लॉक डाउन की डायरी Vandna Sharma द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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लॉक डाउन की डायरी



© डॉ वंदना शर्मा, 2026  
प्रथम संस्करण: 2026

सर्वाधिकार सुरक्षित। इस पुस्तक का कोई भी अंश लेखिका की लिखित अनुमति के बिना किसी भी रूप में पुनरुत्पादित नहीं किया जा सकता।  




*प्रस्तावना: वो साल, जो कलम से बचा*  

*24 मार्च 2020, रात 8 बजे।*  
प्रधानमंत्री जी ने कहा - _"आज रात 12 बजे से पूरा देश... 21 दिन के लिए..."_  
TV बंद हुआ। घर के दरवाजे बंद हुए। पर मेरे मन का एक दरवाजा खुल गया।

मैं एक शिक्षिका हूँ। कवयित्री हूँ। माँ हूँ। बेटी हूँ। पत्नी हूँ।  
पर 2020 में सबसे पहले मैं *एक गवाह* बन गई। 

हर शाम आँकड़े आते थे - संक्रमित कितने, मृत्यु कितनी।  
हर सुबह खिड़की से दिखता था - सड़कें कितनी सूनी, आसमान कितना नीला।  
और हर रात डायरी का एक पन्ना भर जाता था - डर से, प्रार्थना से, विद्रोह से, उम्मीद से।

*ये डायरी मैंने नहीं लिखी। 2020 ने मुझसे लिखवाई है।
*"महाकाल"* से शुरू हुई ये यात्रा जब मौत सबसे पास थी।  
*"होली"* पर खत्म हुई जब लगा कि जीवन फिर से लौट आएगा।  
बीच में मजदूर का दर्द है, माँ का आँचल है, तीज का सूना झूला है, बच्चों की किलकारी है, पुरुष की बेबसी है, और स्त्री का संकल्प है।

मैंने तारीख नहीं लिखी। समय का क्रम नहीं रखा।  
क्योंकि 2020 में समय था ही कहाँ? एक दिन, एक साल जैसा लगता था।  
मैंने सिर्फ भाव लिखे। क्योंकि भाव ही सत्य थे।

*ये किताब इतिहास नहीं है। ये अहसास है।*  
सरकारी फाइलें बताएंगी कितने बेड थे, कितनी वैक्सीन लगी।  
ये किताब बताएगी - कितने दिल टूटे, कितनी हिम्मत जगी, कितनी प्रार्थनाएँ आकाश तक पहुँचीं।

अगर आप 2020 में थे, तो ये पन्ने आपके भी हैं।  
अगर आप 2020 के बाद पैदा हुए, तो ये पन्ने आपके लिए हैं - ताकि आप जान सकें कि आपके माता-पिता किस आग से गुजरे थे।

*महाकाल को साक्षी मानकर,*  
*श्री राम को नमन करके,*  
*भारत की मिट्टी को छूकर,*  
मैं ये डायरी दुनिया को सौंप रही हूँ।

*क्योंकि जो लिखा गया, वो बचा लिया गया।*  
*और जो बचा लिया गया, वो अमर हो गया।*

*- डॉ वंदना शर्मा*  
_2020 की एक गवाह_


*अनुक्रम*  

*खंड 1: शिशिर - जब समय थम गया* ... 13  
1. सहसा डर गई मैं ... 15  
2. महाकाल ही सहारा ... 17  
3. अरे मजदूर है बेचारा ... 19  
4. मेरी माँ ... 21  
5. कैसा ये प्रेम ... 23  
6. फासले ... 25  

*खंड 2: हेमंत - जब भीतर से आवाज़ आई* ... 27  
7. राम काज किन्हें बिना ... 29  
8. कभी-कभी ... 31  
9. हरियाली तीज ... 33  
10. परिवार ... 35  
11. अकेला चल ... 37  
12. नैतिकता का पाठ ... 39  
13. संस्कृति ... 41  

*खंड 3: बसंत - जब जीवन लौट आया* ... 43  
14. धिक ताना - धिक ताना ... 45  
15. मायका ... 47  
16. बस यूँ ही ... 49  
17. खास बनाम आम ... 51  
18. बेचारा पुरुष ... 53  
19. बस एक पल ... 55  
20. ये यादों का मौसम ... 57  
21. होली का गीत ... 59  
=======.=.....=





*1. सहसा डर गई मैं* 

इस तरह बिखरी हुई देखकर  
जिन्दगी को एक दिन  
सहसा डर गई मैं  
कोई तो छोर मिले  
क्यों नींद भली लगने लगी  
क्या हकीकत से डरने लगी  
क्यों जिंदगी पहेली हो गई  
अनसुलझी सहेली हो गई  
सब गणित हुए फेल  
बार-बार गिनती रही  
जैसे कोई सवाल उँगली पर गिन-गिन  
कोई तो हल निकालना होगा  
सपना नया बुनना होगा  
नहीं उलझना किसी फंदे में जिन्दगी के  
स्वयं अपना रास्ता चुनना होगा  
पथरीली राहें, कठिन डगर हैं  
संकल्प मेरा भी मजबूत मगर है  
जागी सहसा नींद से  
टूटी झांझर जैसे बजी हो छनछनछन- -

_डॉ वंदना शर्मा_ 

=============.



*आभार*  

उन सभी डॉक्टर, नर्स, पुलिसकर्मी, सफाईकर्मी का  
जो 2020 में मेरे लिए लड़े।  

मेरे परिवार का, जिसने हर कविता पर पहली ताली बजाई।  

और *महाकाल* का,  
जिसने कलम दी, और कागज भी।  

*
===.......…====================
हरीयाली तीज

सावन का महीना, बारिश की फुहार  
सखियों का संग, ठण्डी-ठण्डी चले बयार  
वो रिमझिम बूंदों की झड़ी में पड़े झूले  
वो लोकगीतों की नटखट मस्ती  
घेवर की महक, गुझियों का स्वाद  
वो मेहंदी भरे हाथ, वो सोलह श्रृंगार  
हरी चूड़ियों की खन-खन  
पायलिया की छन-छन, उस पर  
पीहर में बरसता बाबुल का प्यार  
कुछ ऐसा था बरसो पहले  
हमारा प्यारा तीज का त्यौहार  
वक्त ने ली ऐसी अंगड़ाई  
कैसी चली हाय पुरवाई  
ये कहाँ आ गए हम  
ना सखियों का संग  
ना रिमझिम सावन के झूले  
इस आधुनिकता ने तो सारे सुख छीन लिये  
माई तेरा आँगन बहुत याद आता है  
बाबुल तेरा दुलार बहुत याद आता है  
पीहर तेरी गलियाँ बहुत याद आती हैं  
वो मायके की नटखट तीज बहुत याद आती है  
सखियों का चिढ़ाना हरीयाली गाना  
जिंदगी की दौड़ में छूट गया  
बहुत कुछ पीछे  
वो बरसात, वो सावन  
माँ तेरा आँचल  
बहुत याद आता है ।

---

2: परिवार, 

परिवार तो तब होते थे  
दादी-चाची-ताई-बुआ  
सब एक छत के नीचे  
रहते थे, बतियाते थे  
अब तो आलम ये है  
माँ-बाप और बस एक सन्तान  
उस पर हावी ये मोबाइल  
आ गया रिश्तों के बीच  
घर में तीन प्राणी, और  
तीनों ही व्यस्त अपने फोन में  
कैसा समय है ये,  
हाय ये कैसा लगाव  
कहने को तो सारी दुनिया अपनी  
पर सच में तो तन्हाई ही है अपनी  
कहाँ खो गए वो रिश्ते  
कहाँ खो गया वो प्यार  
समय ने ली कैसी करवट  
या हम ही अनदेखी करने लगे  
रिश्तों में लगाव हुआ कम  
ली 'मतलब' ने जगह  
अब तो चेतो मानव !  
क्या कम है चिन्तन के लिए यह वजह !!

---

 3: बचपन*

बड़े होने का बहुत शौक था बचपन में  
बड़े होकर, बचपन बहुत याद आता है  
कितनी उलझनें हैं जिन्दगी में  
कितना मन को मारना पड़ता है  
बड़े होने की इतनी बड़ी कीमत  
आँसू छुपाने पड़ते हैं, हँसकर  
दिल रोये, लबों को मुस्कराना पड़ता है  

वो बचपन कितना प्यारा था  
ना कोई शर्म, ना झिझक, ना संकोच  
खुलकर रोना, हँसना, बेझिझक चिल्लाना  
कभी रूठना, कभी मनाना  
पल में कुट्टी पल में दोस्ती  
पहली बेंच पर बैठने के लिए लड़ना  
वो दोस्त का टिफिन खाना, उसको चिढ़ाना  
वो पहला स्कूल, और पहली स्कूल टीचर  
वो कैंटीन में मस्ती करना  
छुट्टी की घण्टी के बजने का इन्तजार करना  
बारिश में भीगते हुए जाना  
फिर स्कूल टीचर से डाँट खाना  
बारिश में क्या जरूरी था आना  
परीक्षा खत्म होने की खुशी  
जुलाई में वो नई क्लास में आना  
एक रविवार कितना था खास  
उंगली पर दिन गिनते करते इन्तजार  
क्यों हम इतने बड़े हो गए  
बचपन गया है, बचपना नहीं  
फिर से बच्चे बन जाते हैं  
कोई समझाए कितना ही  
हमको समझना नहीं  
क्योंकि वो बचपन फिर से जीना है --
=====================================

---

मन क्यूँ ढूँढता है किसी का साथ  
कभी कोई साथ होकर भी साथ नहीं होता  
प्रेम के लिए किसी के आगे मत गिड़गिड़ाना  
झूठे रिश्तों से बेहतर है, अकेले चलना  
अकेला चलो तो एक बार  
सारा जमाना पीछे आएगा  
जो ढूँढोगे किसी का साथ  
तो अकेला ही रहना पड़ेगा  
आए हैं अकेले दुनिया में  
जाना भी अकेले है  
तो कैसा डर, अकेला चल
==================================
५  

कभी निर्भया, कभी दामिनी  
कभी आसिफा, कभी प्रियंका  
आए दिन बढ़ते अपराध  
बहुत दुःखी हूँ देश के इन हालात से  
इन अपराध को रोकने के लिए  
एक प्रार्थना, एक गुजारिश सभी माँ-बाप से  
माँ-बाप होना स्वयं में  
गौरव की बात है, लेकिन  
ध्यान रहे अपना फर्ज  
परवरिश अच्छी देकर  
व सिखाकर उनको नैतिकता  
बन संतान की स्वयं प्रेरणा  
खिला सकते हैं एक सुन्दर बगिया 
बन जीजाबाई शिवाजी का निर्माण करें  
देश प्रेम, से सींचे बालमन  
नवभारत का निर्माण करें  
सम-भाव, समानता सिखाएं  
माँ-बाप ही आगे आए  
यदि बचाना है अपनी बेटियों को  
तो बेटों को संस्कार सिखाएं --

--- 6:

वह व्यवहार जो पुरानी पीढ़ी को देखकर  
किया जाता है अनुसरण 
कहलाता है परम्परा  
पर क्या उचित है  
किसी विचार या नियम का  
किसी अन्य पर थोपना  
समय के अनुसार  
बदलती हैं परिस्थितियाँ  
बदलता है परिवेश  
तो कैसे रह सकता है नियम एक  
जिन्दगी गीत नहीं है  
जिन्दगी, जीने के लिए है  
किसी की खुशी के लिए झुकना पड़ता है  
कभी बदलना पड़ता है  
जो अनमोल होते हैं रिश्ते
===========


संस्कृति

भारतीय संस्कृति भारत की पहचान है  
भारत हमारा, दुनिया की शान है 


भारतीय संस्कृति भारत की पहचान है  
भारत हमारा, दुनिया की शान है  
सारे जहाँ से अच्छा, भारत महान है  
अतिथि देवों भवः, हमारी संस्कृति  
त्याग, दया, क्षमा, हमारी प्रकृति  
कितनी सुन्दर है मेरे देश की आकृति  
सारे मौसम है यहाँ, भिन्न-भिन्न भाषाएं  
दिल से सब हिन्दुस्तानी, सब एक हैं ।  
हड्डपा मिट गई, सिन्धु मिट गई  
जिसे कोई ना मिटा ना पाया  
वो अमिट, भारतीय संस्कृति नेक है 

---

8: धिक ताना - धिक ताना*

धिक ताना - धिक ताना  
अर्थव है खुशियों का खजाना  
बहिन मेरी माँ बनी आज  
वात्सल्य से भरी आज  
भूल पीड़ा नौ-माह की,  
कितने दर्द सहे, कुछ दिन के लिए  
जान पे खेली, चीरा गया पेट  
पर देख पुत्र की पहली मुस्कान  
सब कष्ट लगे बौने  
वो शिशु का पहला स्पर्श  
पहली किलकारी, पहली अंगड़ाई  
देख हृदय पुलकित, मन रोमांचित  
धीरे से वो आँखिया खोले  
वो नाजुक सा फूल,  
रोता भी है होले होले 
कैसा अद्भुत अनुभव  
अभी तक खुद थे नटखट और शरारती 
अब ये हैं नटखट बच्चे  
आज स्वयं बन माँ-बाप  
सीना गर्व से फूला  
खुशी से मन हुआ बावरा  
निशब्द मन की स्थिति  
हुआ सभी का सपना पूरा  
धिक ताना - धिक ताना  
पिता शब्द का अर्थ  
क्या है माँ का होना  
सही अर्थों में अब है जाना
========......====
: प्रिय अर्थव*

प्रिय अर्थव

अर्थव का आना  
जैसे बहार का आना  
मेरा मौसी बन जाना  
जब गोद में उसको लिया  
रोम-रोम पुलकित हुआ  
नन्हे-नन्हे हाथों में  
मेरी उँगली का फस जाना  
उसका धीरे से यूँ मुस्काना  
जैसे वसन्त का खिलखिलाना  
अर्थव का आना  
जैसे अपूर्णता का पूर्ण हो जाना  
आँखों में वात्सल्य झलक जाना  
मन फिर से बच्चा बनना चाहे  
अपना बचपन फिर याद आना  
बधाई हो मेरी बहन  
अद्भुत है यह अनुभव  
लड़की से माँ का बन जाना  
 =======.......
खास बनाम आम*


एक अनाम लड़की की तरह  
नहीं है इजाजत स्वप्न देखने की मुझे  
और भी बहुत से दायित्व हैं मेरे  
समाज, देश और अपने परिवार के प्रति  
अनेक फर्ज मुझे निभाने हैं  
सिर्फ अपने बारे में तो नहीं  
सोच सकती ना मैं - - -  
बहन, बेटी, पत्नी, शिक्षक - .  
और भी कई रूपों में मेरी  
बनती है जिम्मेदारी  
इन सबसे मुँह मोड़कर  
कैसे मैं देखूं स्वप्न  
अपनी जिन्दगी के  
जो आम होते हुए भी खास है  
और खास होते हुए भी आम है --

---

=========

अचानक से आज एक वायुयान ने  
मचा दी हलचल आकाश में  
बेचैन हो परिंदे उड़ने लगे  
इधर-उधर  
खो दिया अपनी स्वाभाविक चाल को 
हो गए अपने समूह से दूर  
हे निष्ठुर मानव  
क्या जमीन कम लगी तुझे  
धरती पे क्या कम था तेरा आतंक  
कि कर दी दखल तूने परिन्दो के जहाँ में  
कम से कम उन मासूम परिन्दो के  
जहाँ को तो बख्शा होता  
निसन्देह मानव ने प्रगति का इतिहास रचा है !  
पर किस कीमत पर  
कभी क्यूँ नहीं सोचा  
प्रकृति से पंगा न ले मानव  
क्रोघ इसका पचा नहीं पाएगा  
अब भी वक्त है सँभल जा  
धरती को बचा, प्रकृति को सजा

---

(14) बेचारा पुरुष*

क्यों नहीं सोच पाती लड़कियां  
सिर्फ अपने बारे में  
क्यूँ सुख ढूंढती है वो पुरुष की अधीनता में  
क्यूँ चाहिए पुरुष का कन्धा  
दुःख हल्का करने के लिए  
क्यूँ नहीं निकल पाती, इस चक्रव्यूह से  
क्यूँ नहीं नकार देती पुरुषों का अस्तित्व  
क्यूँ हर बार बस  
हारकर ही खुश हो जाती है ?  
ऐसा क्या है जो उन्हें रोके रखता है  
इस भ्रम की दुनिया से बाहर नहीं आने देता  
क्यूँ नहीं एक अलग दुनिया बनाती अपने लिए  
क्यूँ समर्पण में ही वो अपनी जीत समझती है  
एक बार बगावत करके तो देखे  
काँप जायेगी ये दुनिया नारी शक्ति से  
नारी अबला नहीं शक्ति है  
फिर क्यूँ अनजान रहती है खुद से  
जिस दिन नकार दिया नारी ने  
पुरुषों का अस्तित्व  
प्रलय आ जायेगी  
जीवन नष्ट हो जाएगा  
त्राहि त्राहि करता बेचारा पुरुष  
नजर आएगा - -

---
: (10)*

वो गलियां, वो चौराहा  
छोड़े हुए तो अरसा हुआ  
जुम्मा-जुम्मा आठ दिन  
पर ना जाने क्यूँ आज ऐसा लगा  
बरसों बीत गए  
उन गलियों को गुजरे से कभी  
बचपन बीता उन गलियों में  
उन फिजाओं में  
इतनी आसानी से कैसे  
भुलाया जा सकता है  
उन लम्हों को  
जिन्होंने मेरे आज का निर्माण किया  
मेरा व्यक्तित्व बनाया  
मुझे मुझसे मिलाया  
कितनी खूबसूरत होती हैं यादें  
और कितना खूबसूरत लगता है अतीत  
पर, इन यादों में खोकर  
शायद मेरा 'आज' यूँ ही व्यर्थ हो गया  
तो आने वाले कल का निर्माण कैसे होगा  
कल जो बीत गया  
कल जो आने वाला है  
जो जोड़े है दोनों को  
वो है 'आज'  
यादों को अपनी हँसी बनाकर  
आज के संघर्ष से  
आने वाले कल को सजाना है  
ये यादों का मौसम भी कितना दीवाना है - -

---

 (5) होली का गीत*

ठंड यूं शरमाकर गायब हो गई  
जब आया मस्त महीना फाग  
हवा में फैली खुशबू गेसुओं की  
मस्त पपीहों ने छेड़ा राग  
उर्जा और जोश से चहुँ दिशाएं पुलकित  
खिले-खिले बौराए से आम के बाग  
यौवन आया अमलतास पर  
गुलमोहर ने ली अंगड़ाई  
गुलाब क्यों पीछे रहता आखिर  
उसने भी चारों ओर नई छटा बिखराई  
फागुन का मौसम, उसपर ये होली का त्यौहार  
आओ री सखी ! गाओ मंगलाचार - -

---

: (4)*

इस तरह बिखरी हुई देखकर  
जिन्दगी को एक दिन  
सहसा डर गई मैं  
कोई तो ठौर मिले  
क्यों नींद भली लगने लगी  
क्या हकीकत से डरने लगी  
क्यों पहेली हो गई  
अनसुलझी सहेली हो गई  
सब गणित हुए फेल  
बार-बार गिनती रही  
जैसे कोई सवाल उँगली पर गिन-गिन  
कोई तो हल निकालना होगा  
सपना नया बुनना होगा  
नहीं उलझना किसी फन्दे में जिन्दगी के  
स्वयं अपना रास्ता चुनना होगा  
पथरीली राहें, कठिन डगर हैं  
संकल्प मेरा भी मजबूत मगर है  
जागी सहसा नींद से  
टूटी झांझर जैसे बजी हो छन छन छन-
*


*
मेरी माँ मेरी सबसे अच्छी दोस्त है  
मेरे साथ हँसती है, मेरे साथ रोती है  
कोई ना समझे मेरी खामोशी  
वो चुपके से पढ़ लेती है मन की पाती  
उसके प्यारे स्पर्श से, सब बीमारी दूर हो जा  
मेरी माँ मेरी साथी  
मेरे संग-संग वो गाती है  
मैं उसकी परछाई हूँ  
मुझमें वो समाई है  
मेरी खुशी, मेरी जिन्दगी  
माँ मेरी तन्हाई है ।  
मेरी माँ मेरी साथी,  
मुझमें वो समाई है ।

---

जय श्री राम 
राम तुमने जग को सिखलाई मर्यादा  
पर जग सीख ना पाया  
प्यार, मोहब्बत रिश्तों में समर्पण  
सब स्वार्थ व लालच ने लील लिया  
ना अब भरत सा भाई है  
ना रावण जैसा संपन्न वीर  
राम तुम्हारे आदर्शों को  
इस जग ने बिसराया  
अपने संस्कारों को खोया और  
अवसाद, निराशा को पाया  
टूटे परिवार, दुःखी माँ-बाप  
स्वार्थ ही बस इस संतति को भाया  
राम तुमने तो सिखलाई मर्यादा  
पर जग सीख ना पाया  
जय श्री राम ! जय श्री राम
==========...

राम नाम के हीरे-मोती  
मैं बिखराऊँ गली-गली  
ले-ले कोई राम की माला

राम नाम के हीरे-मोती  
मैं बिखराऊँ गली-गली  
ले-ले कोई राम की माला  
रामधुन गाऊँ गली गली  
राम नाम लेने से सभी  
तर जाते हैं नर-नारी  
सारे कष्ट मिट जाते हैं  
पाते खुशियाँ सारी  
राम-नाम में झूमे ऐसे  
संगे-नाचे गली-गली  
राम-नाम के हीरे-मोती  
मैं बिखराऊँ गली-गली  
कर ली मैंने फकीरी मैं  
ना कल की चिन्ता  
ना मुझे अब आज की परवाह 
राम राम सुबह शाम
जय श्री राम 

---


5*
सुनो ! क्या चलोगे  
साथ मेरे ?  
कहीं दूर हसीन वादियों में  
जहाँ चाँद और हो हरियाली  
दूर तलक फैला नील गगन  
कल-कल बहता झरना हो  
चिड़ियों का मीठा कलरव हो  
ठण्डी-ठण्डी मस्त पवन हो  
रिमझिम-महका सा उपवन हो  
हाथों में हाथ तुम्हारा हो  
पास एक नदी का किनारा हो  
अनजान राहें हो और  
दूर हो मंजिल,  
चलें हम-तुम बहकते हुए  
गूँजता मधुर स्वर हमारा हो  
सुनो ! कट जायेगा सफर यूँ  
चलोगे ना ! बस साथ तुम्हारा हो

---

6*
मुझे ऐसा लगता है कि मजदूर शब्द को हमारे समाज ने घृणा अर्थ में लिया है, जबकि आज के समय में हर कारपोरेट कर्मचारी जो अच्छा पैकेज उठाता है, कभी न कभी खुद को मजदूर ही फील करता है।

हर इंसान जो मेहनत करता है  
रात-दिन खटता है परिवार के लिए  
बॉस की डाँट-गालियाँ खाकर भी  
जी सर! जी सर सिर झुकाता है  
मजदूर ही तो है वो हर शख्स  
जो अपने आत्मसम्मान से लड़ता  
किसी तरह अपनी जीविका चलाता है  
आँखों में भविष्य के सपने लिए  
बीते कल को भूलकर रोज काम पे जाता है  

हम मिडिल क्लास वाले हैं जनाब  
सपने आसमां छूने के देखते हैं  
लेकिन महीने का खर्च भी मुश्किल से चल पाता है  
शोषण कल भी था, शोषण आज भी है  
रूप बदल गया, पिसता मजदूर आज भी है  
कभी महंगाई, कभी बीमारी कमर तोड़ देती है  
फिर भी अगले दिन काम पे जाता मजदूर आज भी है।  
उपभोक्तावादी समय में, सब स्वार्थ के रिश्ते हैं  
समय की धूप में तपता मजदूर आज भी है।  


==========...
कभी-कभी

ना जाने क्यों, आवारगी अच्छी लगती है  
अनजानी सड़कों पर यूँ ही घूमना अच्छा लगता है  
बिना वजह  
ना कोई मंजिल, ना मकसद  
बस यूँही बिना वजह सड़कों पर घूमना  
पेड़ों को निहारना,  
कभी-कभी पागलपन अच्छा लगता है  
ना जाने क्यूँ — —  
कैसा अजब मन है  
कैसा अजब मन है, कभी कुछ अच्छा लगता है  
कभी-कभी बोरिंग हो जाती है जिंदगी  
कभी आसमां को यूँ ही निहारना  
कुछ ढूँढना उसमें, कभी दूर खाली क्षितिज को देखना  
कुछ और खो जाना कुछ इन फूलों में, बहारों में  
कभी-कभी अच्छा लगता है, कहीं खो जाना  
फिर ढूँढना अपने आप को और कभी  
अच्छा लगता है बस यूँ ही चलते रहना कि  
रास्ता खत्म ना हो, मंजिल मिले ही ना  
और हम तुम चलते रहें बस यूँ ही हाथों में हाथ डालकर  
सब कुछ बिना वजह तो अच्छा नहीं लगता 
कुछ कारण होता है आवारगी का  
कुछ ख्यालों में खो जाते हैं, कुछ व्यक्त कर देते हैं 
कुछ खामोश हो जाते हैं

---

*
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi