शाम का समय था। घर के बाहर गली में बच्चों की आवाज़ें आ रही थीं, लेकिन रवीना के घर के अंदर माहौल थोड़ा भारी था।
रसोई में माँ और कोई औरत बैठी बात कर रही थीं। रवीना अंदर आकर चुपचाप पानी रखने लगी।
औरत— तो काजल की बात आगे बढ़ी?
माँ ने हल्की सी हँसी में बात टालने की कोशिश की—
क्या बताएं दीदी पहले बड़ी वाली बैठी है कौन करेगा छोटी की शादी
रवीना के हाथ वहीं रुक गए। उसने सिर झुका लिया
औरत— अरे आजकल तो लोग छोटी की भी कर देते हैं
माँ— हमारे यहाँ इतना आसान नहीं है लोग सीधे पूछते हैं बड़ी क्यों बैठी है
कुछ पल की खामोशी हुई माँ ने धीरे से, लेकिन साफ़ आवाज़ में कहा— अब हर जगह जाकर समझाएँ क्या कि लड़की थोड़ी ऐसी है
वो “ऐसी” शब्द हवा में अटक गया रवीना ने बिना कुछ बोले पानी रखा और वहाँ से निकल गई
रात को खाना खाते वक्त फिर वही बात शुरू हो गई
माँ— आज शर्मा जी का फोन आया था उन्होंने मना कर दिया
पिता ने शांत आवाज़ में पूछा— “क्यों?”
माँ— वही लड़के वालों को लड़की पसंद नहीं आई
काजल चुप बैठी थी उसने एक बार रवीना की तरफ देखा, फिर नजरें झुका लीं
माँ— कब तक ऐसे चलेगा? एक की वजह से दूसरी भी बैठी रहे
इस बार बात सीधी थी रवीना ने रोटी तोड़ते हुए हाथ रोक दिए लेकिन कुछ नहीं बोली
पिता— बस करो, खाना खा रहे हैं
माँ— आपको तो हमेशा मेरी बात गलत ही लगती है
पिता चुप हो गए उस रात रवीना देर तक सो नहीं पाई।
छत को देखते हुए उसे वही बातें बार-बार याद आ रही थीं
“लड़की पसंद नहीं आई”
“बड़ी बैठी है”
“ऐसी है”
उसने करवट बदली आँखें बंद कीं लेकिन नींद नहीं आई
वो रोई नहीं, बस चुप रही जैसे हमेशा रहती है
उधर, तुषार के घर में भी माहौल कुछ अलग नहीं था
रात का खाना खत्म हो चुका था सब अपने-अपने काम में लगे थे
पिता ने धीरे से कहा— तुषार, एक बात करनी थी
तुषार— जी बोलिए
पिता— अब तुम्हारी शादी के बारे में सोचना चाहिए
तुषार चुप रहा
माँ ने भी वहीं से कहा— दो-तीन जगह बात चल रही है इस बार मना मत करना हर बार मना कर देता है
तुषार ने धीमे से कहा— अभी ज़रूरी है क्या ?
पिता— ज़रूरी है उम्र भी हो रही है और घर में भी सब settle होना चाहिए
पिता— देखो बेटा, हम जबरदस्ती नहीं कर रहे पर हर बार टालना भी ठीक नहीं है मेरी उम्र भी होती जा रही है मैं तो बस दवाइयों पर जिंदा हुँ
तुषार ने सिर झुका लिया— मुझे अभी नहीं करनी है सादी
ये वही जवाब था जो वो हर बार देता था रात को अपने कमरे में, तुषार बिस्तर पर बैठा था
उसके दिमाग में अलग ही बातें चल रही थीं—
“क्या वो किसी के साथ ठीक रह पाएगा?”
“क्या वो खुद को संभाल पाया है?”
“क्या वो किसी और की जिम्मेदारी ले सकता है?”
उसे जवाब नहीं पता था अगले दिन…
स्कूल में रवीना क्लास ले रही थी, लेकिन आज उसका ध्यान बार-बार भटक रहा था
एक बच्चे ने पूछा—
मैम, ये कैसे होगा ?
रवीना कुछ सेकंड चुप रही फिर समझाने लगी बाहर से देखने पर सब normal था अंदर कुछ भी normal नहीं था
स्टाफ रूम में माही ने उसे देखा—
माही— क्या हुआ…?
रवीना— घर पर फिर वही
माही कुछ देर चुप रही— शादी का प्रेशर?
रवीना ने सिर हिला दिया।
माही— तू क्या चाहती है?
रवीना ने पहली बार बिना सोचे जवाब दिया— मुझे नहीं पता
रात का समय था तुषार घर पहुँचा तो ड्राइंग रूम में टीवी तेज़ आवाज़ में चल रहा था
उसका छोटा भाई रोहन सोफे पर पैर फैलाकर बैठा था, मोबाइल हाथ में था। बहन नेहा उसके बगल में बैठी थी
तुषार चुपचाप अंदर आया और बैग एक तरफ रख दिया
रोहन ने बिना उसकी तरफ देखे कहा— तुषार आते हुए मेरा recharge करवाया कि फिर भूल गया?
तुषार— करवा दिया
रोहन— हूँ ठीक है, इस बार याद रहा
नेहा ने बीच में कहा— और मेरे notes?
तुषार— कल मिल जाएँगे
नेहा— हर बार ‘कल’ एक काम ढंग से नहीं होता
उसकी आवाज़ सीधी थी, लेकिन उसमें respect नहीं था
तुषार ने कुछ नहीं कहा
रसोई में माँ—सुशीला—खड़ी थी तुषार अंदर गया और पैसे उनके सामने रख दिए
तुषार— माँ ये इस महीने के
सुशीला ने पैसे लिए, गिने भी नहीं बस अलमारी में रख दिए
तुषार कुछ सेकंड वहीं खड़ा रहा फिर वापस मुड़ गया
पिता—महेश—कुर्सी पर बैठे अखबार देख रहे थे
महेश— आ गए बेटा?
तुषार— जी
महेश— थके हुए लग रहे हो
तुषार— ठीक हूँ
महेश ने कुछ कहना चाहा फिर चुप हो गए खाना लग चुका था सब लोग टेबल पर बैठ गए
रोहन— मम्मी, आज फिर वही सब्जी कुछ अच्छा नहीं बनता क्या घर में?
सुशीला— जो है वही खाओ
नेहा— अगर कोई थोड़ा extra कमा ले तो शायद अच्छा भी बन जाए
ये सुनकर रोहन हँस दिया— सही बोल रही है
तुषार के हाथ रोटी तोड़ते हुए रुक गए लेकिन उसने सिर नहीं उठाया
महेश ने हल्के से डाँटा— ज्यादा बोलने की जरूरत नहीं है वो पहले ही
रोहन— अरे मैं तो मजाक कर रहा हूँ
लेकिन वो मजाक नहीं था
कुछ देर बाद, महेश ने बात शुरू की—
महेश— तुषार, एक रिश्ता आया है देख लेना चाहिए
रोहन तुरंत बोल पड़ा— पहले खुद को तो देख ले फिर शादी करेगा
नेहा— कौन हाँ करेगा वैसे भी
दोनों हँस पड़े
महेश— बस करो तुम लोग
तुषार चुपचाप खाना खाता रहा
महेश— मैं सीरियस हूँ बेटा इस बार मना मत करना
तुषार— देख लूँगा
रोहन— हर बार यही बोलता है—‘देख लूँगा’ कुछ करता नहीं है
नेहा— हाँ, बस घर चलाने की मशीन बनकर रह गया है
इस बार तुषार ने हल्का सा सिर उठाया… जैसे कुछ बोलना चाहता हो लेकिन फिर वापस नीचे देख लिया
“मैं देख लूँगा,” उसने फिर से वही कहा
खाना खत्म करके वो अपने कमरे में चला गया।
दरवाज़ा बंद किया और कुछ सेकंड तक वहीं खड़ा रहा।
बाहर से अब भी रोहन और नेहा की हँसी की आवाज़ आ रही थी। उसने धीरे से बैग रखा और बिस्तर पर बैठ गया।
उसके चेहरे पर गुस्सा नहीं था बस थकान थी।
जैसे वो लड़ने की कोशिश भी नहीं करता अब
उधर, उसी समय रवीना अपने कमरे में बैठी थी
बाहर माँ फिर किसी से फोन पर बात कर रही थी
हाँ बड़ी वाली की वजह से ही दिक्कत हो रही है
रवीना ने दरवाज़ा बंद कर लिया
दो अलग घर
दो अलग हालात
लेकिन एक बात common थी—
दोनों ही अपने-अपने घर में अपनी जगह होते हुए भी बाहर जैसे थे जारी रहेगा