में और मेरे अहसास - 152 Dr Darshita Babubhai Shah द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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में और मेरे अहसास - 152

झील सी आँखों 

झील सी आँखों की गहराई में डूब गये हैं l

धड़कती सांसों की गहराई में डूब गये हैं ll

 

कातिल नजरों वाले की चिकनी चुपड़ी सी l

प्यारी सी बातों की गहराई में डूब गये हैं ll

 

जगमगाते सितारों से भरे आसमान की l

शीत चांदनी रातो की गहराई में डूब गये हैं ll

 

गहरी सी उल्फ़त ने कही का ना छोड़ा है l

नशेमन की यादों की गहराई में डूब गये हैं ll

 

दिल फेंक के वफ़ा का दम भरा है उसी के ही l

शिद्दत से किए वादों की गहराई में डूब गये हैं ll

११-५-२०२६ 

जुबाँ तक पहुंची  

प्यार है आँखों में साफ़ दिखाई देता हैं l

बारहा एसा कुछ नहीं है सफाई देता हैं ll

 

दिल में छुपी हुईं बात जुबाँ तक पहुंची l

चले आओ चले आओ सुनाई देता हैं ll

 

वादा करते है ताउम्र साथ निभाएंगे l

मोहब्बत की क़सम देकर दुहाई देता हैं ll

 

नजरों के वार करके घायल तो किया है l

निगाहों से जाम पर जाम पिलाई देता हैं ll

 

अदाओं को देखकर भरता नहीं है ये दिल l

संजीदगी बात में मुस्कुराना हिलाई देता हैं ll

१२-५-२०२६ 

ओढ़नी 

रूप यौवन को क़ातिल नजरों से बचाती ओढ़नी l

परिधान और परिवेश साथ तन सजाती 

ओढ़नी ll

 

हर स्त्री की शोभा और ममता का आँचल 

होती है l

सुन्दर मनमोहक रंगीली चार चांद लगाती 

ओढ़नी ll

 

वस्त्रा भूषण को शोभायमान बढ़ाकर रूप 

निखार के l

सुंदरता को ओर भी खूबसूरत है बनाती 

ओढ़नी ll

 

अंगों को ढंकर लोलुपता के बचाकर गरिमा 

में रख l

तीखी निगाहों के वार को सरहद्द बताती 

ओढ़नी ll

 

अच्छे परिधान सज्जित होकर अस्मिता

को बचा l

सम्मान,आदर और विवेक बुद्धि बढ़ाती

ओढ़नी ll

१३-५-२०२६ 

एक मुलाकात 

नशीली सी एक मुलाकात कब होगी बताओं तो l

मिलने का वादा किया है तो अभी निभाओ तो ll

 

घुमाफिरा के ना कहना जो है सीधी बात करना 

l

बात दिल की कह देने का हौसला जुटाओ तो 

ll

 

रात में आओ पर दिन के उजालों में जाना होगा l

धड़कनों ने क़सम दी है गर छोड़ कर जाओ तो ll

 

इतने भी नाजुक नहीं हो के क़त्ल हो जाओगे l

एक बार आकर बेशुमार जलवों को उठाओ तो ll

 

चाहे थोड़ी देर ही सही लेकिन खुद को साथ लाना l

प्यार के रंगी रंगों से सुबहशाम को सजाओ तो 

ll

१४-५-२०२६ 

रूह का साया

रूह का साया भटकता फिरता है राहों में l

दीदार के लिए तड़पता फिरता है राहों में ll

 

उम्र गुज़र गई खुशी का इंतजार करते हुए l

निगहबानी को मचलता फिरता है राहों में ll

 

दिन तो कट जाता है खयालों में फिर रात को l

ख्वाबों मे दिल बहलाता फिरता है राहों में ll

 

एक अर्सा हो गया है ढूँढते हुए प्यारे लम्हे को l

सखी धडकनों से छलकता फिरता है राहों में ll

 

य़ह कुरबतें इन्तिहाँ लेकर जान निकालती कि l

हुस्न के जलवों को तरसता फिरता है राहों में ll

१५-५-२०२६ 

माँ गंगा

माँ गंगा की गोद में नहाकर पावन हो जाऊँ l

मन वचन कर्म को बहाकर पावन हो जाऊँ ll

 

बहती धारा में बहता जाऊँ दूर दूर तक और l

होशो हवास सब उड़ाकर पावन हो जाऊँ ll

 

युगों की थकान मिटाके धन्यता प्राप्त करके l

मन से पापो का मेल मिटाकर पावन हो जाऊँ ll

 

भारतवर्ष का पोषण करती विधाता है गंगा l

शीतल लहरों में समाकर पावन हो जाऊँ ll

 

केवल नदी नहीं संस्कार औ मुक्ति के द्वार की l

पवित्रता में डुबकी लगाकर पावन हो जाऊँ ll

१६-५-२०२६ 

 

रोज दोस्तों से मिलने की जरूरत क्या है l

यूँ किसी वास्ते निकलने की जरूरत क्या है ll

 

पागलों जैसे ही घूमते रहते हो शहरों में l

आम लोगों से उलझने की जरूरत क्या है ll

 

खुद को तो शृंगार करके खूबसूरत कर लो l

आईना फ़िर से सजाने की जरूरत क्या है ll

 

लब्जों की दीवार कैसे भी गिराना मत l

रूठे हुए को मनाने की जरूरत क्या है ll

 

जाने वालों को जरूरी है बस जाने देना l

बारहा ऐसे तड़पने की जरूरत क्या है l

१७-५-२०२६ 

रोटी 

रोटी की है धमाल सारी l

पेट की भूख कमाल सारी ll

 

कोई मुफ्त में नहीं खिलाता l

ताउम्र होती बबाल सारी ll

 

दो रोटी के वास्ते दो घण्टे l

बैठी रहती है पंडाल सारी ll

 

जिंदगी भर मेहनत करो कि l

पापी पेट की जंजाल सारी ll

 

कभी न बुझने वाली तन में l

हमेशा जलती मशाल सारी ll

 

भूखे तन और मन दोनों देख l

रह जाती है मलाल सारी ll

 

जहां एक भी न मिले वहां l

दिखती प्रजा कंकाल सारी ll

१८ -५-२०२६ 

हरियाली 

बागों की हरियाली में चिडियों बन चहकने को जी चाहता हैं l

फूलों की खुशबु, रंगीन तितली देख बहकने को 

जी चाहता हैं ll

 

प्रकृति की खूबसूरती और सुन्दरता देख मन 

प्रफुल्लित हो l

सावन की रितु में कोयल की तरह टहुकने को 

जी चाहता हैं ll

 

चहु ओर सभी जीवो की प्यास बुझाने के लिए 

दिल खोलके l

रिमझिम बूँदों की बारिस बनकर बरसने को 

जी चाहता हैं l

 

नव पल्लवीत संसार को मनभावन रंगो से 

उभरता देखके l

बहती कलकल सरिता में समाकर छलकने को 

जी चाहता हैं ll

 

झरनों का लयबध्द संगीत में झुम झूम नाचते 

हुए सखी l

सौगी मिट्टी की खुशबु से साँस को महकने को 

जी चाहता हैं ll

१९-५-२०२६ 

अकेलापन 

अकेलेपन का रूतबा निराला होता हैं l

अपनेआप से राब्ता निभाना होता हैं ll

 

कोई किसी को देखने के लिए राजी नहीं l

खुद के लिए खुद को सजाना होता हैं ll

 

चैन और सुकून की दुनिया अच्छी है l

दिल को ललचा कर मनाना होता हैं ll

 

मतलबी औ बहुरंगी जोकर दुनिया में l

आईने से दिल को लगाना होता हैं ll

 

रिश्तों में अपनापन रहा ही नहीं तो l

खुद का अलग ही ज़माना होता हैं ll

 

कोई क्या किसीको दे सकता है भला l

अपनेआप बेह्तरीन रचाना होता हैं ll

 

सदा ही होठों पे मुस्कान सजाये हुए l

हौसलों से डर को हराना होता हैं ll 

२०-५-२०२६