गांव का हीरो महेश Vandna Sharma द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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गांव का हीरो महेश

एक समय की बात है। यूपी के अमरोहा जिले के एक छोटे से गाँव (मोहिदीनपुर) में 15 जनवरी 1953 को महेश नामक बालक का जन्म हुआ। पिता का नाम श्री छोटेलाल शर्मा एवं माता का नाम श्रीमती गुलाब देवी था। श्री छोटे लाल शर्मा की सात संतान थी चार लड़के और तीन लड़कियाँ। महेश अपने पिता की चौथी संतान थे। उस समय पूरे भारत वर्ष में बहुत गरीबी थी। सन 1947 में जब भारत को आजादी मिली, अंग्रेज सब लूट ले गए। रही-सही कसर भारत-पाक बंटवारे के समय गांधी जी ने सारा खजाना पाक को दान कर पूरी कर दी।
महेश का बचपन बहुत ही गरीबी में बीता। सरकारी स्कूल से शिक्षा प्राप्त की। पहनने को सिर्फ दो जोड़ी कपड़े थे। स्कूल भी घर से दस किमी दूर था। उस समय पक्की सड़कें नहीं थी। बरसात में सड़कों पर पानी भर जाता था। महेश के पास एक जोड़ी चप्पल और वो भी टूटी हुई तो पानी से होकर स्कूल जाना था वो भी पैदल। बेचारा चप्पल अपने हाथ में ले लेता और पैर कंधे पर रख लेता। जब तक स्कूल पहुँचता गणित का कालांश खत्म हो चुका होता। सुबह जब घर से निकलता तो पड़ोसी भी चार काम बता देते ।"जब धनौरा जा रहा है मेरा सामान ले आना। इंजन गाड़ी में चढ़ा देना।" बड़ा गबरू जवान था, पहलवानी करता था, कुश्ती में आस-पास के सभी गाँव वालों को पछाड़ रखा था। पूरे इलाके में नाम चलता था। महेश के पिता की कम उम्र में मृत्यु हो गई थी। बड़ा भाई ज्ञानेन्द्र अपनी शादी होने... होते ही न्यारा हो गया था। घर की सारी जिम्मेदारी महेश के कंधों पर आ गई। अपने दो छोटे भाइयों को पढ़ाया, उनकी शादी की और एक छोटी बहन उसको भी पढ़ाया, शादी की। बड़े भाई का फर्ज एक पिता की तरह निभाया। खूब मेहनत की। पिता का सारा कर्ज चुकाया, गाँव में बड़ा सा घर बनवाया, खेती की जमीन खरीदी और अपने भाइयों को दे दी खेती करने के लिए। खुद शहर चला गया नौकरी करने। दिन रात जी-तोड़ मेहनत की। घर की गरीबी दूर की। अपना फर्ज निभाते-निभाते खुद को ही भूल गया।

अक्सर गाँव की चौपालों पर महेश की खुद्दारी और स्वाभिमान की चर्चा होती। गाँव वाले बताते हैं कि महेश बहुत ही खुद्दार और स्वाभिमानी बालक था। रुखी-सूखी रोटी खाकर भी बाहर आकर बोलता "खीर, मलाई खाई है।" घर में आटा ना होने पर पूरा परिवार साग खाकर सोया लेकिन किसी से सहायता नहीं ली। घर के खर्चे चलाने के लिए वह बालक पूरे गाँव के काम करवाता और बदले में अपना परिश्रमिक लेता। एक बार बैल ना होने पर खुद बैल की जगह जुतकर पूरा खेत जोता। एक कुंतल गेहूं की बोरी को तो आसानी से उठाकर हवा में उछाल देता। उसके बड़े भैया-भाभी उसकी कर्मठता व परिश्रम से जलते थे। जब वह स्कूल जाता तो उसकी भाभी साइकिल की हवा निकाल देती या पंचर कर देती।
उसकी जिंदगी में नया मोड़ तब आया जब उसकी शादी कस्बा हल्दौर की लड़की शशि बाला से हुई। सन 1977 में उसकी शादी हुई और उसकी किस्मत बदल गई। महेश की सरकारी नौकरी लग गई। वह आबकारी पुलिस में भर्ती हो गया और फिर उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा कामयाबी की सीढ़ियां चढ़ता गया। महेश की धर्मपत्नी शशि बाला बहुत ही सीधी, सदाचारी व धार्मिक महिला थी। उन्होंने हर परिस्थिति में अपने पति का साथ दिया। उन दोनों के चार बच्चे हुए दो लड़के व दो लड़की। महेश बहुत मेहनती थे। रात-दिन मेहनत करके अपने चारों बच्चों को पढ़ाया उनकी शादी की। सन 2013 में वह पुलिस सेवा से रिटायर हुआ। 3 जनवरी 2013 की शाम उदास सा वह चारपाई पर लेटा अपने सेवाकाल के बारे में सोच रहा था। एक ऐसा आदमी जिसने कभी आराम नहीं किया, दिन-रात काम किया वो भी अपनी शर्तों पर, कभी अपने नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं किया। पूरे बिजनौर शहर में, उसके पैतृक गाँव में उसका नाम चलता था। पूरे खानदान तो क्या गाँव में भी कोई उसकी बात को टाल नहीं सकता था। उसकी बात को कोई काट नहीं सकता था। पूरे जिले में उसका डंका बजता था। सब लोग उसकी तारीफ करते कि उसके घर कोई भी जाए भूखा नहीं लौटा। गाँव से कोई भी आए चाहे कोई भी हो सबकी सहायता करता, खाना खिलाता। किसी का भी मरीज शहर में आता, उसका और उसके परिवार का सारा खाना महेश के घर से जाता। कभी किसी को अपने द्वार से खाली हाथ नहीं लौटाया। बड़े भाई के दोनों बच्चों को अपने पास शहर में पढ़ाया उनकी नौकरी लगवाई।सेवानिवृत्ति के बाद महेश सामाजिक संगठनों से जुड़ गया। सेवाभाव तो उसके खून में था। नियमित योगाभ्यास, स्वअध्ययन, सायंकालीन सैर, ध्यानयोग उसकी दिनचर्या में शामिल थे। चारों बच्चों की अच्छी जगह शादी हुई। लेकिन बुढ़ापे में पति-पत्नी दोनों अकेले रहते थे।
महेश के पास खेती-बाड़ी, बंगला करोड़ों की सम्पत्ति थी जो उसने अपनी दिन-रात की मेहनत से जोड़ी थी। बस एक दुख था दोनों बेटे दूर रहते थे। उनसे वैचारिक मतभेद था। जिस इंसान ने अपनी पूरी जिंदगी दूसरों की सेवा में लगा दी, बच्चों को पढ़ाने के लिए मजदूरों की तरह दिन-रात काम किया, आज वो उसके बच्चे दोष देते हैं किया ही क्या है उनके लिए। वह इंसान टूट जाता है। जिस इंसान के आगे पूरे गाँव वाले कोई नहीं बोल पाता था आज वो अपनी औलाद से हार मान चुका है।
समझ नहीं आता आखिर ऐसा क्यूँ होता है जिन बच्चों को पालने में माँ-बाप अपना पूरा जीवन खर्च कर देते हैं, अपनी पूरी जवानी तबाह कर देते हैं वही बच्चे बड़े होकर अपने माँ-बाप को दुश्मन क्यूँ समझते हैं। बूढ़े माँ-बाप सिर्फ प्यार और सम्मान के दो बोल ही तो चाहते हैं बस।
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi