प्यार की परीभाषा - 5 Rishav raj द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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प्यार की परीभाषा - 5



तुषार के घर में उस दिन माहौल थोड़ा अलग था महेश सुबह से ही खाँस रहे थे। पहले तो उन्होंने ध्यान नहीं दिया, लेकिन दोपहर तक उनकी तबीयत और ढीली लगने लगी

सुशीला—  डॉक्टर को दिखा लेते हैं

महेश—  कुछ नहीं है ठीक हो जाएगा

लेकिन इस बार बात यहीं नहीं रुकी शाम को, जब तुषार ऑफिस से लौटा, तो घर का माहौल शांत था

तुषार—  क्या हुआ?

सुशीला— कुछ नहीं तुम्हारे पापा की तबीयत ठीक नहीं है

तुषार तुरंत उनके पास गया— पापा चलिए डॉक्टर के पास चलते हैं

महेश ने उसका हाथ पकड़ लिया—

महेश— डॉक्टर बाद में पहले मेरी एक बात सुन

तुषार चुप हो गया।

महेश— पता नहीं कितने दिन हैं पर एक चीज़ देखना चाहता हूँ

तुषार ने कुछ नहीं कहा बस देखता रहा

महेश— तेरी शादी

कमरे में कुछ सेकंड के लिए सन्नाटा हो गया।

सुशीला ने भी वहीं से कहा— हम कब से बोल रहे हैं अब और मत टालो


नेहा— कम से कम घर में एक काम तो ठीक से हो जाए

तुषार ने सबकी बातें सुनीं इस बार उसने तुरंत जवाब नहीं दिया

उसने धीरे से कहा— अगर ज्यादा खर्चा ना हो तो

सबकी नजरें उसकी तरफ उठीं।

तुषार— मैं बड़ा function नहीं चाहता simple मंदिर में

सुशीला ने तुरंत कहा— हमें क्या करना है खर्चा करके अगर लड़की वाले मान जाएँ तो हमें भी कोई दिक्कत नहीं

महेश ने हल्का सा सिर हिलाया—  नहीं मेरे बेटे की सादी दुम धाम से होगी 

तुषार - नहीं पापा मैं इस सब फीजुल खर्चों को नहीं चाहता अगर सादी होगी तो सिंपल 

महेश अपने बेटे के बातों को सुनकर उसका सिना चौड़ा है गया न जाने कब छोटा सा तुषार इतना बड़ा और समझदार हो गया, महेश ने हँ में सिर हिला दिया 

तुषार चुप हो गया

ये “हाँ” नहीं थी
पर “ना” भी नहीं थी


उधर, रवीना के घर में हालात और ज्यादा सीधे थे

माँ—  आज फिर मना कर दिया

उन्होंने गुस्से में थाली जोर से रखी काजल चुप बैठी थी

राकेश—  हर बार ऐसे मत बोलो

माँ—  तो कैसे बोलूँ? कब तक बैठाए रखेंगे इसे?

रवीना रसोई में खड़ी सब सुन रही थी

माँ— कोई भी आता है देखता है और मना कर देता है

इस बार उनकी आवाज़ थोड़ी ऊँची हो गई— और उसकी वजह से काजल की शादी भी रुकी हुई है 

रवीना ने आँखें बंद कर लीं

राकेश—  बस भी करो

माँ— नहीं अब बस नहीं अब जो भी रिश्ता आएगा, वहीं करूँगी चाहे जैसे भी हो


अगले दिन घर में एक पंडित जी आए

पंडित— एक लड़का है घर ठीक है कमाने वाला है

माँ तुरंत बोलीं— देखने में?

पंडित ने थोड़ा रुककर कहा— साधारण है लेकिन लड़का ठीक है

माँ— हमें अब ज्यादा कुछ नहीं चाहिए बस शादी हो जाए

राकेश ने धीरे से पूछा— लड़के वालों की क्या शर्त है?

पंडित— ज्यादा कुछ नहीं लड़का खुद ही बोल रहा है मंदिर में सादी शादी

माँ के चेहरे पर पहली बार राहत दिखी— मतलब खर्चा भी कम?

पंडित—  हाँ बिल्कुल साधारण तरीके से

माँ ने तुरंत कहा— हमें मंजूर है 

राकेश ने एक बार रवीना की तरफ देखा जो दरवाज़े के पास खड़ी थी।

“तुम कुछ कहना चाहती हो?” उन्होंने धीरे से पूछा

रवीना कुछ सेकंड चुप रही…

फिर बोली— आप लोग जैसा ठीक समझें

उसकी आवाज़ बिल्कुल सीधी थी ना विरोध, ना उत्साह बस स्वीकार

पंडित जी ने दोनों घरों की जानकारी मिलाई

नाम, जगह, परिवार सब कुछ धीरे-धीरे एक लाइन में आने लगा किसी को अभी ये नहीं पता था कि— जिस “साधारण लड़के” की बात हो रही है और जिस “लड़की के लिए जल्दी” है वो दोनों पहले एक ही जगह खड़े हो चुके हैं बिना जाने

दोनों घरों में अब एक ही बात चल रही थी “शादी ”


तुषार उस रात देर तक छत पर टहलता रहा नीचे कमरे में पिता महेश की खाँसी गूँज रही थी  घर की हालत, जिम्मेदारियाँ और ऊपर से शादी की बात—सब कुछ एक साथ सिर पर आ गिरा था 


अगली सुबह घर का माहौल अलग ही था नाश्ते की मेज़ पर सब बैठे थे, पर बात कोई नहीं कर रहा था महेश ने धीरे से खाँसते हुए शुरुआत की, “तुषार, बेटा अब मेरी तबीयत पहले जैसी नहीं रही एक ही इच्छा है तेरी शादी देख लूँ ”

तुषार चुप रहा।

दीपक मोबाइल से नज़र उठाकर बोला, “हाँ, अब तो कर ही ले वैसे भी कोई लाइन तो लगी नहीं है तेरे पीछे”

नेहा  ने भी ताना मारा, “और ज़्यादा सोचने का फायदा भी क्या है? जो मिल रहा है, वही ठीक है”

तुषार ने दोनों की तरफ देखा, लेकिन कुछ नहीं बोला।

तभी महेश ने आगे कहा, “एक रिश्ता आया है पंडित जी ने बताया है लड़की वाले हमारी शर्त मान गए हैं—मंदिर में सादी शादी, बिना ज्यादा खर्च के”

तुषार ने धीरे से पूछा, “कौन है?”

महेश ने नाम बताया, “रवीना ”

नाम सुनते ही तुषार एक पल के लिए ठिठक गया उसने नज़रें झुका लीं, ताकि कोई उसके चेहरे का बदलाव पढ़ न सके

सुशीला ने तुरंत पूछा, “कैसी है लड़की?”

“पढ़ी-लिखी है, स्कूल में टीचर है,” महेश ने शांत स्वर में कहा

सुशीला ने हल्का सा मुँह बनाया, “देखने में कैसी है?”

महेश का धैर्य टूटने लगा, “हर चीज़ में बाहरी रूप ही देखना है तुम्हें? घर संभालने वाली, समझदार लड़की चाहिए या?”

सुशीला चुप हो गईं, लेकिन चेहरे पर असंतोष साफ़ था

महेश ने फिर तुषार की तरफ देखा, “परसों मिलने चलेंगे”

तुषार ने कुछ सेकंड सोचा, फिर बस इतना कहा, “ठीक है”

उसके जवाब में कोई उत्साह नहीं था लेकिन मना भी नहीं था उधर, रवीना के घर में वही पुराना तनाव चल रहा था

रसोई में खड़ी रवीना चुपचाप काम कर रही थी सरोज की आवाज़ फिर गूँजी, “कितने घरों से मना हो चुकी है और ऊपर से तेरी वजह से काजल की शादी भी रुकी हुई है”

रवीना ने कुछ नहीं कहा

तभी काजल अंदर आई, “माँ, पंडित जी ने एक  रिश्ता बताया है लड़का नौकरी करता है, परिवार ठीक है और सिंपल शादी चाहते हैं”

सरोज तुरंत चौकन्नी हो गईं, “इस बार कोई कमी नहीं रहनी चाहिए”

रवीना ने बस सिर झुका लिया शाम को माही आई तो उसने सब सुना थोड़ी देर चुप रहने के बाद बोली, “हर बार जैसा मत सोच कभी-कभी चीज़ें अलग भी होती हैं”

रवीना हल्की सी मुस्कान दे पाई, “देखते हैं”

दो दिन बाद, दोनों परिवार मंदिर में मिले माहौल सादा था ना शोर, ना दिखावा

तुषार अपने पिता के साथ खड़ा था, लेकिन उसकी नज़रें भीड़ में किसी को ढूँढ रही थीं तभी उसने उसे देखा—रवीना

वही चेहरा बस आज थोड़ा और थका हुआ

रवीना ने भी उसे देखा और इस बार पहचान तुरंत हुई उसके चेहरे पर हल्का सा आश्चर्य आया, “आप?”

तुषार ने सिर हिलाया, “हाँ स्कूल में…”

दोनों के बीच एक छोटा सा, अनकहा सा कनेक्शन बन गयाकम से कम ये मुलाकात पूरी तरह अनजान नहीं थी

उधर बड़े लोग बातों में लगे थे—खर्च, तारीख़, व्यवस्था

महेश ने साफ कहा, “हम ज्यादा खर्च नहीं कर पाएंगे मंदिर में ही शादी करेंगे”

सरोज ने तुरंत हामी भर दी, “हमें भी कोई दिखावा नहीं चाहिए”

जैसे दोनों तरफ की सबसे बड़ी चिंता वहीं खत्म हो गई थोड़ी देर बाद दोनों को अकेले बात करने भेजा गया
मंदिर के पीछे छोटा सा आँगन था कुछ पल दोनों चुप रहे

फिर तुषार ने सीधा कहा, “आप चाहें तो मना कर सकती हैं”
रवीना ने उसकी तरफ देखा, “आप भी कर सकते हैं”

तुषार ने हल्का सा सिर हिलाया, “घर की हालत ऐसी नहीं है कि मैं मना कर पाऊँ”

रवीना ने भी बिना घुमाए कहा, “मेरे यहाँ भी”......