(रात का वक़्त है।
घर के बाहर ठंडी हवा चल रही है।
सिमरन सो रही है — उसके चेहरे पर शांति है।
करण खिड़की के पास खड़ा है, चाँद की तरफ देख रहा है।
अचानक दूर किसी गली से कार की ब्रेक की आवाज़ आती है…)
(करण चौक जाता है)
वो खिड़की से बाहर देखता है — एक काली कार आकर रुकती है।
उसमें से एक आदमी उतरता है — काले सूट में, चेहरे पर हल्की दाढ़ी,
आँखों में ठंडापन… वही चेहरा — CEO अजय मेहरा।
(करण की आँखें सिकुड़ जाती हैं, लाल चमकती हैं।)
करण (धीरे से बुदबुदाते हुए) बोला -
“वो… लौट आया…”
( बाहर, CEO घर के गेट के पास खड़ा है।
उसकी चाल में वही घमंड है, वही अंधकार भरा अहंकार।
वो गेट को छूता है, फिर हल्की हँसी हँसता है।)
CEO (धीरे से) बोला -
“कहा था न सिमरन...
तुम मुझसे भाग नहीं सकती...”
(वो हाथ फैलाता है — हवा में हल्का कंपन होता है।
उसकी आँखों में अब इंसानियत नहीं, कुछ दैत्य जैसा है।
वो दरवाजा खटखटाता है।)
“वो सिर्फ एक इंसान नहीं था अब...
उस रात की मौत ने उसे भी बदल दिया था...”
( करण नीचे जाता है, दरवाज़ा खोलता है।
सामने CEO खड़ा है, मुस्कुरा रहा है, जैसे मौत खुद दरवाज़े पर आई हो।)
करण (गुस्से से) बोला -
“तुम मरे नहीं थे?”
CEO (धीमे, डरावने स्वर में) बोली -
“मरा था... पर मौत ने मुझे लौटाया...
क्योंकि उसे भी मेरी तरह खेल देखना था।
तुम क्या सोच रहे थे कि तुम मुझे धुआं बनाकर मार दोगे।”
(करण आगे बढ़ता है, उसकी आँखें लाल हो जाती हैं।)
करण बोला -
“सिमरन के करीब आने की कोशिश भी की...
तो तुम्हारे जिस्म के टुकड़े हवा में मिल जाएंगे!”
(CEO हल्की हँसी हँसता है, जैसे उसे डर का मज़ा आ रहा हो।)
CEO बोला -
“तुम्हें लगता है तुम अब इंसान बन गए हो करण, भूलो मत तुम भी मेरी तरह ही एक शैतान हो, जो उस लड़की का खून पीने आए हो।...
पर याद रखो — मैं वो अंधेरा हूँ जिसे तुम छोड़ नहीं सकते।”
(करण के कदम अपने आप आगे बढ़ते हैं, हवा भारी होने लगती है।
कमरे की खिड़कियाँ अपने आप खुलने लगती हैं, दीवारों पर साए हिलने लगते हैं।)
“दो राक्षस... जो कभी एक दुनिया में थे,
अब एक और जंग के लिए आमने-सामने थे…”
(अचानक ऊपर कमरे से सिमरन की चीख सुनाई देती है!)
सिमरन (ऊपर से, डरकर) बोली -
“करण जी!!”
(करण पलटकर ऊपर दौड़ता है।
CEO मुस्कुराता है, धीरे से कहता है —)
CEO (धीरे से) बोला -
“वहीं तो मेरा इंतज़ार कर रही थी…”
( सिमरन के कमरे में, खिड़की खुली है।
सिमरन खड़ी है, हवा से उसके बाल उड़ रहे हैं।
वो डर से काँप रही है — पर पीछे कोई परछाईं चल रही है,
जैसे कोई उसका पीछा कर रहा हो…)
(ऊपर कमरे का दरवाज़ा ज़ोर से खुलता है।
करण अंदर घुसता है — सिमरन खिड़की के पास खड़ी है,
उसकी आँखें आधी बंद हैं, जैसे किसी नींद में चल रही हो।)
करण (घबराकर) बोला -
“सिमरन! क्या हुआ तुम्हें?”
(वो उसके पास जाता है — पर सिमरन की की आंखों की पुतलियां अब लाल हैं,
वो उसकी तरफ देखती है, चेहरा बिल्कुल ख़ाली।)
सिमरन (अजीब, टूटी हुई आवाज़ में) बोला -
“करण जी… वो आया है… वो.. वो मेरे अंदर है…”
(करण एकदम पीछे हटता है।
उसके पीछे से हवा का झोंका आता है, और हवा में CEO की हँसी गूंजती है।)
CEO (अदृश्य आवाज़ में) बोला -
“देखा करण...
जिसे तुम सबसे ज़्यादा प्यार करते हो...
वो अब मेरा रास्ता बन गई है…”
(करण गुस्से से काँप उठता है, उसकी आँखें लाल चमकने लगती हैं।)
करण (चीखकर) बोला -
“निकल जाओ उसकी देह से, अजय!
वरना तुम्हारी राख भी पहचान में नहीं आएगी!
तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे शिकार को हथियाने की!”
(कमरा हिलने लगता है, परदे उड़ते हैं।
सिमरन की देह काँपती है — उसके होंठ हिलते हैं,
पर आवाज़ CEO की आती है।)
सिमरन (डरावनी आवाज़ में) बोली -
"तुम क्या सोचते हो तुम शैतान से बड़े हो?...
तुम तो बस एक अधूरी रूह हो… जो इंसानियत के लिए रो पड़ी…
तुम तो इंसान भी नहीं हो....”
(करण गुस्से में दाँत भींचता है, वो अपने दोनों हाथ फैलाता है।
उसकी आँखों से लाल रोशनी निकलती है।)
“ये अब तन की नहीं... मन की जंग थी...
जहाँ एक का प्यार था... और दूसरे की नफ़रत…”
(सिमरन काँपती हुई करण की ओर बढ़ती है —
वो उसकी गर्दन पकड़ती है, पर उसकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं।
CEO की शक्ति उसके अंदर है, पर सिमरन उससे लड़ रही है।)
सिमरन (रोते हुए, अंदर से आवाज़ निकालते हुए) बोली -
“करण जी... मुझे बचा लीजिए... मैं कंट्रोल नहीं कर पा रही। बहुत दर्द हो रहा है।”
(करण तुरंत उसका चेहरा पकड़ता है, आँखें बंद कर लेता है।)
करण (जोश में) बोला -
“तुम अकेली नहीं हो सिमरन...
तुम्हारे अंदर का डर अब मेरा है!”
(करण ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ जाता है,
दोनों के चारों ओर लाल और नीली रोशनी घूमने लगती है।
हवा तूफ़ान की तरह तेज़ हो जाती है।)
CEO (गुस्से से) बोला -
“तुम मुझे नहीं हरा सकते करण!
मैं वो पाप हूँ... जो तुमसे पैदा हुआ था!”
करण (गरजकर) बोला -
“और मैं वो शैतान हूँ...
जो सिमरन के प्यार से ज़िंदा है!!”
(अचानक एक तेज़ प्रकाश फैलता है —
CEO की परछाईं सिमरन के शरीर से निकलकर ज़मीन पर गिरती है।
वो दर्द से चिल्लाता है — “आआआर्घ्ह्ह्ह!!!”
हवा रुक जाती है।)
(सिमरन ज़मीन पर गिर जाती है — करण उसे संभालता है।
उसकी साँसें चल रही हैं… वो होश में आती है।)
सिमरन (धीरे से) बोली -
“वो चला गया क्या?... करण जी...?”
करण (थके हुए स्वर में) बोला -
“हाँ सिमरन... अब वो कभी नहीं लौटेगा।”
(वो सिमरन को अपनी बाहों में उठा लेता है।
दोनों के चेहरों पर थकान, पर सुकून है।)
“कभी-कभी, शैतान को हराने के लिए
इंसान का एक आँसू ही काफी होता है…”
( दूर से मंदिर की घंटी की आवाज़ आती है।)
(सुबह का वक्त है।
सूरज की हल्की किरणें करण और सिमरन के घर में पड़ रही हैं।
सिमरन बालकनी में खड़ी है, उसकी आँखें दूर आसमान की ओर हैं
चेहरे पर शांति तो है, पर भीतर कोई बेचैनी।)
सिमरन (धीरे से, खुद से) बोली -
“इतनी शांति... जैसे तूफ़ान से पहले का सन्नाटा...”
(पीछे से करण आता है, उसके कंधे पर हाथ रखता है।)
करण (मुस्कुराकर) बोला -
“अब सब ठीक है सिमरन... वो लोग, वो परछाइयाँ... सब खत्म हो गए।”
(सिमरन मुस्कुराने की कोशिश करती है, लेकिन उसकी आँखों में कहीं गहराई में डर है।)
सिमरन (धीरे से) बोली -
“पर करण जी... कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे कोई हमें देख रहा हो...”
(करण उसका चेहरा अपने हाथों में लेता है।)
करण बोला -
“वो बस तुम्हारे मन का वहम है... अब हम इंसानों की ज़िंदगी जिएँगे
बिना खून, बिना डर... बस प्यार।”
(दोनों गले लगते हैं।
पर तभी बाहर से अचानक एक ठंडी हवा का झोंका आता है —
इतना ठंडा कि कमरे की मोमबत्ती अपने आप बुझ जाती है।)
(सिमरन सिहर उठती है। हवा के साथ जैसे कोई फुसफुसाहट आती है —)
हवा में आवाज़ (धीरे से) बोली -
“वो लौटी है... वो लौटी है...”
(सिमरन चौक जाती है, करण तुरंत बाहर की ओर बढ़ता है।
बाहर पेड़ों के पत्ते तेजी से हिल रहे हैं, मानो हवा में कोई अदृश्य उपस्थिति हो।)
करण (तेज़ आवाज़ में) बोला -
“कौन है वहाँ? सामने आओ!”
(हवा रुक जाती है।
पर जमीन पर एक पुराना आसमानी रंग का दुपट्टा उड़कर करण के पैरों में आ गिरता है।
सिमरन उसे देखती है — उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं।)
सिमरन (काँपती आवाज़ में) बोली -
“ये... ये वही दुपट्टा है... जो मैंने उस रात पहना था... जब...”
(करण तुरंत दुपट्टा उठाता है —
दुपट्टे पर कुछ सूखे खून के निशान हैं... और उस पर लिखा है — “मैं लौटी नहीं... मैं रुकी थी।”)
(सिमरन पीछे हटती है, उसके शरीर में कंपकंपी दौड़ जाती है।
करण की आँखें चौड़ी हो जाती हैं, उसकी साँसें भारी।)
“हवाएँ अजनबी थीं... पर संदेश पहचान का था...
जो अतीत में दबा था... अब फिर लौटने लगा था…”
(धीरे-धीरे आसमान में काले बादल छा जाते हैं।
बिजली की गड़गड़ाहट सुनाई देती है।
सिमरन करण के पास भागकर आती है —)
सिमरन (डरते हुए) बोली -
“करण जी... ये सब क्या है?... क्या वो फिर लौट आई?”
(करण उसकी आँखों में देखता है — फिर धीरे से फुसफुसाता है)
करण बोला -
“नहीं सिमरन... वो नहीं...
कोई और है... कोई जो हवाओं के साथ आया है…”
पृष्ठभूमि में हवाओं की गूंज और मंदिर की घंटी की धीमी आवाज़ मिलकर
एक डरावना संगीत बना देती है।)