ज्वेलरी शॉप से बाहर निकलते-निकलते शाम ढलने लगी थी। दिन भर की भागदौड़ के बाद दोनों परिवारों के चेहरों पर थकान साफ़ दिख रही थी, लेकिन साथ ही एक अजीब-सी औपचारिक संतुष्टि भी थी—जैसे एक और ज़रूरी काम निपट गया हो।
महेश ने बाहर खड़े होकर सबको देखा, “चलो, सामने होटल में बैठकर कुछ खा लेते हैं, फिर निकलेंगे”
किसी ने मना नहीं किया रेस्टोरेंट ज़्यादा बड़ा नहीं था, लेकिन साफ-सुथरा था सब लोग एक लंबी टेबल पर बैठ गए। बैठने की व्यवस्था अपने-आप बन गई—बड़े लोग एक तरफ, और बीच में तुषार और रवीना कुछ मिनट तक सिर्फ पानी के गिलास खनकने की आवाज़ें आती रहीं।
वेटर मेन्यू रखकर चला गया।
“क्या लोगे?” महेश ने सबकी तरफ देखते हुए पूछा।
ऑर्डर धीरे-धीरे तय होने लगा—डोसा, थाली, कुछ नॉर्मल डिशेस बीच-बीच में पायल की नजर रवीना पर टिक जाती वो कुछ नहीं कह रही थी, लेकिन उसका चेहरा ही काफी था यह दिखाने के लिए कि वह अब भी इस रिश्ते से खुश नहीं है।
उधर सरोज बार-बार यह देखने की कोशिश कर रही थीं कि तुषार का व्यवहार कैसा है—वो बोलता कितना है, कैसे बैठा है।
तुषार ने पूरा समय चुप रहकर ही बिताया। बस जब वेटर ने उससे पूछा, “सर, आपके लिए?” तो उसने धीरे से कहा, “जो सबके लिए आ रहा है, वही।”
रवीना ने यह सुना और हल्का सा देखा उसे समझ आयाये चुप्पी बनावटी नहीं है, ये उसकी आदत है खाना आने में थोड़ा समय था इसी बीच, टेबल के नीचे रवीना के हाथ हल्के से आपस में उलझे हुए थे वह बार-बार कुछ सोचती, फिर छोड़ देती
आखिर उसने धीमे से कहा, इतना कि सिर्फ तुषार सुन सके, “आप हमेशा ऐसे ही रहते हैं?”
तुषार ने पहले तो समझा ही नहीं कि उससे पूछा गया है फिर उसने उसकी तरफ देखा, “मतलब?”
“इतना चुप,” रवीना ने शब्द ढूंढते हुए कहा
तुषार ने कुछ सेकंड सोचा, फिर सीधा जवाब दिया, “ज्यादातर”
“स्कूल में भी ऐसे ही थे,” रवीना ने हल्के से कहा
तुषार थोड़ा चौंका, “आपने नोटिस किया था?”
“हाँ,” उसने बिना मुस्कुराए कहा, “आपने नहीं किया होगा।”
तुषार ने सिर झुका लिया, “शायद नहीं।”
दोनों के बीच फिर थोड़ी चुप्पी आ गई लेकिन इस बार वो असहज नहीं थी थोड़ी देर बाद खाना आ गया और सब लोग उसमें लग गए बीच-बीच में महेश और रवीना के पिता शादी की तारीख, समय और बाकी व्यवस्थाओं पर बात करते रहे। सब कुछ बहुत सीधा था—कोई बड़ी मांग नहीं, कोई दिखावा नहीं।
खाने के दौरान एक छोटा सा पल आया जब वेटर ने गलती से सांभर गिरा दिया, थोड़ा सा रवीना के हाथ पर भी छिटक गया।
“सॉरी मैडम!” वेटर घबरा गया।
रवीना ने तुरंत कहा, “कोई बात नहीं,” और अपने दुपट्टे से हाथ साफ करने लगी तभी तुषार ने बिना कुछ कहे टेबल पर रखे टिशू उसकी तरफ सरका दिए
रवीना ने उसकी तरफ देखा, “थैंक यू”
तुषार ने बस हल्का सा सिर हिला दिया छोटा सा काम था लेकिन किसी ने पहली बार बिना बोले उसकी तरफ ध्यान दिया था खाना खत्म होने के बाद सब बाहर आए
अब विदा लेने का समय था महेश ने रवीना के पिता से हाथ मिलाया, “बाकी बातें हम फोन पर तय कर लेंगे।”
“जी,” उन्होंने सिर हिलाया।
सरोज ने रवीना को हल्का सा आगे किया, “चल, नमस्ते कर।”
रवीना ने सबको नमस्ते किया। जब वह तुषार के सामने आई, तो एक पल के लिए दोनों रुके कोई बड़ा संवाद नहीं हुआ।
बस तुषार ने धीमे से कहा, “घर पहुँचकर बता दीजिएगा”
रवीना ने सिर हिलाया, “आप भी”
फिर दोनों अपने-अपने परिवार के साथ अलग दिशाओं में चल दिए गाड़ी में बैठते समय पायल ने फिर धीरे से कहा, “अब भी टाइम है।”
इस बार तुषार ने उसकी तरफ देखा लेकिन कुछ नहीं बोला उधर, रवीना खिड़की के पास बैठी बाहर देख रही थी
दिन भर की सारी बातें उसके दिमाग में घूम रही थीं—माँ की चिंता, पापा की चुप्पी और बीच-बीच में तुषार के छोटे-छोटे gestures कोई बड़ी बात नहीं हुई थी आज
अगले कुछ दिन बिना किसी खास घटना के निकल गए, लेकिन अंदर ही अंदर दोनों घरों में बहुत कुछ बदल रहा था। शादी की तारीख अब बहुत पास थी, और हर दिन के साथ रवीना के जीवन का एक हिस्सा धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा था।
स्कूल में वह दिन थोड़ा अलग था सुबह की प्रार्थना के बाद जब बच्चे अपनी-अपनी क्लास में जा रहे थे, रवीना स्टाफ रूम के दरवाज़े पर कुछ सेकंड के लिए रुक गई। वही जगह जहाँ उसने पिछले कई साल बिताए थे—कॉपी चेक करते हुए, बच्चों को समझाते हुए, और कभी-कभी खुद को संभालते हुए।
आज उसे इस्तीफा देना था वह अंदर गई। माही पहले से वहाँ बैठी थी, चाय का कप हाथ में लिए। रवीना को देखते ही उसने समझ लिया।
“आज दे रही है?” माही ने सीधा पूछा
रवीना ने बस सिर हिला दिया, दोनों कुछ पल चुप रहीं
फिर रवीना ने बैग से एक लिफाफा निकाला “प्रिंसिपल मैम को देना है”
माही ने लिफाफा हाथ में लिया, देखा, फिर वापस उसकी तरफ बढ़ा दिया, “खुद दे। भाग मत।”
रवीना हल्का सा मुस्कुराई, लेकिन वो मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची कुछ देर बाद वह प्रिंसिपल के केबिन के बाहर खड़ी थी। उसने एक गहरी साँस ली और दरवाज़ा खटखटाया।
“Come in,” अंदर से आवाज़ आई
रवीना अंदर गई और चुपचाप लिफाफा सामने रख दिया
प्रिंसिपल ने चश्मा ठीक करते हुए पूछा, “ये क्या है?”
“मैम… resignation,” रवीना ने धीमे से कहा।
उन्होंने लिफाफा खोला, पढ़ा, फिर उसकी तरफ देखा, “शादी?”
“जी।”
“तुम अच्छी टीचर हो, रवीना। बच्चों के साथ तुम्हारा तरीका अलग है,” उन्होंने शांत स्वर में कहा, “पक्का फैसला है?”
रवीना ने एक पल सोचा फिर बोली, “जी मैम”
प्रिंसिपल ने सिर हिलाया, “ठीक है। नोटिस पीरियड पूरा करना होगा, लेकिन अगर ज़रूरत हो तो हम adjust कर देंगे।”
“थैंक यू मैम”
बात खत्म हो गई थी लेकिन रवीना कुछ सेकंड वहीं खड़ी रही, जैसे कुछ कहना चाहती हो, फिर चुपचाप बाहर निकल गई
क्लास में जब वह पहुँची, तो बच्चों को शायद पहले से ही कुछ अंदाज़ा था।
“मैम, आप जा रही हो क्या?” एक बच्चे ने सीधे पूछ लिया।
रवीना रुक गई उसने बच्चों की तरफ देखा—वही चेहरे, वही उत्सुक आँखें
“हाँ थोड़े दिन में,” उसने धीरे से कहा
“क्यों?” दूसरे बच्चे ने पूछा
“क्योंकि कभी-कभी बड़े लोग अपने फैसले खुद नहीं लेते,” उसके मुँह से बिना सोचे निकल गया
फिर उसने खुद को संभाला, “लेकिन मैं पूरी कोशिश करूँगी कि आखिरी दिन तक तुम्हें अच्छे से पढ़ाऊँ।”
बच्चे चुप हो गए उस दिन उसने पढ़ाया लेकिन हर शब्द के साथ उसे एहसास हो रहा था कि ये सब अब उसका नहीं रहेगा।
शाम को स्टाफ रूम में छोटी-सी फेयरवेल जैसी स्थिति बन गई कोई केक नहीं था, कोई बड़ा आयोजन नहीं बस कुछ लोग, कुछ बातें माही ने उसे एक छोटा सा गिफ्ट दिया, “खोलना घर जाकर”
रवीना ने लिया, “तू ऐसे क्यों behave कर रही है जैसे मैं बहुत दूर जा रही हूँ?”
माही ने हल्का सा हँसते हुए कहा, “दूर ही जा रही है रोज़-रोज़ तो नहीं मिलेगी”
फिर थोड़ा रुककर बोली, “डर लग रहा है?”
रवीना ने इस बार सच बोला, “हाँ”
“अच्छा है,” माही ने कहा, “मतलब तू अभी भी सोच रही है। पूरी तरह हार नहीं मानी।”
रवीना ने उसकी तरफ देखा, लेकिन कुछ कहा नहीं
उधर, उसी समय तुषार अपने काम से लौट रहा था थकान उसके चेहरे पर साफ थी, लेकिन आज उसके दिमाग में कुछ और भी था—शादी के बाद का जीवन
घर पहुँचते ही दीपक ने फिर वही लहजा अपनाया, “आ गए? बहुत बिज़ी हो आजकल।”
तुषार ने जवाब नहीं दिया।
पायल ने सोफे से कहा, “वैसे तुम्हारी होने वाली पत्नी अब स्कूल छोड़ रही है, पता है? पूरा घर बैठकर संभालेगी अब।”
तुषार एक पल के लिए रुका, “किसने कहा?”
“मम्मी ने बताया,” पायल ने कंधे उचकाए।
तुषार ने कुछ नहीं कहा लेकिन उसके मन में हल्का सा सवाल उठा रात को खाना खाते समय उसने पहली बार खुद से सोचा क्या उसने कभी रवीना से पूछा भी है कि वो क्या चाहती है?
जवाब सीधा था—नहीं और यही बात उसे थोड़ी देर तक सोने नहीं देती....