी उदासी
जलाते हैं कुछ अपना क्रोध
जब शांत हो जाता है मन
हल्का सा मुस्काते हैं
और बीतपाते हैं
एक कप काफी लेकर
बीतपाती हैं साथ उनके बालकनी - - - ||
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
==============
रम गया मन मेरा भक्ति में
ना रहा यकीन अब किसी शक्ति में
मेरे महादेव बस तुम्ही हो मन में
आस तुम्ही, विश्वास तुम्ही
है समर्पित भाव मेरे, हो आराध्य तुम्ही
टूटने ना देना प्रभु आए भले ही दुःख कितने सही
मेरी किस्मत तुम्हारे हाथ, मेरे खेवैया तुम्ही
इतनी तो कृपा करना भगवान
हर सांस गाए नाम तेरा, हो मंजिल तुम्ही
माता तुम्ही, हो पिता तुम्ही
भ्राता तुम्ही, हो सखा तुम्ही
बनी रहे कृपा आपकी
घड़ी ना आये कोई अब संताप की
पकड़ लो हाथ मेरा, अरदास यही
मेरे महादेव आस तुम्ही, विश्वास तुम्ही
अपनों ने बहुत रुलाया है
बस तुमने मुझे अपनाया है
टूट गई मैं बिखर गई मैं,
अब ना लो और परीक्षा मेरी
अब शरण तुम्हारी हूँ
जीत मेरी लिख दो तुम
दुनिया से मैं हारी हूँ
मेरे महादेव आस तुम्ही, विश्वास तुम्ही
Vandna
===============...=....
मायके की गलियां
आज बस यूं एक ख्याल आया
मैं हूँ अपनी माँ की परछाई
वो ममता भरा साया
ससुराल हो भले ही कितना प्यारा
अवचेतन मन में महकता हमेशा बचपन प्यारा
वो मायके की गलियां, वो शरारतें
साँझ होते ही लग जाती थीं छत पर बैठक
पापा सुनाते हमें अपने संघर्ष के किस्से
पर नटखट बचपन आया हमारे हिस्से
लड़की चाहे बूढ़िया भी हो जाए
मायके की याद ना दिल से जाए
क्योंकि वहाँ वो पापा की राजकुमारी थी
भाइयों की दुलारी थी, जिद्दी थी
बेफिक्र हँसती थी, नये ख्वाब बुनती थी
ना कोई जिम्मेदारी थी,
बस पढ़ना ही एक लाचारी थी
सभी के लिए मायका होता है सुहाना सपना
चाहे बाद में कोई प्यार न करे अपना
एक उम्र के बाद बस यादें रह जाती हैं
मायका शब्द सुनते ही, अधरों पर
मुस्कान आती है
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi