मंदिर से लौटते वक्त गाड़ी में अजीब सी खामोशी थी न कोई हंसी न कोई हल्की-फुल्की बात रवीना खिड़की के पास बैठी थी। उसके हाथ उसकी गोद में टिके हुए थे, उंगलियाँ एक-दूसरे में उलझी हुई
तुषार उसके बगल में बैठा था लेकिन दोनों के बीच जैसे एक अदृश्य दूरी थी आगे महेश गाड़ी चला रहे थे सुषेला उनके बगल में बैठी थी, चुप लेकिन उसका चेहरा सख्त था
घर पहुँचे,दरवाज़ा खुला रवीना ने एक पल के लिए अंदर कदम रखने से पहले ठहरकर घर को देखा यही अब उसका घर था लेकिन अंदर कोई इंतज़ार नहीं कर रहा था।
सुषेला सीधे अंदर चली गई, जैसे कुछ खास हुआ ही न हो पायल ने दरवाज़े के पास खड़े होकर एक नजर रवीना पर डाली… फिर मुड़कर अपने कमरे की तरफ चली गई।
महेश ने हल्का सा रुककर कहा, “अंदर आओ।”
बस इतना ही।
रवीना ने धीरे से सिर हिलाया और अंदर कदम रख दिया।
कोई रस्म नहीं हुई।
कोई स्वागत नहीं हुआ।
बस… वो घर में आ गई।
तुषार दरवाज़े के पास कुछ सेकंड खड़ा रहा… फिर धीरे से अंदर चला गया।
हॉल में सब अपनी-अपनी जगह पर थे।
जैसे कुछ बदला ही नहीं।
रवीना वहीं खड़ी रह गई।
उसे समझ नहीं आ रहा था—कहाँ जाए? क्या करे?
तभी महेश की आवाज़ आई, “तुषार, अपने कमरे में ले जाओ।”
तुषार जैसे इसी का इंतज़ार कर रहा था।
“आ… आओ,” उसने धीरे से कहा।
रवीना उसके पीछे-पीछे चल दी।
कमरे के अंदर आते ही दोनों रुक गए।
दरवाज़ा बंद हुआ।
और पहली बार…
वो दोनों अकेले थे।
कुछ पल तक कोई कुछ नहीं बोला।
तुषार ने नजरें इधर-उधर घुमाईं… जैसे कुछ ढूंढ रहा हो।
असल में वो शब्द ढूंढ रहा था।
“वो… तुम… बैठ जाओ,” उसने आखिर कहा।
रवीना चुपचाप बिस्तर के कोने पर बैठ गई।
तुषार कुछ दूरी पर खड़ा रहा।
कमरे में वही चीज़ें थीं—अलमारी, टेबल, बिस्तर…
लेकिन अब सब अलग लग रहा था।
क्योंकि अब वो अकेला नहीं था।
तुषार ने एक गहरी सांस ली।
“अगर… अगर तुम्हें कुछ चाहिए हो तो बता देना,” उसने धीरे से कहा।
रवीना ने उसकी तरफ देखा।
पहली बार… थोड़ी देर के लिए।
फिर हल्का सा सिर हिला दिया, “हूँ।”
फिर से खामोशी।
बाहर से बर्तनों की आवाज़ आ रही थी।
घर वही था… लोग वही थे…
लेकिन इस कमरे में दो लोग थे…
जो एक-दूसरे के लिए अभी भी अजनबी थे तुषार ने एक पल के लिए उसकी तरफ देखा फिर नजरें झुका लीं।
उसे समझ नहीं आ रहा था कैसे शुरू करे और रवीना वो बस चुपचाप बैठी थी जैसे इंतज़ार कर रही हो शायद किसी एक सही शब्द का
कमरे में खामोशी जैसे जम गई थी।
रवीना बिस्तर के किनारे बैठी थी। उसकी उंगलियाँ उसकी साड़ी के पल्लू को बार-बार मरोड़ रही थीं। तुषार खिड़की के पास खड़ा था, बाहर देखता हुआ… लेकिन उसे कुछ दिख नहीं रहा था।
कुछ मिनट यूँ ही गुजर गए आखिर तुषार ने हिम्मत जुटाई।
“तुम… पानी लोगी?” उसने बिना उसकी तरफ देखे पूछा।
रवीना ने हल्का सा सिर हिलाया, “नहीं।”
फिर वही सन्नाटा तुषार को लगा अगर उसने अभी कुछ नहीं कहा, तो ये खामोशी और भारी हो जाएगी।
“आज… बहुत थक गई होगी,” उसने कहा।
“हूँ,” रवीना का छोटा सा जवाब आया।
तुषार ने धीरे से उसकी तरफ देखा वो सच में थकी हुई लग रही थी… लेकिन उससे ज्यादा, वो संभलकर बैठी हुई लग रही थी—जैसे कोई गलती ना हो जाए।
“तुम… चाहो तो थोड़ा आराम कर सकती हो,” तुषार ने कहा, “मैं… मैं बाहर चला जाता हूँ।”
इस बार रवीना ने तुरंत सिर उठाया, “नहीं।”
तुषार रुक गया।
“आपको बाहर जाने की जरूरत नहीं है,” उसने धीरे से कहा, “ये… आपका कमरा है।”
“हमारा,” तुषार के मुँह से अचानक निकल गया।
दोनों एक पल के लिए चुप हो गए रवीना ने नजरें झुका लीं
तुषार को खुद समझ नहीं आया उसने ये क्यों कहा लेकिन कह दिया था।
नीचे से आवाज़ आई
“खाना लग गया है!”
सुषेला की आवाज़ थी।
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा… फिर नजरें हटा लीं।
“चलें?” तुषार ने धीरे से पूछा।
रवीना ने सिर हिला दिया दोनों साथ में नीचे आए डाइनिंग टेबल पर सब पहले से बैठे थे।
लेकिन जैसे ही रवीना ने कुर्सी खींची एक सेकंड के लिए सबकी नजरें उस पर टिक गईं फिर तुरंत हट भी गईं कोई कुछ नहीं बोला तुषार उसके बगल में बैठ गया।
सुषेला ने चुपचाप रोटियाँ टेबल पर रखीं। सब्ज़ी पहले से ही रखी थी—साधारण, रोज़ की तरह।
रवीना ने खुद ही प्लेट में खाना लेना शुरू किया।
उसने किसी का इंतज़ार नहीं किया… शायद उसे पता था, कोई उसके लिए नहीं करेगा।
पायल ने हल्का सा ताना मारा, “आज तो घर में बहुत सादगी है… नई बहू आई है, फिर भी कुछ खास नहीं बना।”
उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन साफ सुनाई दे रही थी।
तुषार के हाथ रुक गए उसने एक पल के लिए पायल की तरफ देखा फिर नजरें झुका लीं रवीना ने जैसे कुछ सुना ही नहीं उसने चुपचाप खाना खाना जारी रखा।
महेश ने एक सख्त नजर पायल पर डाली, “खाना खाओ चुपचाप।”
पायल ने कुछ नहीं कहा लेकिन उसके चेहरे पर वही नापसंदगी बनी रही कुछ मिनट तक बस चम्मच की आवाज़ और प्लेटों की खनक सुनाई देती रही तुषार ने एक बार फिर चुपके से रवीना की तरफ देखा।
वो धीरे-धीरे खा रही थी बिना किसी भाव के जैसे ये सब उसके लिए नया नहीं है।
उस पल तुषार के अंदर कुछ हल्का सा खिंचा पहली बार उसे एहसास हुआ ये लड़की सिर्फ इस घर में आई नहीं है…
ये बहुत कुछ सहकर आई है खाना खत्म हुआ सब एक-एक करके उठ गए।
रवीना भी प्लेट उठाने लगी।
“छोड़ दो,” तुषार ने धीमे से कहा।
वो रुक गई
“मैं कर दूँगा,” उसने पहली बार थोड़ी साफ आवाज़ में कहा
रवीना ने उसकी तरफ देखा कुछ सेकंड तक फिर उसने धीरे से प्लेट वापस रख दी।
“ठीक है,” उसने कहा।
तुषार प्लेट उठाकर रसोई की तरफ चला गया रवीना वहीं खड़ी रही उसकी नजरें उसके पीछे जाती हुई पीठ पर टिकी थीं शायद ये आज का पहला ऐसा पल था जहाँ उसे लगा वो पूरी तरह अकेली नहीं है।